Home विपक्ष विशेष राहुल की ‘राजशाही’ कांग्रेस, संसद में चर्चा बर्दाश्त नहीं !

राहुल की ‘राजशाही’ कांग्रेस, संसद में चर्चा बर्दाश्त नहीं !

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संसद से 125 करोड़ जनता की आस जुड़ी है। लोगों को उम्मीद रहती है कि संसद में उनकी समस्याओं पर विचार-विमर्श करके हल निकाला जाएगा। लेकिन, 2014 में जब से श्री नरेंद्र मोदी की सरकार सत्ता में आई है, कांग्रेस ने बार-बार संसद की कार्यवाही को बाधित करने का प्रयास किया है। सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के व्यवहार से लगता है कि उसने अबतक सत्ता से हटना स्वीकार नहीं किया है। वो लगातार विध्वंसक राजनीति को बढ़ावा देती आ रही है।

बेशर्मी पर उतर आई है कांग्रेस
कांग्रेस के 6 सांसदों ने सोमवार को लोकसभा में जिस तरह का बर्ताव किया उसने पूरे लोकतंत्र को शर्मसार किया है। कांग्रेसी सांसद ने लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन की ओर जिस तरह से कागज फाड़कर फेंका उससे देश की आत्मा आहत हुई है। संसदीय नियमों के तहत महाजन ने भले ही कांग्रेसी सांसदों गौरव गोगोई, के सुरेश, अधीर रंजन चौधरी, रंजीत रंजन, सुष्मिता देव और एम के राघवन को पांच दिनों के लिये सदन से निलंबित कर दिया है, लेकिन इतने भर से क्या उनका कलंक धुल जायेगा ?

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हिटलरवादी प्रवृत्ति की जकड़ में कांग्रेस
यह पहला अवसर नहीं है, जब कांग्रेस ने संसद में चर्चा के मार्ग को छोड़कर हिटलरशाही प्रवृत्ति अपनाया है। 2015 के मानसून सत्र के दौरान भी संसद के अंदर कांग्रेस ने अपनी हिटलरवादी मानसिकता दिखाई थी और लगातार कई दिनों तक लोकसभा में हंगामा किया था। जब कांग्रेसी सांसदों की ओर से बार-बार प्लेकार्ड के साथ नारेबाजी से अध्यक्ष सुमित्रा महाजन तंग आ गईं तो, उन्हें 4 अगस्त, 2016 को 25 कांग्रेसी सांसदों को निलंबित करना पड़ा था। फिर भी कांग्रेस ने अपने तेवर ढीले नहीं किये थे। बाकी बचे कांग्रेसी सांसद, अन्य दलों के सासंदों के साथ, सदन परिसर में ही धरने पर बैठ गये और कई दिनों तक प्रदर्शन किया। हैरानी की बात है कि अपनी करतूतों को देखने के बावजूद पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने तब एक बहुत ही निर्लज्ज बयान दिया, “Voice of the opposition is being suppressed in Parliament.”

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लोकतंत्र का अपमान करती है कांग्रेस
मोदी सरकार पर लगातार विपक्ष की आवाज दबाने का आरोप लगाने वाले राहुल गांधी ने, 27 सितंबर, 2013 को तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और उनकी सरकार को सरेआम बेइज्जत कर दिया था। दरअसल उस दिन तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अमेरिका दौरे पर थे। तभी राहुल गांधी , दिल्ली प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय माकन के साथ प्रेस क्लब पहुंचे और मनमोहन सरकार द्वारा लाये गये अध्यादेश की प्रतियों को फाड़कर हवा में उड़ा दिया। उस समय राहुल ने डिंग मारते हुये कहा कि,-“we must stop making these small compromises. When we make these small compromises, we compromise everything, I don’t care what leaders of other parties and what the opposition is saying, I am concerned about our party. And as far as the ordinance is concerned, what the Government has done is wrong.” जबकि दुनिया जानती है कि मनमोहन सिंह सिर्फ प्रधानमंत्री की औपचारिकताएं निभा रहे थे और राहुल और उनकी मां सोनिया के इशारे के बिना सरकार में एक पत्ता भी हिलना नामुमकिन था।

अलोकतांत्रिक व्यवहारों का लंबा इतिहास
जैसा राजा होता है, वैसी ही प्रजा होती है। राहुल जिस परिवारवाद के प्रभाव में राजशाही मानसिकता वाला व्यवहार करते हैं, उनके इशारे और उनके संरक्षण में उनकी पार्टी के सांसद भी वही करतूतें दोहराते हैं। यही कारण है कि आज ही नहीं, यूपीए सरकार के दौरान भी कांग्रेसी सांसद अनुशासन को ठेंगा दिखाते रहे हैं। एक घटना 13 फरवरी, 2104 की है जब लोकसभा में तत्कालीन गृहमंत्री सुशीलकुमार शिंदे तेंलगाना राज्य के गठन का बिल पेश कर रहे थे। उसी समय कांग्रेसी सांसद और तेलंगाना के कुछ सांसदों ने एक- दूसरे से मारपीट करने लगे। मामला यहीं शांत नहीं हुआ। तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष मीराकुमार की मेज पर रखा कांच का ग्लास भी तोड़ दिया गया और माइक पर भी प्रहार कर दिया गया। हद तो तब हो गई जब हाथापाई और गुत्थम-गुत्था के बीच कांग्रेसी सांसद एल राजगोपाल ने सांसदों के ऊपर काली मिर्च का स्प्रे छिड़क दिया। तब जाकर लोकसभा अध्यक्ष को आरोपी सांसदों को निलंबित करना पड़ा।

मीरा कुमार ने कांग्रेसी सांसदों को मार्शल से निकलवाया था
इससे पहले भी कांग्रेसी सांसदों ने तेलंगाना के मुद्दे पर 03 सितंबर, 2013 को भी लोकसभा में जबरदस्त हंगामा किया था। हंगामा इतना अधिक बढ़ चुका था कि लोकसभा अध्यक्ष मीराकुमार को सभी पांच आरोपी सांसदों को सत्र के शेष दिनों के लिये निलंबित करना पड़ गया। लेकिन वो सांसद तब भी मानने के लिये तैयान नहीं हुए और आसन के पास धरना देकर बैठ गये। अंत में मीरा कुमार को मार्शल बुलवाकर सबको सदन से बाहर करना पड़ा।

तथ्य ये है कि कांग्रेसी सांसदों की नागवार हरकतों के लिये अबतक लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने वैसा कोई कठोर निर्णय नहीं लिया है, जो पिछले कार्यकाल में स्पीकर मीरा कुमार को करना पड़ा था। अगर कांग्रेस तब भी विपक्ष की आवाज दबाने का राप अलापती है, तो वो उसकी सियासी मजबूरी हो सकती है। लेकिन देश की 125 करोड़ जनता इतनी अबोध नहीं है।

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