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सिख-हिंदू टकराव की पृष्ठभूमि तैयार कर रही है कांग्रेस!

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बीते बहुत कम अंतराल में पंजाब में एक के बाद एक कई प्रमुख हिंदू नेताओं की हत्या हो चुकी है। आतंकवादियों की ओर से आये दिन हिंदू नेताओं को धमकियां मिल रही है। पंजाब का खुफिया तंत्र बुरी तरह फेल हो चुका है और हत्याओं का रहस्य अभी तक बरकरार है। इन सब के बीच बड़ा सवाल राज्य के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह की चुप्पी को लेकर है। आखिर हिंदू नेताओं की हत्या पर इतनी खामोशी क्यों? क्या एक बार फिर पंजाब में हिंदू-सिख दंगे की पृष्ठभूमि तैयार हो रही है?

दस दिन में दो हिंदू नेताओं की हत्या
अमृतसर में 30 अक्टूबर को भीड़भाड़ वाले इलाके में अज्ञात हथियारबंद हमलावरों ने हिंदू संघर्ष समिति के अध्यक्ष विपिन शर्मा पर दिनदहाड़े गोलियां बरसाकर उन्हें मौत के घाट उतार दिया। पंजाब में हाल के दिनों में हिंदू नेता की हत्या का यह दूसरा मामला है। दो सप्ताह के भीतर हिंदू नेता की हत्या की दूसरी घटना से पंजाब में दहशत का माहौल है। 17 अक्तूबर को लुधियाना में आरएसएस नेता रवींद्र गोसाई की भी दिनदहाड़े गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इस हत्याकांड के मामले में भी अभी तक पुलिस को कोई सुराग हाथ नहीं लगा है। जाहिर है सवाल उठ रहे हैं कि जब हमलावर सीसीटीवी की फुटेज में कैद हैं तब इतनी देर क्यों हो रही है? आखिर पंजाब की कांग्रेस सरकार खामोश क्यों है?

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हिंदू-बनाम सिख मुद्दा बनाने की कोशिश
इन हत्याओं के पीछे साजिश की बू इसलिए आ रही है क्योंकि इन हत्याओं को अंजाम देने का तरीका लगभग एक जैसा है और हत्या के लिए एक ही किस्म के घातक हथियारों का उपयोग किया गया है। इन हत्याओं में अधिकतर .32 बोर रिवॉल्वर और 9 एमएम गन का उपयोग किया गया है। हिंदू नेताओं पर हमले करने वाले ज्यादातर हमलावर दोपहिया वाहनों पर ही सवार होकर आते हैं और उनके मुंह ढके होते हैं। जाहिर है एक ही पैटर्न से की गई ये हत्याएं संदेह पैदा करती हैं कि प्रदेश में किसी बड़ी साजिश की योजना बनाई जा चुकी है। 

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ISI की साजिश का शिकार हो रहा पंजाब
हिंदू-सिख के बीच दूरी इसलिए बनाई जा रही है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने कुछ दिनों पहले कहा था कि सिख धर्म हिंदू धर्म का ही एक हिस्सा है। इसी बात को आधार बनाकर ISI ने सिखों और हिंदुओं के बीच बड़ा दंगा करवाने की साजिश रची है, लेकिन सबसे विशेष यह है कि कांग्रेस की सरकार इतना कुछ जानते हुए भी खामोश है। गुरु ग्रंथ साहिब के पन्ने फाड़ने की साजिश के तहत पहले भी पंजाब में दंगे हो चुके हैं। खालिस्तानी उग्रवादी संगठन 1984 के दंगों को आधार बनाकर हिंदू और सिख समुदायों को बांटने में लगा है, जबकि सच्चाई यह है कि पंजाब में फैले उग्रवाद के कारण 20 हजार से अधिक हिंदू परिवार प्रभावित हुए थे। जाहिर है कांग्रेस सरकार की फूट डालो राज करो की नीति से कभी भी कोई बड़ा बखेड़ा खड़ा हो सकता है। 

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अकाल तख्त का हो रहा सियासी इस्तेमाल
पंजाब में खालिस्तान समर्थक अलग देश बनाने की ख्वाहिश रखते हैं। पाकिस्तान के इशारे पर ये कई बार पंजाब में आग लगाने की कोशिश कर चुके हैं। खास बात यह कि इनके इशारों पर कई बार अकाल तख्त के कई नाम भी काम करता हुआ दिखता है। हाल में ही अकाल तख्त के जत्थेदार गुरबचन सिंह ने कहा है कि RSS से संबद्ध राष्ट्रीय सिख संगत का बायकॉट तब तक जारी रहेगा जब तक यह संगठन सिखों को लेकर अपने एजेंडे को स्पष्ट नहीं करता। दरअसल कट्टरपंथ का वह नमूना है जिसने अभी इस्लाम और इससे संबंधित कई देशों को अपने जंजाल में जकड़ कर रखा है। दरअसल इनका मकसद है कि हिंदुओं और सिखों के बीच एक विभाजन की रेखा खिंची रहे जिससे अकाल तख्त के कर्ता-धर्ता अपनी अहमियत को प्रासंगिक ठहरा सकें।

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कांग्रेस सरकार ने खींची विभाजन की रेखा
खालिस्तान समर्थकों की पीड़ा आरएसएस से जुड़े सिखों को लेकर जगजाहिर होती रही है और पंजाब की कांग्रेसी सरकारें उनके इस विरोध को समर्थन देती रही हैं। दरअसल सिखों को RSS से जोड़ने के लिए RSS ने नवंबर 1986 में राष्ट्रीय सिख संगत स्थापित की थी। जिसका मकसद हिंदू और सिखों को करीब लाना था। 2014 तक पूरे देश में 450 से अधिक राष्ट्रीय सिख संगत की इकाइयों थीं, जिनमें से 15 से अधिक पंजाब में थी। इतना ही नहीं पंजाब में RSS शाखाओं की संख्या 900 के आसपास हो गई है, जो कि 2014 में करीब 600 थी। दरअसल तत्कालीन RSS प्रमुख के.एस. सुदर्शन ने 2012 में कहा था कि सिख धर्म हिंदू धर्म का ही एक परिवर्तित रूप है। कांग्रेस ने अपनी फूट डालो और राज करो की राजनीति के तहत इसी बयान को अपनी राजनीति का हिस्सा बना लिया है और हिंदुओं और सिखों के बीच दूरी बढ़ने देने की नीति पर चल रही है।

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पाकिस्तान के काम को आसान कर रही कांग्रेस !
खालिस्तान समर्थक सिख कट्टरपंथी पाकिस्तान के इशारों पर अपने काम को अंजाम दे रहे हैं। इसी के तहत ये सिख संगत को सिख विरोधी कह रहे हैं। बब्बर खालसा इंटरनेशनल नाम के खालिस्तानी संगठन ने 2009 में राष्ट्रीय सिख संगत के अध्यक्ष रुलदा सिंह की पटियाला में गोली मार कर हत्या कर दी थी। इसके बाद कई वरिष्ठ RSS नेताओं को निशाना बनाया गया। जनवरी 2016 को लुधियाना के RSS सचिव नरेश कुमार पर हमला किया गया, हालांकि नरेश कुमार इस हमले के बाद जीवित बच गए। फरवरी 2016 में लुधियाना के किदवई नगर में चलाई जा रही RSS शाखा पर गोलियां बरसाई गई, संयोगवश कोई भी RSS कार्यकर्ता घायल नहीं हुआ। अगस्त 6, 2016 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के उपाध्यक्ष, ब्रिगेडियर (सेवानिवृत) जगदीश गगनेजा पर हमला हुआ, कुछ दिनों के बाद उनकी मौत हो गई। 17 अक्टूबर को लुधियाना के कैलाश नगर में एक और वरिष्ठ RSS नेता रविंद्र गोस्वामी को गोलियों का शिकार बनाया गया, रविंद्र गोसाई स्थानीय शाखा के प्रमुख थे।

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आरोपियों की धर-पकड़ में ढिलाई क्यों ?
इन हिंदू नेताओं की हत्या के मामले में से कई हत्या की जांच सीबीआई कर रही है। हत्या के कई मामलों में सीबीआई की जांच भी लगभग खत्म हो गई है। सीबीआई ने जनवरी 2016 और जुलाई 2017 के बीच हमले में मारे गए आरएसएस, शिवसेना, श्री हिंदू तख्त और दूसरे नेताओं के अनुयायियों के हमले में इस्तेमाल किए गए 33 बुलेट सीएफएसएल केंद्रीय फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी को सौंपे थे। सीबीआई की जांच में सामने आया है कि हिंदू नेताओं पर ज्यादातर हमले शनिवार को हुए। कई हमलों के सीसीटीवी फुटेज भी हैं, लेकिन हिंदू नेताओं पर हो रहे हमलों में शामिल सभी अपराधी पुलिस की पकड़ से बाहर हैं। जाहिर है पंजाब की कांग्रेस सरकार इन मामलों को जिंदा रखना चाहती है ताकि विभाजन की राजनीति की जा सके और अपनी सत्ता बचाई जा सके।

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