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क्या सर्वोच्च न्यायालय देश में हिन्दू विरोधी एजेंडा बढ़ाने का काम करता है? देखिए आम लोगों की राय

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‘हम भारत के लोग’ ने जिस संविधान के तहत इस देश में शासन व्यवस्था को सुनियोजित ढंग से चलाने के लिए विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका का गठन किया, उसमें से न्यायपालिका के बारे में आज देश के लोगों की क्या सोच है, यह जानना जरूरी है। न्यायपालिका ने सदैव ही अपनी आलोचना को अवमानना के रूप में देखा है, लेकिन सोशल मीडिया के दौर मे ‘हम भारत के लोग’ खुलकर अपनी राय रख रहे हैं। यह न्यायपालिका के लिए एक चुनौती का दौर है, जहां उसे ‘हम भारत के लोग’ के सामने खुद को निष्पक्ष और न्यायपूर्ण साबित करना है।

न्यायालय हिन्दू विरोध की मानसिकता से ग्रसित है-सर्वोच्च न्यायलय ने हाल में कुछ ऐसे फैसले दिए हैं, जिससे ‘हम भारत के लोग’ के मन में यह छवि बनी है कि सर्वोच्च न्यायालय अपने फैसलों में हिन्दुओं की भावना और संस्कृति के विरुद्ध फैसले देता है। सोशल मिडिया पर Tweet में प्रो. हरी ओम लिखते हैं कि सर्वोच्च न्यायालय ने 900 साल पुरानी सबरीमाला की परंपरा को तोड़ दिया, धारा 35A पर सुनवाई पर रोक लगा दी, राम मंदिर पर सुनवाई जनवरी 2019 तक टाल दी, रोहिंग्या मुसलमानों को देश से बाहर भेजने के लिए सुनवाई को भी टाल दिया।

एक अन्य Tweet में यह भी सामने आया कि कानून सबके लिए बराबर नहीं है, यह हिन्दुओं का हमेशा विरोध करता है और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय हिन्दुओं के खिलाफ ही होते है। सुप्रीम कोर्ट हिन्दुओं को मानसिक रुप से तोड़ देना चाहता है। इसी Tweet में लिखा है कि देश विरोधियों को न्यायालय से छूट मिल जाती है और यह प्रश्न उठाता है कि क्या सर्वोच्च न्यायालय देश को इस्लामिक राष्ट्र बनाना चाहता है।

एक Tweet में यह बताने का प्रयास किया गया कि सर्वोच्च न्यायालय कैसे हिन्दू विरोधी मानसिकता से ग्रसित है। Tweet में लिखा है कि मुसलमानों के तीन तलाक, हलाला और बहुविवाह पर सर्वोच्च न्यायालय कोई सुनवाई नहीं करता है, लेकिन हिन्दुओं के सबरीमाला के अयप्पा मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को उनका अधिकार घोषित करने का निर्णय सुना देता है।

एक Tweet में तो सीधे सीधे सर्वोच्च न्यायालय पर आरोप लगाते हुए लिखा है कि सर्वोच्च न्यायालय देश का सबसे अधिक पक्षपात करने वाला तंत्र है, जो गैरहिन्दुओं का बहुत ख्याल करता है।

न्यायालय एजेंडा फिक्स करने वाले मुकद्दमों को ही सुनता है
‘हम भारत के लोग’ का मानना है कि सर्वोच्च न्यायालय हिन्दू विरोध की मानसिकता से तो ग्रसित है ही, वह एजेंडा फिक्स करने वाले मुकदमों की जल्दी सुनवाई करता है। एक Tweet में नुपूर शर्मा ने हरीश साल्वे के इन्टरव्यू के हवाले से लिखा कि साल्वे ने 2014  में चेतावनी दी थी कि कांग्रेस, न्यायापालिका के जरिए सरकार को अस्थिर करेगी।

एक अन्य Tweet में लिखा है कि अयोध्या का मुकदमा सर्वोच्च न्यायालय के लिए कोई प्राथमिकता नहीं है, जबकि अन्य फिजूल के मुद्दों पर निर्णय आ जाते हैं।

एस एन गुप्ता ने Tweet में लिखा कि सर्वोच्च न्यायालय अर्बन नक्सलियों पर बहुत जल्दी में सुनवाई कर लेता है, लेकिन राम मंदिर पर सुनवाई को टाल देता है।

रोहिंग्या मुसलमानों को बाहर भेजने के मुद्दे पर एक Tweet में लिखा है कि अपील में यदि यह लिखा होता कि अवैध घुसपैठिये नक्सलियों को मारने वाले हैं, इसलिए इनको तुरंत देश से बाहर भेजा जाए तो मध्यरात्रि में ही सर्वोच्च न्यायालय सुनवाई कर लेता।

स्वप्निल सक्सेना ने tweet में सर्वोच्च न्यायालय के तमाम ऐसे छोटे मुकदमों  का हवाला दिया है, जिसमें निर्णय आ चुका है, लेकिन राम मंदिर की सुनवाई को टाल दिया गया है।

न्यायालय की किसी के प्रति जवाबदेह नहीं है
सर्वोच्च न्यायालय की हिन्दू विरोधी मानसिकता और एजेंडा फिक्स करने के चलन पर सवाल खड़ा करते हुए  ‘हम भारत के लोग’ ने सोशल मीडिया पर लिखा कि न्यायालयों की किसी के प्रति जवाबदेही नहीं है। एक Tweet में लिखा गया कि नौकरशाही और सेना का तो भारतीयकरण हो गया है, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय अपवाद है और सर्वोच्च न्यायालय में बैठने वाले भारत में सबसे लंबे समय तक रहने वाले अंग्रेज हैं, जो देश की जनता से जुड़े नहीं और अपने महलों में बैठकर फरमान सुनाने का काम करते हैं।

एक अन्य Tweet में लिखा गया कि जब मजदूर के काम न करने पर उसकी मजदूरी काट ली जाती है तो न्यायालयों में लंबित करोड़ों मुकदमों के लिए न्यायाधीशों का वेतन क्यों नहीं काटा जाता है। 

एक Tweet में तो सर्वोच्च न्यायालय के मनमाने तरीके के लिए न्यायाधीशों की चयन प्रक्रिया को दोषी बताया गया। लिखा है कि इनका चयन न तो चुनाव से होता है न ही किसी चयन परीक्षा से, बल्कि ये अपना खुद ही चयन कर लेते हैं। इससे भ्रष्टाचार का पूरा मौका मिलता है।

अनुज प्रजापति ने Tweet में लिखा कि जवाबदेह बनाने के लिए न्यायाधीशों की पूरी चयन प्रक्रिया को ही बदल देने की जरुरत है।

न्यायालयों के पतन का कारण काँलेजियम की चयन प्रक्रिया है
‘हम भारत के लोग’ का मानना है कि आज की न्यायपालिका में कॉलेजियम की चयन प्रक्रिया के कारण ही भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद का बोलबाला है।

आभास कुमार इस भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद को खत्म करने के लिए AIJS के तहत न्ययाधीशों के चयन की बात Tweet में लिखते हैं।

‘हम भारत के लोग’ न्यायालयों की हिन्दू विरोधी मानसिकता से इतने अधिक परेशान हैं कि एक Tweet में लिखा गया कि सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम सिस्टम पर सर्जिकल स्ट्राइक करने की आवश्यकता है।

योगेश ने Tweet मे लिखा कि जो मेडिकल और इंजनियरिंग की परीक्षा में फेल हो जाते हैं वे Presstitutes और Justitutes बन जाते हैं। इनमें से अधिकतर BA ही पास होते हैं।

सोशल मिडिया पर ‘हम भारत के लोग’ का कहना है कि न्यायाधीशों के चयन की प्रक्रिया के बदलने पर देश में बदलाव संभव है।

सर्वोच्च न्यायालय कॉलेजियम व्यवस्था बदलना ही नहीं चाहता है
कॉलेजियम व्यवस्था में सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और चार वरिष्ठ न्यायाधीशों की एक टीम उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति और तबादले की सिफारिश करती है। इनकी सिफारिशों को मानना सरकार के लिए जरूरी होता है। कॉलेजियम यह भी तय करता है कि उच्च न्यायालय से कौन सा न्यायाधीश, सर्वोच्च न्ययालय में पद्दोन्न्ति पर जाएगा। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने न्यायालयों के इस मनमाने ढंग को बदलने के लिए 15 अगस्त 2014 को कॉलेजियम की जगह NJAC का गठन किया था, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने 16 अक्टूबर 2015 को NJAC कानून को असंवैधानिक करार दिया। इस प्रकार वर्तमान में भी न्यायाधीशों की नियुक्ति और तबादलों का निर्णय सर्वोच्च न्यायालय का कॉलेजियम ही करता है।

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