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मोदी सरकार का मेडिकल शिक्षा के क्षेत्र में बड़ा कदम, 75 नए मेडिकल कॉलेजों की मंजूरी

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी देश को स्वस्थ और फिट बनाने के लिए चौतरफा कोशिश कर रहे हैं। पीएम मोदी ने जहां लोगों से बीमारियों को दूर रखने के लिए फिट इंडिया अभियान की शुरूआत की और स्वच्छता को जन आंदोलन बनाया, वहीं आयुष्मान भारत योजना के तहत गरीब लोगों को मुफ्त और बेहतर इलाज को संभव बनाया। अब मोदी सरकार ने मेडिकल शिक्षा को बढ़ावा देने और स्‍वास्‍थ्‍य सेवा से जुड़ी आधारभूत सुविधा और मानव शक्ति की उपलब्‍धता सुनिश्चित करने के उद्देश्‍य से 75 नए मेडिकल कॉलेजों की मंजूरी दी है। 

MBBS की 15,700 सीटें बढ़ेंगी

देश में अगले तीन साल के दौरान 75 नए मेडिकल कॉलेज खुलेंगे। इससे एमबीबीएस की 15,700 सीटें भी बढ़ेंगी। 28 अगस्त,2019 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में हुई आर्थिक मामलों की मत्रिमंडल समिति की बैठक में इस फैसले को मंजूरी दी गई। इसके तहत 75 जिला अस्पतालों को 2021-22 तक मेडिकल कॉलेज में बदला जाएगा। इसके लिए 24,375 करोड़ रुपए का बजट मंजूर किया गया है।

200 बिस्तरों वाले जिला अस्पताल बनेंगे मेडिकल कॉलेज

किस राज्य में कितने मेडिकल कॉलेज बनेंगे यह अभी तय नहीं है। यह राज्यों से मिलने वाले प्रस्तावों के आधार पर तय होगा। सरकार ने तय किया है कि उन्हीं इलाकों में जिला अस्पताल को मेडिकल कॉलेज में बदला जाएगा, जहां पहले से कोई मेडिकल कॉलेज नहीं है। मेडिकल कॉलेज बनाने के लिए जिला अस्पताल कम से कम 200 बिस्तर का होने की शर्त है, ताकि 100 बिस्तर और बढ़ाने के बाद मेडिकल कॉलेज शुरू हो सके। मेडिकल कॉलेज के अस्पताल में 300 बिस्तर होना अनिवार्य है।

मेडिकल कॉलेजों की संख्या बढ़कर हो जाएंगी 611

75 नए मेडिकल कॉलेज बनने के बाद देश में मेडिकल कॉलेजों की संख्या 611 हो जाएगी। अभी 536 मेडिकल कॉलेज हैं, जिनमें से 276 सरकारी हैं। कैबिनेट के फैसले की जानकारी केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर और पीयूष गोयल ने दी। इस दौरान प्रकाश जावड़ेकर ने मोदी सरकार के अतीत में लिए गए फैसलों के बारे में भी जानकारी दी। उन्होंने बताया कि पिछले पांच वर्षों में मेडिकल के पीजी कोर्सेज और एमबीबीएस कोर्सेज के लिए करीब 45 हजार सीटें बढ़ाई गई हैं। इस पांच साल के दौरान सरकार द्वारा देश के अलग-अलग हिस्सों में 82 मेडिकल कालेजों को मंजूरी दी गई।

ग्रामीण इलाकों में डॉक्टरों की बढ़ेगी उपलब्धता 

केंद्रीय मंत्री जावड़ेकर ने कहा कि अभी तक मेडिकल शिक्षा के लिए इतना बड़ा निर्णय नहीं हुआ है। सरकार के इस फैसले से लाखों की संख्या में गरीबों एवं ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले लोगों को लाभ होगा और देहात एवं ग्रामीण इलाकों में डाक्टरों की उपलब्धता बढ़ेगी।  यह मोदी सरकार की बड़ी उपलब्धि बनेगी। उन्होंने कहा कि मौजूदा जिला/रेफरल अस्‍पतालों से जुड़े नए चिकित्‍सा महाविद्यालय की स्‍थापना से सरकारी क्षेत्र में योग्‍य स्‍वास्‍थ्‍य कर्मियों और उन्‍नत सेवाओं की उपलब्‍धता बढेगी। साथ ही जिला अस्‍पतालों की मौजूदा अवसंरचना का इस्‍तेमाल होगा और देश में किफायती चिकित्‍सा शिक्षा को बढ़ावा मिलेगा।  

मोदी सरकार ने हमेशा लोगों के स्वास्थ्य को सर्वोपरि रखा है, एक नजर डालते हैं बीते पांच वर्षों में चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में सुधार के लिए उठाए गए कदमों पर-

अब काबिल छात्रों को मिलेगा प्रवेश

मोदी सरकार सबको गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध कराने के लिए प्रतिबद्ध है और 2014 से लगातार इस दिशा में कदम उठाए जा रहे हैं। हाल ही में सरकार ने लोकसभा में नेशनल मेडिकल कमीशन बिल-2019 पेश किया था, जो लोकसभा में पास हो गया। इस बिल की सबसे बड़ी खासियत ये है कि इससे मेडिकल शिक्षा में गुणवत्ता आने के साथ ही निजी मेडिकल कॉलेजों की उगाही पर रोक लगेगी। अभी तक प्राइवेट मेडिकल कॉलेज मैनेजमेंट कोटे की सीटों को एक-एक करोड़ रुपये में अयोग्य छात्रों को बेच देते थे। ये कॉलेज साढ़े चार वर्षीय एमबीबीएस के लिए हर साल करीब 15 से 25 लाख रुपये तक सालाना की फीस वसूलते थे लेकिन अब इस बिल के पास होने के बाद ऐसा नहीं हो पाएगा, क्‍योंकि अब प्राइवेट कॉलेजों की 20 हजार सीटों की फीस सरकार तय करेगी। इससे अब कॉलेज अंधाधुंध फीस नहीं वसूल पाएंगे।

कुल 60 हजार सीटों की फीस तय करेगी सरकार 

देश भर में मेडिकल की करीब 80 हजार सीटें हैं। इनमें आधी सीटें सरकारी कॉलेजों के पास तो आधी निजी मेडिकल कॉलेजों के पास हैं। मगर एनएमसी बिल के कानून बनने पर निजी कॉलेजों के अधीन आने वाली 40 हजार सीटों का 50 प्रतिशत यानी 20 हजार सीटों की फीस सरकार निर्धारित करेगी। इस तरह सरकार के पास 60 हजार सीटों के निर्धारण का अधिकार होगा।

निजी मेडिकल कॉलेजों में भी NEET जरूरी

अब अखिल भारतीय स्तर पर आयोजित NEET (नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेस टेस्ट) पास करने के बाद ही किसी का दाखिला होगा। निजी मेडिकल कॉलेजों में दाखिले के लिए भी नीट देना जरूरी है। सिर्फ डोनेशन के दम पर ही अब डॉक्टर नहीं बन पाएंगे।

नेशनल एक्जिट टेस्ट का प्रावधान

इस विधेयक में परास्नातक (पीजी) मेडिकल पाठ्यक्रमों में प्रवेश और मरीजों का इलाज करने का लाइसेंस हासिल करने के लिए नेशनल एक्जिट टेस्ट (नेक्स्ट) का प्रस्ताव किया गया है। यह कॉमन टेस्ट एमबीबीएस के चौथे वर्ष में होगा। यह परीक्षा विदेशी मेडिकल स्नातकों के लिए स्क्रीनिंग टेस्ट का भी काम करेगी।

आयुष्मान भारत योजना
आयुष्मान भारत के नाम से प्रधानमंत्री मोदी की सरकार ने एक ऐसी योजना लांच की, जिससे देश के हर गरीब को इलाज की सुविधा मिलेगी। मोदी केयर के नाम से चर्चित इस योजना के अंतर्गत देश के 10 करोड़ गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों को मुफ्त में पांच लाख रुपये का चिकित्सा बीमा उपलब्ध कराया जाएगा। एक अनुमान के मुताबिक देश के 50 करोड़ लोगों को अब पांच लाख रुपये तक का इलाज कराने पर अस्पताल को एक भी पैसा नहीं देना पड़ेगा।

मरीजों का सस्ते में सर्जरी का मास्टरप्लान
मोदी सरकार ने नया मास्टर प्लान तैयार किया है इसके लागू होने के बाद दवाओं पर 10 गुना से ज्यादा मुनाफा नहीं लिया जा सकता। नया नियम मई तक लागू करने की कार्ययोजना तैयार की जा रही है। दरअसल स्वास्थ्य मंत्रालय ने प्राइवेट अस्पतालों की मनमानी पर रोक लगाने का फैसला लिया है। क्योंकि ये अस्पताल सर्जरी की कई वस्तुओं पर 1900 प्रतिशत तक का मुनाफा कमाते हैं। अब नये सरकारी नियम के अनुसार कैथेटर, डिस्पोजेबल सीरिंज, हार्ट वॉल्व, इम्प्लांट, प्रोस्थेटिक रिप्लेसमेंट में इस्तेमाल सामान, एचआईवी जांच मशीनें, कैनुला और परफ्यूजन सेट जैसे सामानों पर 10 गुना से अधिक लाभ नहीं कमाया जा सकेगा। नये नियम से ऑपरेशन में इस्तेमाल होने वाले सामानों की कीमतों पर नियंत्रण के बाद स्टेंट की तरह ही ये सामान आम मरीजों की पहुंच में होंगे।

दुर्लभ बीमारियों के खात्मे के लिए राष्ट्रीय नीति
केंद्र सरकार 300 दुर्लभ बीमारियों के खात्मे के लिए राज्य सरकारों के साथ मिलकर अभियान शुरू करने वाली है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय इसके लिए एक राष्ट्रीय पॉलिसी बनाने में जुटा है। इस पॉलिसी को इस वर्ष के अंत तक लागू किए जाने की उम्मीद है, इसके तहत डॉक्टरों को भी इन बीमारियों के बारे में प्रशिक्षित किया जाएगा। आंकड़ों के अनुसार दुनियाभर में लगभग 7 हजार दुर्लभ बीमारियां हैं, जिनमें से भारत में लगभग 300 तरह की दुर्लभ बीमारियां पाई जाती हैं। इनके उपचार का खर्चा भी करीब 8 से 20 लाख रुपये तक होता है। अभी सरकारी अस्पतालों में सुविधा न होने की वजह से मरीजों को प्राइवेट अस्पतालों पर निर्भर रहना पड़ता है। इन्हीं में से एक लायसोसोमल स्टोरेज डिस्ऑर्डर (एलएसडी) दुर्लभ बीमारी है, जिनकी पहचान आसानी से नहीं हो पाती।

200 करोड़ रुपये खर्च करेगी मोदी सरकार
मोदी सरकार इन दुर्लभ बीमारियों से निपटने के लिए 200 करोड़ रुपये खर्च करेगी, जबकि बाकी 125 करोड़ रुपये राज्य सरकारों की तरफ से खर्च किया जाएगा। बताया जाता है कि अगर समय पर एलएसडी की पहचान हो जाए तो इसकी कुछ बीमारियों जैसे कि एमपीएस, गौचर, पोम्पे, फ्रैबी का इलाज मुमकिन है। इसलिए जरूरी है कि फिजिशियन को भी दुर्लभ बीमारियों की जानकारी दी जाए क्योंकि रोगी सबसे पहले उन्हीं के पास सलाह लेने जाते है। इन बीमारियों का इलाज इंजाइम रिप्लेसमेंट थेरेपी (ईआरटी) से किया जा सकता है। पॉलिसी के तहत देश के हर जिले में ईआरटी की सुविधा दी जाएगी।

प्रधानमंत्री जन औषधि केंद्रों में सस्ती दवाएं
देशभर में गरीबों और बुजुर्गों को सस्ती और गुणवत्तापूर्ण दवाएं उपलब्ध कराने के लिए प्रधानमंत्री जन औषधि योजना के अन्तर्गत देशभर में 3 हजार से अधिक जन औषधि केंद्र खोले गए हैं। इन केंद्रों पर 800 से अधिक दवाएं उपलब्ध हैं। सबसे बड़ी बात ये है कि ये दवाएं बाजार में मिलने वाली दवाओं की तुलना में 80 प्रतिशत तक सस्ती हैं।

जिला अस्पतालों में डायलिसिस मुफ्त 
प्रधानमंत्री राष्ट्रीय डायलिसिस कार्यक्रम के तहत जिला अस्पतालों में गरीबों के लिए निशुल्क डायलिसिस सेवा देने की योजना पर सरकार काम कर रही है। सभी पीएचसी और उप स्वास्थ्य केंद्रों में सुविधाएं बढ़ाकर, उसे स्वास्थ्य एवं आरोग्य केन्द्रों में बदलने का काम हो रहा है। राज्‍य सरकारों के सहयोग से “जन औषधि स्‍कीम” के अंतर्गत सभी के लिए जेनेरिक दवाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। राष्‍ट्रीय स्‍वास्‍थ्‍य बीमा योजना के तहत परिवार फ्लोटर आधार पर स्‍मार्ट कार्ड आधारित नकद रहित स्‍वास्‍थ्‍य बीमा प्रदान किया जा रहा है।

पाठ्यक्रम के बाद ग्रामीण क्षेत्र में सेवा देना अनिवार्य 
ग्रामीण और दुर्गम क्षेत्रों में अच्छे डॉक्टर उपलब्ध हों, इसके लिए केंद्र सरकार के अनुमोदन पर भारतीय चिकित्सा परिषद ने चिकित्सा शिक्षा नियमों में कुछ सुधार किए। अब स्नातकोत्तर डिप्लोमा प्राप्त करने वाले सभी चिकित्सकों को अनिवार्य रूप से दो साल दुर्गम क्षेत्रों में सेवा देनी होगी।

दुर्गम क्षेत्र में सेवा देने वाले चिकित्सकों को मिलेगी वरीयता 
भारतीय चिकित्सा परिषद ने चिकित्सा शिक्षा नियमों में बदलाव करके स्‍नातकोत्‍तर डिप्‍लोमा पाठ्यक्रमों में 50 प्रतिशत सीटें सरकारी सेवारत ऐसे चिकित्‍सा अधिकारियों के लिए आरक्षित कर दी हैं, जिन्होंने कम से कम 3 वर्ष की सेवा दुर्गम क्षेत्रों में की हो। वहीं, स्‍नातकोत्‍तर मेडिकल पाठ्यक्रमों में नामांकन कराने के लिए प्रवेश परीक्षा में दुर्गम क्षेत्रों में सेवा के लिए प्रति वर्ष के लिए 10 प्रतिशत अंक का वैटेज दिया जाएगा, जो कि प्रवेश परीक्षा में प्राप्त अंकों का अधिकतम 30 प्रतिशत प्रोत्‍साहन अंक दिया जा सकेगा। इसके अतिरिक्‍त एनएचएम के तहत, ग्रामीण क्षेत्रों में सेवा देने के लिए एमबीबीएस तथा स्‍नातकोत्‍तर डॉक्‍टरों को वित्तीय प्रोत्‍साहन भी दिया जाता है।

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