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असहिष्णु अरुंधति के साथ सहिष्णुता क्यों?

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तथाकथित सेक्युलर जमात अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की फजीहत का सबब बन रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान ने इन्हीं तथाकथित सेक्युलर जमात का सहारा लेकर भारत को घेरने की कोशिश की। संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान की स्थायी प्रतिनिधि मलीहा लोधी ने अरुंधति रॉय के एक कथन का उद्धरण देते हुए कहा, ”भारत की हवा में इस समय जो चीज सबसे अधिक है, वह है शुद्ध आतंक-कश्मीर में और अन्य स्थानों पर भी।” इतना ही नहीं भारत के तथाकथित सेक्युलरों के अन्य कथनों का भी सहारा लेकर प्रधानमंत्री को फासीवादी और यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ को ‘धर्मान्ध’ तक कह दिया।अरुंधति रॉय और मलीहा लोधी के लिए चित्र परिणाम

पाकिस्तान का झूठ 10 मिनट में हुआ बेनकाब
पाकिस्तान का घोषित धर्म है इस्लाम और पाकिस्तान का पूरा नाम ही है “इस्लामिक पाकिस्तान”। झूठ और आतंकवाद इस्लामिक पाकिस्तान की निशानी है। पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र के मंच पर इतनी बेशर्मी से झूठ बोला और इतना सफेद झूठ बोला कि बस 10 मिनट में सारी पोल खुल गयी। एक लड़की की तस्वीर दिखाकर मलीहा लोधी जिसे भारत के कश्मीर का बता रहीं थी वह फिलीस्तीन के गाजा की थी और उस लड़की का नाम है रवया अबू जोमा। उनकी झूठ की पोल तो खुल गई लेकिन तथाकथित सेक्युलरों की भारत को बदनाम करने की साजिश भी एक हद तक सफल रही।

मलीहा लोधी ने दिखाया झूठ के लिए चित्र परिणाम

अरुंधति ने देश को बदनाम करने में कसर नहीं छोड़ी
दरअसल ये तथाकथित सेक्युलर जमात भारत को बदनाम करने का कोई भी मौका नहीं छोड़ता है। अरुंधति रॉय इन्हीं में से एक हैं। पाकिस्तान के साथ खड़ी अरुंधति रॉय NDTV के मालिक प्रणय रॉय की रिश्ते की बहन हैं और प्रणय कांग्रेस के कार्यकाल में इकोनॉमिक एड्वाइजर रह चुके हैं। जाहिर है कांग्रेस और वामपंथ के विचारों के घालमेल के तहत पली बढ़ी अरुंधति रॉय भारत के वर्तमान सरकार का विरोध करती रही हैं। सरकार की नीतियों का विरोध देश के हरेक नागरिक का अधिकार है, लेकिन अरुंधति राय का नजरिया पूरी तरह से भारत विरोधी है। माओवादियों और आतंकवादियों के खेमे में जाकर बैठी इस मोहतरमा को बेनकाब किया जाना चाहिए।

भारत के संविधान की विरोधी हैं अरुंधति
अरुंधति राय उन तथाकथित बुद्धिजीवियों में शामिल हैं जिनकी कलम देश को तोड़ने वाली शक्तियों के लिए ही चलती है। कभी वह छत्तीसगढ़ के गरीब आदिवासियों का खून बहाने वाले और गुलाम बनाने वाले माओवादियों के साथ खड़ी हो जाती हैं। तो कभी उन्हें कश्मीर के अलगाववादी नेताओं यासीन मलिक और इफ्तिखार गिलानी के समर्थन में लिखने में भी शर्म नहीं आती। अरुंधति राय कश्मीर की आजादी की पैरोकार हैं। यानि वह भारत की कानून, संविधान और संसद की भी विरोधी हैं।

अरुंधति रॉय यासीन मलिक के लिए चित्र परिणाम

विदेशी फंडिंग ही रोजी-रोटी का जरिया
अरुंधति राय उन तथाकथित लेखकों के समूह का नेतृत्व करती हैं जिनकी रोजी-रोटी ही भारत विरोध पर चलती है। विदेशी फंडिंग के सहारे भारत में ही भारत के विरोध में ‘भौंकने’ वाली अरुंधति रॉय लेखकों की उस जमात से आती हैं जो सुविधाभोगी है। ये वही लेखक हैं, जो दादरी कांड पर अभिव्यक्ति की आजादी का कथित तौर पर गला घोंटे जाने के बाद अपने पुरस्कार लौटा रहे थे।

arundhati prannoy roy के लिए चित्र परिणाम

असहिष्णु अरुंधति रॉय से सहिष्णुता क्यों?
अरुंधति को बुकर पुरस्कार मिल चुका है लेकिन उन्होंने कौन सी पुस्तक लिखी है देश के लोग तो नहीं जानते। क्या उनके लेखन से देश का आम-जन वाकिफ है? जवाब होगा कि कतई नहीं, और यही उनकी सबसे बड़ी असफलता है। क्या किसी भी आम-आदमी ने खरीद कर अरुंधति राय की एक भी पुस्तक पढ़ी? बहरहाल बुकर पुरस्कार विजेता अरुंधति राय लगातार भारत की निर्वाचित सरकार को फासीवादी कह रही हैं। भारतीय सेना पर हमला बोल रही हैं, असहिष्णुता का मुद्दा उठा रही हैं और फिर भी छुट्टा घूम रही हैं।

arundhati attack on army के लिए चित्र परिणाम

सेना पर सवाल उठाने वालों से सवाल क्यों नहीं?
अरुधंति राय ने बिल्कुल हाल ही में एक तमिल पुस्तक के विमोचन पर कहा कि ‘भारतीय सेना कश्मीर, नगालैंड, मिजोरम वगैरह में अपने लोगों पर अत्याचार करती रही है। अरुंधति रॉय कहती रही हैं कि 1947 से भारतीय सेना का देश की जनता के खिलाफ ही इस्तेमाल हो रहा है। भारतीय सेना पर कठोर टिप्पणी करने वाली अरुंधति राय से पूछा जाना चाहिए कि उन्होंने क्यों कभी सेना के कश्मीर, उत्तराखंड से लेकर चेन्नई में बाढ़ राहत कार्यों को अंजाम देने पर लिखना पसंद नहीं किया?

अरुंधति रॉय यासीन मलिक के लिए चित्र परिणाम

आतंकियों से है अरुंधति रॉय का कनेक्शन
अरुंधति रॉय की यासीन मलिक के साथ हाथ में हाथ डाले फोटो देखिए। ये वही यासीन मलिक है जिसने इस्लामाबाद में भारतीय हाई कमीशन के बाहर धरना दिया था वह भी मुंबई हमलों के मास्टरमाइंड हाफिज सईद के साथ बैठकर। ये कलम की कथित सिपाही देश विरोधी ताकतों की मोहरा बन कर खुश हैं। देश विरोध का टेंडर उठा चुकी अरुंधति राय ने गोधरा कांड में मारे गए मासूमों को लेकर कभी एक लेख या निबंध नहीं लिखा। 1984 के सिख विरोधी दंगों पर तो शायद ख्वाबों में खोयी रही होंगी? अरुंधति राय ने तब एक शब्द भी नहीं बोला था जब 1989 में भागलपुर में मुसलमानों का कत्लेआम हुआ था। पंजाब में आतंकवाद के दौर में आतंकियों के खिलाफ अरुंधति की कलम क्यों थमी रही?

अरुंधति रॉय यासीन मलिक के लिए चित्र परिणाम

बहरहाल कांग्रेस और वामपंथी जमात अपनी सियासत चमकाने के लिए देश और सेना को भी नहीं छोड़ रहे हैं। बुकर पुरस्कार मिलने के बाद अरुंधति राय ने सोच लिया है कि मानो उन्हें देश के खिलाफ बोलने का लाइसेंस सा मिल गया है, लेकिन इन तथाकथित सेक्युलर जमात को केवल और केवल मोदी सरकार का ही विरोध करना रह गया है।

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