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नेहरू ने करवाई थी नेताजी के परिवार की जासूसी

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आज भी नेताजी सुभाष चंद्र बोस की लोकप्रियता देश के किसी भी जन नायक से अधिक है। आजादी के बाद, स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास को लिखने वाले कांग्रेस के दौर में नेताजी जैसे क्रांतिकारियों के योगदान पर बहुत कुछ छिपाया या बदला गया। नेताजी की लोकप्रियता उनके अपने व्यक्तित्व और साहसिक कार्यों से है। दूसरी तरफ जवाहरलाल नेहरू की लोकप्रियता  महात्मा गांधी के साथ चलने के कारण बनी। नेताजी, अगर जवाहर लाल नेहरू की सराहना करते हैं और उनके नाम पर आजाद हिंद फौज में एक ब्रिगेड का नाम रखते हैं तो नेहरू, नेताजी को अपना राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी मानते हैं और उनके आजादी पाने के रास्ते की जमकर आलोचना  करते हैं।

शायद, देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के मन में सत्ता की लालसा ने उन्हें नेताजी के विरोध में लाकर खड़ा कर दिया। यह कहना कोई अनुचित नहीं है कि सोच और काम करने के तरीकों में जवाहर लाल नेहरू, नेताजी का हरसंभव विरोध किया करते थे।

नेहरू ने नेताजी का कभी साथ नहीं दिया-  पंडित जवाहर लाल नेहरू, नेताजी पर विश्वास नहीं करते थे और किसी भी परिस्थिति में उनका साथ देने को तैयार नहीं होते। यह बात स्वयं नेताजी ने एक पत्र में अपने भतीजे अमिय बोस को 17 अप्रैल 1939 में लिखते हुए कही है। नेताजी ने यह पत्र कांग्रेस के त्रिपुरा अधिवेशन के बाद लिखा था। 1939 के त्रिपुरा अधिवेशन में नेताजी ने महात्मा गांधी द्वारा अध्यक्ष पद के लिए मनोनीत उम्मीदवार पट्टाभि सीतारमैया को हरा दिया था। चुनाव से पहले नेताजी ने नेहरू से समर्थन मांगा था, नेहरू समर्थन देने को तैयार भी हो गये लेकिन अंतिम समय में नेहरू ने साथ नहीं दिया। नेहरू और गांधी के समर्थन न मिलने के बावजूद नेताजी कांग्रेस के अध्यक्ष चुन लिए गये, लेकिन जब नेताजी ने देखा कि इस तरह तो कांग्रेस दो धड़ों में बंट जाएगी जो देश के लिए हानिकारक होगा, तो उन्होंने इस्तीफा दे दिया। नेताजी द्वारा अचानक दिए गये इस इस्तीफे से पूरा राष्ट्र अवाक रह गया था। लेकिन नेताजी ने 17 अप्रैल 1939 के पत्र में लिखा  “Nehru hurt me with his conduct. Had he been neutral in Tripura, my position would have been much stronger”.

इसी पत्र में वह लिखते हैं कि इससे नेहरू की कांग्रेस में स्थिति खराब ही हुई  ” Nehru was hooted and jeered when he rose to speak at the convention”

इतिहासकार रूद्रांगशु मुखर्जी 2014 में आई किताब नेहरू ऐंड बोसः पैरेलल लाइव्स में कहती हैं, ‘‘बोस मानते थे कि वे और जवाहर लाल मिलकर इतिहास बना सकते थे लेकिन जवाहर लाल को गांधी के बगैर अपनी नियति नहीं दिखती थी जबकि गांधी के पास सुभाष के लिए कोई जगह नहीं थी।’

नेहरु ने नेताजी की जासूसी करवाई- जवाहर लाल नेहरू को जासूसी जासूसी जैसे काम से बहुत नफरत थी। इस तथ्य को आईबी के पूर्व मुखिया बी.एन. मलिक ने 1971 में लिखी किताब माइ ईयर्स विद नेहरू में उजागर किया है, प्रधानमंत्री को इस काम (जासूसी) से इतनी चिढ़ थी कि वे हमें दूसरे देशों के उन खुफिया संगठनों के खिलाफ भी काम करने की अनुमति नहीं देते जो भारत में अपने दूतावास की आड़ में काम करते थे।’‘ लेकिन  1948 से 1968 के बीच दो दशकों तक सरकार ने बोस परिवार के सदस्यों की गहन जासूसी करवाई। सरकारी जासूस उस स्वतंत्रता सेनानी के परिजनों के पत्र पढ़ते और दर्ज करते रहे जो 25 वर्ष तक नेहरू का राजनैतिक सहकर्मी रहा था। आईबी के जासूस इस परिवार के सदस्यों का उनकी घरेलू और विदेश यात्राओं के दौरान लगातार पीछा करते रहे और उनसे मिलने वालों और उनकी बातों के महीन से महीन विवरणों को रिकॉर्ड करते रहे। यह निगरानी बिल्कुल उसी तर्ज पर थी जैसा आज किसी वांछित आतंकवादी के परिवार पर रखी जाती है-बेहद सघन, व्यवस्थित और सतर्कता भरी।

आधी सदी से ज्यादा समय तक ऐसे तमाम सूचनाओं की फाइलें कोलकाता स्थित राज्य आईबी मुख्यालय के दराजों में बंद पड़ी थीं। 2015 में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने उन पर से गोपनीयता का परदा हटाकर, दिल्ली के राष्ट्रीय अभिलेखागार में जनता के लिए खोल दिया।

पंडित जवाहर लाल नेहरू ने नेताजी के साथ हमेशा एक अविश्वास का रिश्ता बनाए रखा और इसी अविश्वास का नतीजा है कि नेताजी की मृत्यु के बारे में देश को आज तक कोई सही जानकारी नहीं मिल सकी है। 

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