Home नरेंद्र मोदी विशेष प्रधानमंत्री मोदी की कूटनीति ने उड़ायी चीन की नींद

प्रधानमंत्री मोदी की कूटनीति ने उड़ायी चीन की नींद

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चीन, भारत से कैलाश मानसरोवर यात्रा और ब्रह्मपुत्र नदी पर बातचीत करने के लिए तैयार है। चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के मेजर जनरल क्याव लिंयाग ने ग्लोबल टाइम्स में लिखा कि भारत के साथ डोकलाम विवाद पर युद्ध करने का दबाव बनाने वाले चीनी रणनीतिकार भूल जाते हैं कि भारत हमारा प्रतिद्वंद्वी है, दुश्मन नहीं है। जापान के प्रधानमंत्री ने एक भव्य रोड शो से अपनी यात्रा की शुरुआत की और भारत में पहली बुलेट ट्रेन परियोजना का शुभारंभ किया, इससे यह नहीं समझना चाहिए कि भारत और जापान मिलकर चीन को चुनौती दे सकते हैं। पिछले कुछ दिनों से चीन में डोकलाम विवाद सुलझने के बाद भारत को लेकर कुछ ऐसे बयान जारी किये जा रहे हैं।

पीएम मोदी की नीति से चीन की कमजोरी सामने आयी
भारत चीन संबंधों में डोकलाम विवाद एक मील का पत्थर साबित हुआ, जिसने चीन के रणनीतिक नजरिए को बदल दिया । एशिया में अपने को शक्ति की धुरी के रूप में स्थापित करने के साथ- साथ चीन विश्व में अमेरिका को पछाड़ कर विश्व शक्ति बनने के लिए जिस रणनीति पर चल रहा था उसमें आर्थिक और सैन्य शक्ति का महत्त्व अधिक था। लेकिन डोकलाम विवाद पर भारत ने जिस कूटनीतिक रणनीति को अपनाया उससे पूरा विश्व जनमत उसके साथ खड़ा हो गया और चीन को सड़क बनाने से ही नहीं रुकना पड़ा, बल्कि विवादित डोकलाम क्षेत्र से पीछे भी हटना पड़ा। इस घटनाक्रम से चीन को एहसास हुआ कि उसकी रणनीति में कमी है। चीन को यह समझ में आ गया कि उसकी रणनीति की सबसे कमजोर कड़ी कूटनीति है जिसमें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मात दे दी है।

चीन ने भी अपनी कमजोरी मानी

भारत की कूटनीति के सामने चीन की सैन्य और आर्थिक शक्ति बौनी नजर आने लगी। रणनीति में कूटनीति की इसी ताकत को पहचानते हुए 12 सितंबर, 2017 को चीन की सेना के मेजर जनरल क्याव लिंयाग ने ग्लोबल टाइम्स में लिखा कि हर विवाद को सुलझाने के लिए सैन्य शक्ति की ही जरूरत नहीं पड़ती है, बातचीत से भी हल निकाला जा सकता है,भारत से युद्ध की बात करने वाले रणनीतिकार चीन की रणनीतिक स्थिति भूल जाते हैं। उनके उसी लेख का एक महत्वपूर्ण अंश चीन की रणनीति में कूटनीति की जरूरत को समझने के लिए काफी है।

मोदी की कूटनीति से भौंचक्का रह गया चीन
विश्व की निगाहें इस समय एशिया में भारत और चीन पर टीकी हुई हैं, क्योंकि इन दोनों देशों में जो देश एशिया में अपने प्रभुत्व को स्थापित कर सकेगा उसी देश की 21 वीं सदी में तूती बोलेगी। प्रधानमंत्री मोदी ने जिस तरह से एशिया ही नहीं विश्व के सभी देशों के हितों को भारत के हित के साथ जोड़कर आगे बढ़ने की नीति अपनायी उसकी ताकत का आभास चीन को डोकलाम विवाद तक नहीं था। इस विवाद के दौरान भारत की कूटनीति की ताकत को देखकर चीन भौंचक्का रह गया। जब सभी प्रोपेगेंडा वार के बावजूद दुनिया के किसी देश ने भारत पर किसी तरह का दबाव नहीं बनाया, बल्कि अमेरिका और जापान खुलकर समर्थन में खड़े हो गये। इस झटके से चीन ने सबक सीखने का प्रयास शुरू कर दिया है और अपनी रणनीति में कूटनीति को प्रमुखता देने का काम कर रहा है।

प्रधानमंत्री मोदी की रणनीति में कूटनीति
अंतरराष्ट्रीय संबंधों में देशों के बीच एक तरह का पावर गेम चलता है, इस पावर गेम में कौन सा देश किस देश के हितों को सबसे अधिक पूरा कर सकता है, उसी के आधार पर रिश्तों की प्रगाढ़ता निर्भर करती है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस पावर गेम में चीन को उलझा कर रख दिया। 26 मई, 2014 को प्रधानमंत्री का पद ग्रहण करने से ही उन्होंने इसकी शुरुआत कर दी थी। उनकी हर विदेशी यात्रा और विश्व नेताओं से मुलाकात का मकसद था दुनिया को यह समझाना  कि भारत के पास दुनिया को देने के लिए सब कुछ है। उन्होंने सभी देशों को अपनी ओर आकर्षित किया। जापान और अमेरिका से रिश्तों को प्रगाढ़ किया। एक्ट ईस्ट नीति के तहत आशियान देशों से व्यापारिक ,सामरिक और सांस्कृतिक समझौते किये, इसी कड़ी में देश के इतिहास में पहली बार होगा कि 2018 के गणतंत्र दिवस पर आशियान के दसों शासनाध्यक्षों को अतिथि के रूप में आमंत्रित किया है। विश्व के देशों ने भारत के साथ रिश्तों को मजबूत करने में अपना भी फायदा देखा, इस तरह से प्रधानमंत्री मोदी ने मजबूत रिश्तों की एक श्रृखंला खड़ी कर दी।

भारत-जापान-अमेरिका की दोस्ती से बचने के लिए चीन की कूटनीतिक चालें
चीन ने रणनीति बदल दी है लेकिन उसने उद्धेश्य नहीं बदला है। वह एशिया में और विश्व में अपना प्रभुत्व स्थापित करने के लिए लालयित है। अपनी बदली हुई रणनीति के तहत ही वह हर समस्या को भारत के साथ बातचीत करके सुलझाने का प्रस्ताव देने के साथ-साथ यह भी कह रहा है कि उसका भारत, जापान और अमेरिका के प्रगाढ़ होते रिश्तों से तब तक कोई दिक्कत नहीं है जब तक चीन के हितों को कोई नुकसान नहीं पहुंचता। चीन, भारत से रिश्तों को रणनीतिक तौर पर बेहतर करके भारत-जापान-अमेरिका के त्रिदेव की शक्ति में सेंध लगाना चाहता है, ताकि उसके हितों के खिलाफ अमेरिका और जापान एक साथ न आ सके।

प्रधानमंत्री मोदी ने जापान के प्रधानमंत्री के साथ अहमदाबाद में रोड शो करके और बुलेट ट्रेन परियोजना का शुभारंभ करके चीन को कूटनीति की भाषा में समझा दिया है कि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग को अच्छा दोस्त बनने का पहला मौका मिला था, जो उसने नासमझी में गंवा दिया।

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