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तीन साल मोदी सरकार, अंतरिक्ष में भी आई बहार

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तीन साल में मोदी सरकार के कार्यकाल के दौरान सैटेलाइट लॉन्चिंग के क्षेत्र में भारत ने विश्व में एक बहुत बड़ा स्थान बना लिया है। ISRO ने एक बार में अलग-अलग देशों के 104 सैटेलाइट अंतरिक्ष में पहुंचाकर देश को जो प्रतिष्ठा दिलाई है उसकी जितनी भी प्रशंसा की जाए वो कम है। अगर हमारे वैज्ञानिकों के चलते देश का नाम रोशन हो रहा है, तो इसके पीछे देश के मजबूत और दूरदृष्टि वाले राजनीतिक नेतृत्व का हाथ है। पीएम मोदी के विजन का ही परिणाम है कि भारत ने इकट्ठे 104 सैटेलाइट छोड़कर वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया है। साथ ही अपने खर्च पर दक्षिण-एशियाई देशों के लिए सैटेलाइट का प्रक्षेपण करके क्षेत्रीय सहयोग और सह-अस्तित्व की भावना को भी धरातल पर उतारने में सफल रहा है। इन्हीं सफलताओं से प्रभावित होकर NASA ने अब ISRO के साथ मिलकर एक सैटेलाइट बनाने का निर्णय लिया है।

अर्थ मॉनिटरिंग सैटेलाइट बनाएंगे ISRO-NASA
हाल के समय में ISRO के वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष के क्षेत्र में कई कीर्तिमान बनाए हैं। इसी से प्रभावित होकर अमेरिकी स्पेस एजेंसी NASA ने ISRO से हाथ मिलाकर रिसर्च के क्षेत्र में कदम बढ़ाना शुरू कर दिया है। समाचार पोर्टल जनसत्ता के अनुसार अमेरिकन स्पेस एजेंसी NASA और ISRO के साथ मिलकर जो अर्थ मॉनिटरिंग सैटेलाइट बनाएंगे उसका नाम होगा NISAR (NASA-ISRO Synthetic Aperture Radar satellite)। माना जा रहा है कि ये दुनिया की सबसे मंहगी इमेजिंग सैटेलाइट हो सकती है। बताया जा रहा है कि इसकी लागत करीब 9,600 करोड़ रुपये हो सकती है। माना जा रहा है कि इस सैटेलाइट से भूकंप, ज्वालामुखी, जंगल में फैली आग, समुद्री जलस्तर में बढ़ोत्तरी जैसी घटनाओं पर नजर रखी जा सकेगी और उसका अध्ययन किया जा सकेगा।

विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यता की खोज
NASA और ISRO मिलकर सिर्फ पहला सैटेलाइट ही नहीं तैयार कर रहे हैं। स्पेस रिसर्च के क्षेत्र में दुनियाभर में प्रतिष्ठित दोनों संगठन विश्व की संभवत: सबसे प्राचीन सभ्यता के राज भी तलाशने वाले हैं। समाचार पोर्टल नवभारत टाइम्स के अनुसार हरियाणा सरकार फतेहाबाद जिले के कुणाल गांव में सरस्वती नदी के पुनरुद्धार के लिए जो उत्खनन का कार्य करवा रही है उसमें अति विकसित हड़प्पा से भी पुरानी सभ्यता के अवशेष मिले हैं। बताया जा रहा है कि वो सभ्यता 6 हजार साल से भी अधिक पुरानी हो सकती है। जानकारी के अनुसार इस साल अक्टूबर से ISRO के वैज्ञानिकों के साथ मिलकर NASA की टीम जांच में जुटेगी और इस बात का अध्ययन करेगी कि क्या हरियाणा के कुणाल गांव में मिले सभ्यता के अवशेष दुनिया की सबसे पुरानी सभ्यता के हैं? बताया जा रहा है कि वहां हुई अबतक की खुदाई में आभूषण, मनके, हड्डियों के मोती मिले हैं।

दक्षिण एशिया के लिए ISRO बना वरदान

इसरो ने इसी महीने की 5 तारीख को श्रीहरिकोटा में साउथ एशिया सैटेलाइट GSAT-9 को लॉन्च किया। इस सैटेलाइट से पाकिस्तान को छोड़कर बाकी साउथ एशियाई देशों को कम्युनिकेशन की सुविधा मिल रही है। इस मिशन में अफगानिस्तान, भूटान, नेपाल, बांग्लादेश, मालदीव और श्रीलंका शामिल हैं। इस प्रोजेक्ट पर 450 करोड़ रुपए का खर्च आया है। यह सैलेटाइट 2230 किलो का है जिससे कम्युनिकेशन की सुविधा मिलेगी। ये उपग्रह प्राकृतिक संसाधनों का खाका बनाने, टेली मेडिसिन, शिक्षा क्षेत्र, आईटी और लोगों से लोगों का संपर्क बढ़ाने के क्षेत्र में पूरे दक्षिण एशिया के लिए एक वरदान साबित होगा। इसके माध्यम से भूकंप, चक्रवात, बाढ़, सुनामी जैसी आपदाओं के समय संवाद कायम करने में मदद मिल सकेगी।

एक साथ 104 सैटेलाइट छोड़कर रचा इतिहास

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान, इसरो ने इसी साल एक साथ 104 उपग्रह लांच करके एक नया इतिहास रच दिया। सारी दुनिया इसरो की इस सफलता को देखकर दंग रह गई। इससे पहले एक अभियान में इतने उपग्रह एक साथ कभी नहीं छोड़े गए। एक अभियान में सबसे ज्यादा 37 उपग्रह भेजने का विश्व रिकार्ड रूस के नाम था। यह प्रक्षेपण श्रीहरिकोटा स्थित अंतरिक्ष केंद्र से किया गया। इस अभियान में भेजे गए 104 उपग्रहों में से तीन भारत के थे। विदेशी उपग्रहों में 96 अमेरिका के तथा इजरायल, कजाखिस्तान, नीदरलैंड, स्विटजरलैंड और संयुक्त अरब अमीरात के एक-एक थे। इससे पहले इसरो ने जून 2015 में एक मिशन में 23 उपग्रह लांच किए थे। 

अन्य बड़ी उपलब्धियां-

मंगलयान पहले ही प्रयास में मंगल ग्रह तक पहुंचने में कामयाब रहने वाला भारत पहला देश है। अमेरिका के मेडिसन स्क्वायर गार्डन में मंगलयान अभियान की सफलता का जिक्र करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि अहमदाबाद में ऑटो रिक्शा से एक किलोमीटर जाने पर 10 रुपए का खर्च आता है, लेकिन हमारे मंगलयान द्वारा तय की गई यात्रा पर तो महज सात रुपए प्रति किलोमीटर का खर्च आया। उन्होंने कहा कि हमारे मंगल अभियान का खर्च हॉलीवुड की एक चर्चित साइंस फिक्शन फिल्म की लागत से भी कम था।

खुद का नेविगेशन सिस्टमः इसरो ने 28 अप्रैल 2016 को देश का सातवां नेविगेशन उपग्रह IRNSS (इंडियन रीजनल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम) लांच करके अमेरिका के जीपीएस सिस्टम के समान अपना खुद का नेविगेशन सिस्टम बना दिया। इससे पहले अमेरिका, रूस और चीन के पास यह सिस्टम है।

 

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