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गरीबी उन्मूलन के लिए ‘यूनिवर्सल सोशल सिक्योरिटी कवरेज’ लाने की तैयारी में मोदी सरकार

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मोदी सरकार के लिए आलोचकों का दृष्टिकोण चाहे जो हो, वास्तविकता यह है कि 85 प्रतिशत देशवासी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व और उनकी कार्यशैली पर आज भी पूर्ण विश्वास करते हैं। प्यू रिसर्च सेंटर द्वारा किये गए एक सर्वेक्षण में यह नतीजा उभरकर सामने आया है तो इसके पीछे सबसे बड़ी वजह है गरीबों और वंचितों के लिए निरंतर किये जा रहे उनके प्रयास।

पीएम मोदी के लिए हाशिये पर खड़ा व्यक्ति सबसे अहम

देशहित में कुछ कड़े फैसले लेने के बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जनता के चहेते बने हुए हैं तो ये उनके नेतृत्व में समाया लोगों का विश्वास है। यह विश्वास इसलिए बना है क्योंकि पीएम मोदी की नजर केवल बड़ों के लिए बड़ी योजनाएं बनाने तक ही सीमित नहीं है। उनकी नजर हाशिये पर खड़े उस व्यक्ति तक है, जो आज भी अपनी दशा में सुधार की प्रतीक्षा कर रहा है, इसीलिए मोदी सरकार की नीतियों में उस व्यक्ति की हित-पूर्ति के लिए अनेक ऐसी योजनाएं हैं, जो इसी वर्ग को ध्यान में रखकर बनाई गई हैं।

गरीबी उन्मूलन के लिए नई योजना

मोदी सरकार ने गरीबी उन्मूलन के लिए एक ऐसी योजना की रूपरेखा तैयार की है, जो वर्ष 2019 से पहले-पहले ही साकार रूप ले लेगी। 1.2 लाख करोड़ की लागत वाली इस योजना का लक्ष्य देश के सबसे गरीब व्यक्ति तक की आर्थिक सुदृढ़ता सुनिश्चित करना है। सरकार ‘यूनिवर्सल सोशल सिक्योरिटी कवरेज’  नाम से बन रही इस योजना को अगले वित्त वर्ष 2018-19 के लिए महत्वपूर्ण एवं अनिवार्य, एक कल्याणकारी योजना के रूप में वित्त मंत्रालय को भेजने की तैयारी में है। यह योजना देश में इस समय मौजूद 17 सामाजिक सुरक्षा कानूनों की लक्ष्य-सिद्धि में भी सहायक होगी। वर्तमान में भारत में कुल कर्मचारियों की संख्या 45 करोड़ है। इनमें से 10 प्रतिशत से अधिक संख्या संगठित क्षेत्रों के कर्मियों की है, जिन्हें किसी न किसी रूप में आर्थिक सुरक्षा कवच प्राप्त है।

हाशिये पर पड़े मजदूर का हित

असंगठित क्षेत्र के कामगारों की बात करें तो इनकी सामाजिक सुरक्षा को लेकर कुछ भी तय नहीं। यूनिवर्सल सोशल सिक्योरिटी योजना के अंतर्गत इन कामगारों को भी कवर किये जाने की योजना है। एकत्रित किए जाने वाले फंड को उप योजनाओं में विभक्त कर दिया जाएगा। योजना दो स्तरों में विभक्त होगी। इसमें अनिवार्य पेंशन, बीमा [मृत्यु एवं दुर्घटना की स्थिति में], मातृत्व कवरेज, वैकल्पिक चिकित्सा, बीमारी, बेरोजगारी कवरेज आदि शामिल होंगे। वर्तमान कार्यान्वित प्रणाली के अंतर्गत कर्मचारी और नियोक्ता योगदानों सहित मूल वेतन का 25 प्रतिशत कर्मचारी भविष्य निधि में जाता है। इसके अतिरिक्त 6 प्रतिशत बीमा के लिए तय है।

घरेलू श्रमिकों के श्रम का मूल्य

वे घरेलू श्रमिक जिनकी पहचान तो सिर्फ छोटू, रामू या कामवाली बाई तक ही होती है, लेकिन असल में वे उस परिवार की धुरी होते हैं, जिनके लिए वे काम करते हैं। उनके एक दिन की अनुपस्थिति सिर्फ सिंक को ही जूठे बर्तनों से नहीं भर देती, बल्कि उस घर की पूरी व्यवस्था को ही हिला कर रख देती है। इतना सब होने के बावजूद वे न्यूनतम मजदूरी, काम के अनिश्चित घंटे, कोई साप्ताहिक अवकाश न होना जैसी स्थितियों का सामना करने को मजबूर रहते हैं। यहां तक कि उनके शोषण तथा उत्पीड़न के अनेक समाचार भी आए दिन सामने आते रहते हैं। दूसरी सरकारों ने तो इस वर्ग के हितों को शायद ही कभी समझा हो, मगर जीवन के कठोरतम दिन देखने वाले पीएम नरेंद्र मोदी ने इस वर्ग के अधिकारों के हितों की अनदेखी कभी नहीं की। उन्होंने अपने जीवन में संघर्ष को बहुत करीब से देखा है। यही कारण है कि मोदी सरकार जल्दी ही ऐसी योजना लाने जा रही है, जिसमें 30 लाख महिलाओं समेत, 47.5 लाख घरेलू कामगारों के कार्यों को कानूनी मान्यता दी जाएगी।

काम का सम्मान और सुरक्षा

श्रम एवं रोजगार मंत्रालय से संबद्ध इस प्रस्तावित नीति के अंतर्गत इन श्रमिकों के अधिकारों को दूसरे श्रमिक वर्ग के समान ही महत्त्व एवं विस्तार देना शामिल है। साथ ही तय न्यूनतम मजदूरी, समान पारिश्रमिक, काम के घंटे आदि भी सुनिश्चित किए जाएंगे। श्रमिक कानूनी अधिकार दिलाना भी इस योजना का एक अंग है।

 इन्हें काम दिलाने वाली प्लेसमेंट एजेंसियों को भी इस दायरे में लाया जाएगा। ये एजेंसियां इन्हें काम दिलाने के भुगतान स्वरूप इनके एक माह का वेतन शुल्क के रूप में स्वयं ले लिया करती थीं। इस शुल्क को घटाकर अब 15 दिन कर दिया जाएगा। चिकित्सकीय सहायता देना भी इसी का एक भाग होगा। सामाजिक सुरक्षा कवर, रोजगार का उचित स्वरूप, शिकायत निवारण और घरेलू कामगारों के विवादों को समाधान प्रदान करने हेतु संस्थागत तंत्र स्थापित किया जाएगा।

प्रयास होगा कि हर तरह के शोषण से इस वर्ग को बचाया जा सके। अंशकालिक, पूर्णकालिक, लाइव इन श्रमिक नियोक्ता, निजी प्लेसमेंट एजेंसियों की भी स्पष्ट पहचान की जाएगी। इस नीति के उद्देश्यों में बुढ़ापे में पेंशन, मातृत्व अवकाश लाभ, स्वास्थ्य बीमा जैसी सुविधाओं पर भी ध्यान दिया गया है, जैसी व्यवस्था अभी तक केंद्रीय और राज्य सरकारों द्वारा दी जाती रही है।

साधारण दवाओं तक सामान्य जन की पहुंच   

मोदी सरकार जल्दी ही साधारण दवाइयों के मूल्यों पर भी लगाम लगाने की तैयारी में है, ताकि उन्हें गरीबों की जेब की पहुंच की सीमा में लाया जा सके। भारतीय औषधि संगठन के अनुसार यह संशोधन व्यापारिक प्रतिस्पर्धा को समाप्त कर देगा और अपनी सामर्थ्य के अनुसार दवाओं के चयन का अधिकार प्रदान करेगा। इस योजना के लक्ष्य के अंतर्गत डॉक्टरों के लिए भी यह निर्देश जारी होगा कि वे किसी ब्रांड-विशेष या किसी एक कंपनी की दवा लेने की सलाह देने की बजाय उस दवा के ड्रग का उल्लेख करे। इस कदम से निरंतर बढ़ते चिकित्सा खर्च, महंगी दवाएं खरीदने की विवशता से छुटकारा मिलेगा। साथ ही अस्पतालों की मनमानी भी कम होगी। अभी की स्थिति में लगभग 370 दवाएं अधिकतम मूल्य नियंत्रण के अंतर्गत आती हैं।

 

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