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चीन को इसलिए खटक रही भारत-अमेरिका की दोस्ती

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”अमेरिका भारत के साथ अपने दोस्ताना रिश्ते को अगले 100 सालों तक जारी रखना चाहता है।” अमेरिकी विदेश मंत्री रेक्स टिलरसन के इस बयान से चीन बुरी तरह बौखला गया है। चीन ने कहा, ‘‘अमेरिकी विदेश मंत्री रेक्स टिलरसन की ओर से भारत के साथ संबंधों को प्रगाढ़ बनाने पर जोर देने और पेइचिंग की आलोचना करने में पक्षपात की बू आती है।” दरअसल चीन इस यह बौखलाहट उस पीड़ा को बयान कर रही है जो अभी हाल में ही उसे डोकलाम प्रकरण में मिली है। ये प्रधानमंत्री मोदी की उन नीतियों की जीत है जिसके तहत भारत को विश्व में उसकी वास्तविक कद को सम्मान दिलाना व एक महत्वपूर्ण स्थान पर खड़ा करना उद्देश्य था।

भारत-अमेरिका की दोस्ती से मुश्किल में चीन
बदल रही वैश्विक परिस्थितियों में भारत-अमेरिका संबंधों के महत्व को दोनों देश समझ रहे हैं। भारत और अमेरिका के संबंध एक नई ताल के साथ आगे बढ़ रहे हैं। दरअसल बदले परिदृश्य में सुरक्षा क्षेत्र को लेकर भारत-अमेरिका के संबंध तीन स्तरों पर मजबूत हुए हैं। अमेरिका से सुरक्षा खरीद और साझा परियोजनाओं के मामले में जिनका आर्थिक आंकड़ा 14 अरब डॉलर से भी ऊपर हो गया है। दोनों देशों की सेनाओं के बीच समन्वय, सहयोग और सूचना की साझीदारी के स्तर पर संपर्क स्थापित हुआ है। पाइरेसी, शांति अभियान, गश्त को लेकर संयुक्त अभियानों के विचार को लेकर भी काफी प्रगति हुई है। भारत और अमेरिका के साथ मिलकर जापान मलाबार युद्धाभ्यास में भी भाग लेता रहा है जो चीन के लिए एक चुनौती के तौर पर है।

भारत-जापान-अमेरिका की तिकड़ी से चिढ़
दक्षिण चीन सागर में चीन अपनी दादागिरी दिखाता आ रहा है, लेकिन चीन की इस हेकड़ी का विरोध उस क्षेत्र के अमूमन सभी देश कर रहे हैं। इसके विरुद्ध अमेरिका और जापान मुखर रूप से खड़ा है और भारत ने इसपर अपना समर्थन जताया है। मानसरोवर यात्रा रोककर और डोकलाम प्रकरण को पैदा कर चीन ने भारत पर दबाव बनाने की कोशिश तो जरूर की, लेकिन भारत दबाव में आने की जगह सेना को बॉर्डर पर तैनात करवा दिया। इसके बाद जो हुई वह दुनिया जानती है। चीन को डोकलाम से पीछे हटना पड़ा और फेस सेविंग के लिए तमाम तिकड़म भी करना पड़ा।

दक्षिण चीन सागर में चीन के वर्चस्व को चुनौती
सीमा पर भारत मजबूती से है और चीन को कूटनीतिक और सामरिक स्तर पर जवाब देने को तैयार बैठा है। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में देश ने हर स्तर पर चीन को यह बता दिया है कि भारत उसकी हेकड़ी से डरने वाला नहीं है। उधर दक्षिण चीन सागर में चीन जबरदस्ती घुसा चला आ रहा है जिसका कई देश विरोध कर रहे हैं। जाहिर है चीन उस मामले में अपने आसपास के देशों का समर्थन खोता चला जा रहा है और भारत द्वारा इसका विरोध किए जाने से चीन को यह लग रहा है कि वह एशिया में अकेला ताकतवर देश नहीं रह सकेगा। इसलिए जून में जब पीएम मोदी अमेरिका गए थे तो चीन ने भारत पर गुटनिरपेक्षता की नीति छोड़ने का आरोप लगाया था। चीन ने इसके विनाशकारी परिणाम की भी धमकी दी थी, लेकिन चीन को भी शायद यह पता है कि वह विनाश सिर्फ भारत का नहीं चीन सहित पूरे विश्व का होगा।

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ओबीओआर प्रोजेक्ट पर बढ़ गया खतरा
चीन-पाकिस्तान सीपैक प्रोजेक्ट पाक अधिकृत कश्मीर से गुजरता है। भारत ने इसका विरोध किया है, लेकिन चीन इस प्रोजेक्ट को आगे बढ़ा रहा है। जाहिर है भारत की आपत्ति को दरकिनार करना चीन के लिए आसान तो नहीं होने जा रहा है। इतना ही नहीं ओबीओआर पर अमेरिका ने साफ किया है कि चीन-पाकिस्तान इकनॉमिक कॉरिडोर एक विवादित क्षेत्र से होकर गुजरता है और किसी भी देश को वन बेल्ट वन रोड की पहल में तानाशाह की भूमिका नहीं निभानी चाहिए।

सामरिक सामर्थ्य बढ़ने से बढ़ी चीन की चिंता
स्वतंत्रता के पश्चात की कांग्रेस सरकारों ने देश की सुरक्षा पर कोई खास ध्यान नहीं दिया, लेकिन प्रधानमंत्री ने देश की सीमाओं को सुरक्षित बनाना शुरू कर दिया। चीन इस बदलाव को देखकर भी परेशान है। पीएम मोदी ने चीन सीमा के लिए एक लाख सैनिकों की माउंटेन स्ट्राइक कोर बनाने, फ्रांस से 36 राफेल लड़ाकू विमान को डील, नेवी के लिए अमेरिका से गार्डियन ड्रोन की खरीद, एफ16 विमानों का भारत में निर्माण और हवित्जर तोप खरीद जैसे कई कदम उठाए हैं। इसके साथ ही चीन सीमा पर ढांचागत सुविधाओं का निर्माण, चीन सीमा पर ग्लोबमास्टर विमान की लैंडिंग, सुपरसोनिक ब्रह्मोस मिसाइलों की चीन बॉर्डर पर तैनाती, चीन सीमा तक जाने के लिए हाइवे पुल का निर्माण, रेलल मार्ग का लेह तक विस्तार जैसे कदमों ने चीन की नींद उड़ा दी है।

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