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परिवारवाद की पोषक कांग्रेस पर मणिशंकर अय्यर के अटैक का क्या होगा असर?

अय्यर के सवालों के बहाने 'कांग्रेसी कुतर्क' को जायज ठहराने की कहानी तो नहीं ! रिपोर्ट

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सितंबर के आखिरी हफ्ते में अमेरिका के यूनिवर्सिटी ऑफ कैलीफोर्निया, बर्कले में कांग्रेस के ‘युवराज’ की कही गई एक बात कांग्रेस के भूत, वर्तमान और भविष्य की रूपरेखा बता गई। उन्होंने कहा था कि भारत वंशवाद से चलता है। इसी कड़ी में वे अखिलेश यादव, एम के स्टालिन, अभिषेक बच्चन, मुकेश अम्बानी के नामों का उदाहरण देते हुए परिवारवाद को सही ठहराने का प्रयास करने लगे।राहुल और वंशवाद के लिए चित्र परिणाम

दरअसल उन्होंने यह बात कहकर स्वयं को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाए जाने को लेकर उठ रहे सवालों को समाप्त करने का प्रयत्न किया था, लेकिन उनका यह प्रयत्न शायद उतना सटीक नहीं रहा जितना वे मान रहे थे। क्योंकि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर ने तंज कसते हुए अपना रोष व्यक्त किया है और कांग्रेस में आंतरिक लोकतंत्र के राहुल गांधी के दावे पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

कांग्रेस में आंतरिक लोकतंत्र पर मणिशंकर अय्यर के सवाल
ऐसा माना जा रहा है कि इसी महीने होने जा रहे संगठनात्मक चुनाव के बाद समूची कांग्रेस पर राहुल गांधी का वर्चस्व होगा, यानी राहुल को पार्टी की कमान सौंप दी जाएगी। लब्बोलुआब यह कि कांग्रेस की ताकत अब दस जनपथ (सोनिया का निवास) से निकलकर बारह तुगलक लेन (राहुल गांधी का निवास) में ‘कैद’ हो जाएगी, लेकिन कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं के लिए यह स्थिति सहज स्वीकार्य नहीं है।मणिशंकर अय्यर सोनिया राहुल के लिए चित्र परिणाम

मणिशंकर अय्यर ने अपना रोष इस तंज भरे अंदाज में व्यक्त किया, ”दो कांग्रेस के अगले अध्यक्ष हो सकते हैं। एक मां, एक बेटा। क्योंकि राहुल ने तो कह दिया खुलेआम कि मैं चुनाव लड़ने को तैयार हूं लेकिन चुनाव लड़ने के लिए विरोधी की आवश्यकता होती है। अब आप ढूंढिए, कोई मिल गया तो प्रसन्नता की बात है, चुनाव हो जाएगा। अब कोई विरोधी मिले ही नहीं, एक ही उम्मीदवार हो तो चुनाव कैसे हो पाएगा।”

परिवारवाद की पोषक है कांग्रेस
राहुल को अध्यक्ष बनाए जाने की चर्चा पहले भी होती रही है, लेकिन एक सवाल भी खड़ा होता है कि क्या दस जनपथ को मानने वाले राहुल को अध्यक्ष के रूप में स्वीकार करेंगे ? दरअसल यह तथ्य सभी जानते हैं कि कांग्रेस में सत्ता के दो केंद्र हैं। कांग्रेस का युवा गुट लोकसभा चुनाव के बाद से ही राहुल को अध्यक्ष बनाने के लिए प्रयासरत है, वहीं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल के नेतृत्व क्षमता को लेकर आशंकित हैं। इसके साथ यह भी सत्य है कि कोई भी ऐसा नहीं होगा जो सामने आकर राहुल गांधी की योग्यता और क्षमता पर सवाल खड़े करे। इसके साथ ही यह भी तय माना जा रहा है कि थोड़ा-बहुत जो भी विरोध का स्वर होगा उसे सोनिया गांधी अपने प्रभाव से दबा देंगीं और परिवारवाद को विजय दिला देंगी।

मणिशंकर अय्यर सोनिया राहुल के लिए चित्र परिणाम

वंशवाद केंद्रित कांग्रेस की राजनीति
दरअसल कुछ पार्टियों को यह लगता होगा कि वंशवाद पर केंद्रित रहना एक खूबी है, पर आगे चलकर यह भार बन जाता है। जैसे कि पूरा देश जानता है कि कांग्रेस परिवारवाद की पोषक है और राहुल गांधी कांग्रेस के ऊपर एक ‘भार’ हैं। दरअसल कांग्रेस पार्टी का ठोस स्वरूप में विस्तार होना तब तक संभव नहीं है जब तक कि वह अपने नेताओं का चुनाव योग्यता और क्षमता के आधार पर नहीं करती। इसके साथ यह भी तथ्य है कि राहुल गांधी की सबसे बड़ी योग्यता या क्षमता जो भी कह लीजिए, नेहरू गांधी परिवार से संबंध ही है। इसका स्वाभाविक राजनीतिक लाभ राहुल गांधी को मिल रहा है और योग्यता और क्षमता को नजरअंदाज किया जा रहा है।

कांग्रेस में बदलाव ला पाएंगे ‘युवराज’ ?
किसी बड़े पिता का पुत्र होना परिवारवाद नहीं है। परिवारवाद की समस्या एक के बाद एक लगातार कई वर्षों तक एक दल पर एक ही परिवार के लोगों का कब्जा रहना है। एकबारगी यह मान लिया जाए कि राहुल गांधी को अध्यक्ष बना दिया जाता है, तो क्या कांग्रेस के लिए सही होगा? दरअसल यह कांग्रेस के लिए बदलाव तो होगा, लेकिन यह असरकारी होगा या नहीं कहना कठिन है। दरअसल राहुल गांधी में राजनीतिक परिपक्वता का घोर अभाव नजर आता है। समय–समय पर उनके कई ऐसे बचकाने बयान आते हैं जो उनकी राजनीतिक समझ पर सवालिया निशान लगा देते हैं। तो क्या राहुल की योग्यता-क्षमता की सच्चाई से कांग्रेस मुंह चुरा रही है?

वंशवाद से बाहर क्यों नहीं सोचती कांग्रेस?
कांग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गांधी पिछले 18 सालों से इस पद पर हैं और अब उनके उत्तराधिकारी के तौर पर पुत्र इस पद की कमान संभालने के लिए तैयार हैं। जाहिर है कांग्रेस वंशवाद के दायरे से बाहर नहीं देखती। इस बात की पुष्टि तब भी हुई थी जब 8 अगस्त को कांग्रेस कार्यकारी समिति (CWC) की बैठक बुलाई तो गई थी भारत छोड़ो आंदोलन की 75वीं वर्षगांठ पर चर्चा के लिए, लेकिन बैठक खत्म होते-होते इसमें पार्टी के अगले नेतृत्व का मुद्दा हावी हो गया… हालांकि इसमें जो नाम उछला वह भी सोनिया गांधी की पुत्री प्रियंका गांधी का ही था। साफ है कि पार्टी का नेतृत्व संभालने के लिए सोनिया को अपने परिवार के बाहर के चेहरों पर भरोसा नहीं है। यानी पार्टी के अनुभवी चेहरे उनके लिए राजनीतिक मोहरे से ज्यादा नहीं।

राहुल के सीने पर चमकता रहेगा परिवारवाद का तमगा
लंबे समय बाद किसी कांग्रेसी नेता ने गांधी परिवार पर सीधा अटैक किया है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा आम है कि मणिशंकर अय्यर द्वारा उठाए गए सवाल कांग्रेस की एक सोची समझी योजना भी हो सकती है, क्योंकि कांग्रेस इस बहाने यह साबित करना चाहती है कि पार्टी में आवाज उठाने की आजादी है और सबकी सुनी जाती है। ताकि राहुल गांधी के नाम पर सर्वसम्मत निर्णय लेकर लोगों की आंखों में धूल झोंकी जा सके।

बहरहाल अमेरिका के दिए गए राहुल का यह कुतर्क कि भारत परिवारवाद से चल रहा है, इसलिए उचित नहीं कि आज भारत के राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री तीनों लोग मामूली परिवार से निकले हुए हैं। इनको कोई राजनीतिक विरासत नहीं मिली, बल्कि ये खुद अपने परिश्रम से अपनी राजनीतिक जमीन को तैयार किए और आज इस मुकाम पर पहुंचे हैं। हालांकि राहुल गांधी ने अपने कुतर्क के जरिये ही सही अध्यक्ष बनने का रास्ता साफ कर लिया है, लेकिन यह भी सत्य है कि तर्क और कुतर्क कितने भी कर लिए जाएं, ‘युवराज’ के सीने पर परिवारवाद का तमगा तो चमकता ही रहेगा।मणिशंकर अय्यर सोनिया राहुल के लिए चित्र परिणाम

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