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करारी शिकस्त के बाद भी नहीं आई कांग्रेसियों को शर्म, लुटिया डुबोने वाले नामदार की चमचागीरी में लगे सारे नेता

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दशकों तक देश पर राज करने वाली कांग्रेस पार्टी आज एक-एक सीट के लिए मोहताज हो गई है। राहुल गांधी की अगुवाई में कांग्रेस पार्टी हिमालय से रसातल में जा चुकी है। 2019 के लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी की अध्यक्षता में कांग्रेस पार्टी की शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा है। कांग्रेस पार्टी सिर्फ 52 सीटों पर सिमट कर रह गई है। नतीजों से पहले सरकार बनाने का दंभ भरने वाला कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी भी अमेठी की परंपरागत सीट से चुनाव हार गए हैं। अगर कोई और पार्टी होती तो इतना नामका और नाकार अध्यक्ष को तत्काल प्रभाव से पद से हटा दिया जाता। लेकिन ये कांग्रेस पार्टी है, यहां सिर्फ एक परिवार की चलती है और बाकी सब उसका हुक्म बजाते हैं। यही वजह है कि राहुल गांधी अब तक अध्यक्ष पद पर बने हुए हैं।  

कांग्रेस में चरम पर पहुंची चाटुकारिता
लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद शनिवार को दिल्ली में कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक बुलाई गई और हार के कारणों की समीक्षा की गई। लेकिन बैठक में हार के कारण समझने की कोई कोशिश नहीं की गई। बैठक में देशभर से आए कांग्रेस कार्यसमिति का सदस्यों में सिर्फ राहुल गांधी, सोनिया गांधी और प्रियंका वाड्रा की चाटुकारिता करने की होड़ लगी रही। हर कोई बस यही साबित करने में लगा था कि इस शर्मनाक हार के पीछे नामदारों का हाथ नहीं है। यह बात समझ के परे है कि जब चुनाव की पूरी रणनीति पार्टी अध्यक्ष ने बनाई, तो फिर हार की जिम्मेदारी और किसकी हो सकती है।

राहुल के इस्तीफे की पेशकश और कांग्रेसियों की कश्मकश
कांग्रेस वर्किंग कमेटी में राहुल गांधी ने इस्तीफे की पेशकश की, मीडिया में घंटों तक यही खबरें छाई रहीं। इसके कयात तो एक दिन पहले से ही लगाए जाने लगे थे कि राहुल गांधी दिखावे के लिए इस्तीफे की पेशकश कर सकते हैं। शुक्रवार को बैठक में हुआ भी यही। चैनलों पर ब्रेकिंग चलने लगीं की राहुल गांधी ने इस्तीफे की पेशकश की है और सीडब्ल्यूसी ने एक मत से उनकी इस्तीफा अस्वीकार कर दिया है। लेकिन बाद में पार्टी प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने बयान दिया कि राहुल गांधी ने ऐसी कोई पेशकश की ही नहीं है। जाहिर सी बात है कि यह जरूर चाटुकार कांग्रेसियों की कारिस्तानी होगी कि मीडिया के जरिए पूरे देश में यह संदेश दिया जाए की राहुल जी इस्तीफा देना चाहते हैं लेकिन पार्टी उनसे पद पर बने रहने की मिन्नत कर रही है। एक विफल अध्यक्ष की इमेज चमकाने के लिए इस हद तक की चमचागीरी किसी भी लिहाज से हजम करने लायक नहीं है।

सिर्फ राहुल ने ही मोदी को चुनौती दी- CWC
देश में आज प्रधानमंत्री मोदी का क्या मुकाम है और राहुल गांधी की क्या हालत है, किसी से छिपी नहीं है। लेकिन कांग्रेस वर्किंग कमेटी में शामिल रागदरबारियों के लिए राहुल जी ही देश के सबसे बड़े नेता है। बैठक के दौरान हर नेता ने कहा कि राहुल जी ही वो नेता है, जिन्होंने देश में प्रधानमंत्री मोदी को चुनौती दी है। दिल्ली में खुद चुनाव हार चुकीं शीला दीक्षित ने कहा कि राहुल गांधी ही पार्टी को आगे ले जाएंगे, इसलिए उन्हें इस्तीफा देने की कोई जरूरत नहीं है। वहीं राजस्थान के सीएम अशोक गहलोत, पंजाब के सीएम कैप्टन अमरेन्द्र, मध्य प्रदेश के सीएम कमलनाथ ने भी राहुल के इस्तीफे पर ऐतराज जताया। कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद, हरीश रावत, अंबिका सोनी और अहमद पटेल भी बैठक में रहुल की अगुवाई में पार्टी के मजबूत होने की दलीलें देते रहे।

17 राज्यों में नहीं खुला कांग्रेस का खाता
लोकसभा चुनाव में करारी शिकस्त का सामना करने वाली कांग्रेस इस बार कुल 17 राज्यों और केंद्रशासित क्षेत्रों में खाता भी खोल नहीं सकी। यूपी और बिहार जैसे राज्यों में महज 1-1 सीटों से संतोष करना पड़ा। परिणामों के मुताबिक कांग्रेस आंध्र प्रदेश, हरियाणा, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड, मणिपुर, नगालैंड, मिजोरम, दिल्ली, ओडिशा, सिक्किम, राजस्थान, चंडीगढ़, दागर एवं नगर हवेली, दमन एवं दीव, लक्षद्वीप में एक भी सीट नहीं जीत पाई है। पार्टी ने केरल में सबसे अधिक 14 सीटें जीती हैं। इसके बाद कांग्रेस ने तमिलनाडु में 8 और पंजाब में भी 8 सीटें जीतीं हैं। कांग्रेस पार्टी लोकसभा में सीटों की संख्या के लिहाज से दूसरे सबसे न्यूनतम स्थान पर पहुंच गई है। पिछले लोकसभा चुनाव में उसने 44 सीटें जीती थीं। इस बार भी पार्टी 52 अंकों में ही सिमट कर रह गई।

चुनाव में प्रियंका वाड्रा कुछ नहीं कर पाई
लोकसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने अपनी बहन प्रियंका वाड्रा को राजनीति में उतारने का ऐलान किया और उन्हें पार्टी महासचिव बनाते हुए पूर्वी उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी सौंपी। लेकिन प्रियंका वाड्रा नाम बड़े और दर्शन छोटे वाली कहावत को साबित किया। पूर्वांचल की एक भी सीट तो छोड़िए, प्रियंका अपने भाई की परंपरागत अमेठी सीट को भी बचाने में कामयाब नहीं हो पाई। इतना सब होने के बावजूद पार्टी के किसी भी नेता में प्रियंका के खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत नहीं है।

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