Home विपक्ष विशेष अस्तित्व बचाने में भी सक्षम नहीं हो पा रही कांग्रेस !

अस्तित्व बचाने में भी सक्षम नहीं हो पा रही कांग्रेस !

कांग्रेस में मची भगदड़ पर विश्लेषणात्मक रिपोर्ट

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गुजरात कांग्रेस के छह विधायकों ने पार्टी छोड़ दी, कई और विधायक पार्टी छोड़ने को तैयार बैठे हैं। आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? बजाय इस सवाल का जवाब ढूंढने के पार्टी ने अपने 40 विधायकों को बेंगलुरु में ‘कैद’ कर रखा है। संभवत: कांग्रेस राज्यसभा चुनाव की प्रक्रिया पूरी होने तक इन्हें अपनी निगरानी में ही रखना चाहेगी। लेकिन इन सबके बीच भी ये अंदेशा बना हुआ है कि 10-12 अन्य विधायक भी पार्टी छोड़ने को तैयार बैठे हैं। इसके अलावा राज्यसभा चुनाव में कई अन्य विधायकों द्वारा क्रॉस वोटिंग की भी संभावना है। बहरहाल इस प्रकरण के बीच ये सवाल मौजू बनकर उभरा है कि आखिर कांग्रेस में ये भगदड़ क्यों मची है?

कई राज्यों में कांग्रेस को मिले झटके
गुजरात, गोवा, मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश में पार्टी के भीतर विद्रोह पार्टी की अपनी गलत नीतियों के कारण हुए हैं, लेकिन कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को होश नहीं है। बजाय आत्ममंथन के पार्टी बीजेपी पर दोषारोपण करती रही है। पार्टी के भीतर की समस्याओं के लिए भी वह बीजेपी को ही जिम्मेदार ठहराती रही है। शायद यही कारण है कि कांग्रेस पार्टी अपने सबसे खराब दौर से गुजर रही है।

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राणे और बिरेन सिंह ने छोड़ी पार्टी
मार्च, 2017 में सरकार बनाने में नाकाम रहने पर गुजरात कांग्रेस के कद्दावर विधायक विश्वजीत राणे ने तो नेतृत्व के खिलाफ बगावत कर पार्टी छोड़ दी थी। इसी तरह कांग्रेस से भाजपा में शामिल हुए बीरेन सिंह मणिपुर के सीएम बन गए हैं। इससे पहले उत्तराखंड में विजय बहुगुणा और उत्तर प्रदेश में रीता बहुगुणा जोशी जैसी कद्दावर नेता ने भी कांग्रेस का साथ छोड़ दिया था। अरुणाचल प्रदेश में पेमा खांडू दिसंबर, 2016 में कांग्रेस छोड़ पीपुल्स पार्टी ऑफ अरुणाचल प्रदेश में शामिल हुए और फिर बीजेपी में चले गए।

अक्षम नेतृत्व के कारण भगदड़
दिल्ली महिला आयोग की पूर्व अध्यक्ष और कांग्रेस की नेता बरखा शुक्ला सिंह ने ये कहते हुए कांग्रेस पार्टी छोड़ दी थी कि राहुल गांधी मानसिक रूप से नेतृत्व के योग्य नहीं हैं। जाहिर है कांग्रेस में नेतृत्व का अभाव है। कांग्रेस छोड़ते समय असम के नेता और वर्तमान में भाजपा के मंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने भी राहुल गांधी के नेतृत्व को लेकर सवाल उठाए थे।

कांग्रेस में क्यों महसूस होती है घुटन
बीते मार्च में कर्नाटक के कद्दावर नेता और पूर्व विदेश मंत्री एसएम कृष्णा ने कांग्रेस छोड़ भाजपा ज्वाइन कर लिया था। पार्टी छोड़ते हुए उन्होंने कहा कि कांग्रेस आज इस स्थिति में पहुंच गई है कि उसे बड़ा बदलाव करना आवश्यक हो गया है, लेकिन पार्टी के आलाकमान इसके लिए बिल्कुल भी गंभीर नहीं है। पूर्व केंद्रीय इस्पात मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा ने कांग्रेस छोडऩे के बाद कहा कि वो पिछले दो साल में घुटन महसूस कर रहे थे।

काग्रेस को झटके पर झटका
पतन के रास्ते पर बढ़ रही कांग्रेस चुनाव दर चुनाव हारती जा रही है, वहीं एक से बढ़कर एक कद्दावर नेता पार्टी को झटके पर झटका देते जा रहे हैं। नेताओं की फेहरिस्त इतनी लंबी हो गई है कि एक नई पार्टी का गठन हो जाए। पार्टी नेताओं को लेकर नाराजगी जताई जा रही है। सवाल पार्टी की नीति को लेकर भी उठाए जा रहे हैं ।

लोकसभा चुनाव के पहले से है सिलसिला
पार्टी नेतृत्व के प्रति असंतोष 2014 के लोकसभा चुनावों से पहले ही शुरू हो गया था जब हरियाणा में बीरेन्द्र सिंह, तमिलनाडु में जी.के. वासन, जयंती नटराजन, ओडिशा में गोमांगो, आंध्रप्रदेश के के.एस. राव, आर. सम्बाशिवा राव, किरण रेड्डी, जगन रेड्डी और दिवंगत एन.टी. रामाराव की बेटी पुरंदेश्वरी ने भी कांग्रेस छोड़ दिया था। उत्तर प्रदेश में जगदम्बिका पाल और उत्तराखंड में सतपाल महाराज जैसे नेताओं ने कांग्रेस छोड़ दी थी। दिल्ली में कृष्णा तीरथ, महाराष्ट्र में दत्ता मेघे, पंजाब में जगमीत सिंह बराड़, हरियाणा में अवतार सिंह भड़ाना और जम्मू-कश्मीर में मंगत राम शर्मा जैसे नेताओं ने भी पार्टी छोड़ दी थी।

वाफादारों ने छोड़ी कांग्रेस
जून, 2016 में कांग्रेस के दो वरिष्ठ नेताओं गुरुदास कामत और अजीत जोगी ने पार्टी इसलिए छोड़ दी कि वे पार्टी के वर्तमान नेतृत्व से निराश हो गए थे। गुरुदास कामत ने तो पार्टी छोड़ने से पहले कांग्रेस नेतृत्व को कम से कम 10 बार पत्र लिखा था। वहीं पार्टी छोड़ने के बाद अजित जोगी ने कहा “अब मैं आजाद हो गया हूं। छत्तीसगढ़ के फैसले अब दिल्ली में नहीं लिए जाएंगे।” जाहिर है पार्टी नेतृत्व के प्रति कितनी भारी नाराजगी रही होगी। इतना ही नहीं 2016 में ही त्रिपुरा में कांग्रेस के 6 विधायकों ने पार्टी छोड़ दी थी।

पतन के रास्ते पर सबसे पुरानी पार्टी
दरअसल बीते पंद्रह सालों में कांग्रेस एक ही नीति पर चल रही है वह है मोदी विरोध। कांग्रेस की इसी नीति के कारण साल 2014 से कांग्रेस पार्टी का लगातार पतन हो रहा है। बीते चुनाव में जैसे-तैसे लोकसभा की 44 सीटें तो जीत ली, लेकिन मुख्य विपक्षी दल का दर्जा भी नहीं मिला। कांग्रेस की अपनी गलतियों का नतीजा है कि आज सदन में विपक्ष का कोई नेता ही नहीं।

पीएम मोदी की नीतियों से मुकाबला
एक तरफ पीएम मोदी की स्पष्ट और देशहित की नीति के कारण उनकी लोकप्रियता में लगातार वृद्धि हो रही है। वहीं कांग्रेस की नकारात्मक राजनीति ने पार्टी को पतन के रास्ते पर धकेल दिया है। कश्मीर और चीन जैसे संवेदनशील मुद्दे पर भी कांग्रेस की नकारात्मक राजनीति के कारण पार्टी के भीतर असंतोष उभरा है, जिसे पार्टी संभाल नहीं पा रही है। पार्टी को यह समझने की जरूरत है कि ‘मौत का सौदागर’ वाली राजनीति अब जनता को पसंद नहीं। वहीं सांगठनिक कौशल में अमित शाह के मुकाबले का कांग्रेस में अभी कोई नेता नहीं।

क्षेत्रीय पार्टियों से भी गयी गुजरी हो गई
एक समय था कांग्रेस देश की सबसे बड़ी पार्टी हुआ करती थी, लेकिन आज भारतीय राजनीति की सबसे पुरानी पार्टी की स्थिति क्षेत्रिय दलों से भी बदतर हो गई है। आलम यह है कि कांग्रेस के सत्ता में रहने के दौरान जमकर सत्ता सुख भोगने वाले नेता भी पलायन कर रहे हैं। किसी ने पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र की कमी तो किसी ने अक्षम नेतृत्व को कारण बताया, लेकिन अब भी आलाकमान कान में तेल डालकर सोया हुआ है। बहरहाल पार्टी के भीतर मची भगदड़ पार्टी के अस्तित्व पर सवाल खड़े कर रही है।

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