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कांग्रेस और पिछलग्गुओं की मौकापरस्ती! आंखें खोल देने वाली रिपोर्ट

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स्वतंत्रता के बाद से ही कांग्रेस ने नेहरु-गांधी परिवार और टाइटल के नाम पर देश की जनता के साथ छलावा किया है। स्वतंत्रता के 70 साल बाद एकबार फिर से कांग्रेस उसी तिकड़म में जुट गई है। मौकापरस्ती की इस तिकड़मबाजी में कांग्रेस के साथ अधिकतर वो पिछलग्गू भी शामिल हैं, जो स्वयं बड़े-बड़े घोटालों और भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे हुए हैं। ये वो नेता हैं जिन्होंने हमेशा गरीबों, शोषितों और दलितों की माला जपी है, लेकिन उन्हीं की पीठ में छुरा घोंपकर हाईप्रोफाइल जिंदगी गुजारते आए हैं। इन्होंने हमेशा गरीबों-दलितों की बात की है, लेकिन जाति के नाम पर मलाई स्वयं खाते रहे हैं। इन्होंने धरातल पर कभी ईमानदारी के साथ समाज के जरूरतमंदों की तरक्की की कभी कोशिश नहीं की है। उन्होंने सिर्फ फायदा उठाया है और अपने परिवार के कई पुश्तों का इंतजाम करते आए हैं।

मीरा ‘कुमार’ हैं तो दलित कैसे ?
मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो कुछ विपक्षी पार्टियों की राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार मीरा कुमार के पति मंजुल कुमार ओबीसी हैं। पूर्व लोकसभाध्यक्ष ने भारतीय परंपरा के अनुसार अपना टाइटल तो ‘राम’ (मीरा कुमार के पिता जगजीवन राम थे) से बदलकर ‘कुमार’ कर लिया, लेकिन राजनीति में आगे बढ़ने के लिए दलित होने का लोभ नहीं छोड़ा। वैसे भी भारतीय पंरपरा में शादी के बाद महिला को उसी जाति की मान्यता मिलने का प्रचलन रहा है, जिस जाति के आदमी से उसकी शादी होती है। इस हिसाब से भारतीय समाज में मीरा कुमार को दलित के बजाय ओबीसी ही माना जाना चाहिए।

मीरा दलित हैं, तो उच्च वर्ग की नई परिभाषा ढूंढनी होगी !
मीरा कुमार के पिता बाबू जगजीवन राम देश के पहले दलित उप-प्रधानमंत्री रह चुके हैं। अब मीरा कुमार पहली दलित महिला राष्ट्रपति बनना चाहती हैं। वो देश की प्रतिष्ठित भारतीय विदेश सेवा की अधिकारी रह चुकी हैं। पांच बार लोकसभा सांसद रहने के साथ ही वो देश की पहली महिला लोकसभाध्यक्ष भी रह चुकी हैं। पिता के जीवन से लेकर अबतक की जिंदगी में इतनी ऊंचाइयां छूने के बावजूद क्या ये कहना उचित है कि वो अभी भी समाज के शोषित और दबे-कुचले समुदाय का प्रतिनिधित्व करती हैं। उनका जन्म दलित परिवार में हुआ क्या सिर्फ इसलिए उन्हें आजीवन जाति के नाम की मलाई खाते रहने देना चाहिए। बड़ा सवाल ये है कि अगर मीरा कुमार जैसा हाईप्रोफाइल व्यक्तित्व भी दलित होने का लाभ उठाएगा, तो उन करोड़ों दलितों-शोषितों का क्या होगा, जिनका कांग्रेस और उनके पिछलग्गुओं ने सिर्फ फायदा उठाया है? और तरक्की की राह में हमेशा रोड़े अटकाए हैं।

राजीव से शादी कर ‘एंटोनिया मायनो’ सोनिया गांधी बन गईं!

इटली में जन्मीं एंटोनिया मायनो की शादी जब इंदिरा गांधी के बड़े बेटे राजीव गांधी से होती है तो वो सोनिया गांधी कहलाने लगती हैं। एंटोनिया से सोनिया बनना उनकी और उनके परिवार की निजी आवश्यकता रही होगी। लेकिन उन्होंने अपना टाइटल मायनो से गांधी किया तो ये पूरी तरह से भारतीय परंपरा के अनुसार हुआ। राजीव गांधी की धर्म पत्नी गांधी ही होंगी इसमें कोई दो राय नहीं। अगर भविष्य में कभी उनके युवा बेटे (सिर्फ 47 साल) राहुल गांधी की भी शादी हुई तो उनकी पत्नी का टाइटल भी गांधी होगी, भारतीय परंपरा की तो यही दरकार है। अब सवाल है कि मीरा कुमार के मामले इस सोच में अंतर क्यों दिख रहा है? क्या सोनिया गांधी ये कहने का साहस दिखा सकती हैं कि भारतीय समाज उन्हें उनके पिता स्टिफनो मायनो की जाति से पहचनाने न कि उनके पति राजीव गांधी की?

प्रियंका अभी तक ‘गांधी’ हैं!
राजनीतिक घोटालेबाजी का इससे बेहतर उदाहरण मिलना मुश्किल है। राजीव गांधी और सोनिया गांधी की बेटी प्रियंका शादी के बाद भी गांधी टाइटल लगाना पसंद करती हैं। जबकि उनका नाम अब सिर्फ प्रियंका वाड्रा होना चाहिए, क्योंकि उनके पति का नाम रॉबर्ट वाड्रा है। कई बार उनका नाम प्रियंका गांधी वाड्रा या प्रियंका वाड्रा गांधी के रूप में भी दिख जाता है। यूं समझ लीजिए कि ‘गांधी’ टाइटल का लोभ छोड़ा ही नहीं जा रहा। जिस भारतीय परंपरा के अनुसार उनकी मां सोनिया गांधी बन गईं, उसी के अनुसार उन्हें भी सिर्फ प्रियंका वाड्रा होना चाहिए। लेकिन अपने युवराज (राहुल गांधी) की सियासी गति देखकर कांग्रेस या सोनिया गांधी, प्रियंका को ‘गांधी’ टाइटल से दूर नहीं होने देना चाहतीं। ताकि जब राहुल से सारी उम्मीदों पर पानी फिर जाए तो प्रियंका को राजनीति में लाया जा सके। ऐसी स्थिति में गांधी टाइटल होना आवश्यक है, जिसमें कांग्रेस पोषित (गुलाम मानसिकता वाले) लोगों को अभी भी उम्मीद की किरण दिखाई पड़ती है।

नोटों की माला पहनने वाली मायावती किसे झांसा दे रही हैं ?
दौलत और शोहरत के मामले में देश के किसी भी राजनेता की चर्चा करेंगे तो उनमें से एक प्रमुख नाम बीएसपी सुप्रिमो मायावती का भी आएगा। उनकी लाइफ स्टाइल जिसने भी करीब से देखी है, वो जानता है कि वो सिर्फ जाति से दलित हैं, बाकी उनका जीवन स्तर उच्च वर्ग के धनाढ्य से धनाढ्य लोगों को मात देने वाला है। ऐसे में सवाल उठता है कि वो स्वयं को बार-बार शोषित, पीड़ित और दलित बताकर कब तक सियासी लाभ उठाएंगी? अगर मायावती सच में दलितों की हितैषी हैं, तो अपने समाज के निचले तबके को भी आगे आने का अवसर क्यों नहीं देती हैं? सच्चाई ये है कि वो सिर्फ दलितों के नाम पर अपना घर भरना चाहती हैं, वास्तविक जरूतमंदों का भला हो जाए, ऐसी उनकी सोच ही नहीं है।

950 करोड़ के चारा चोर अब पिछड़ा कैसे ?

आरजेडी अध्यक्ष लालू यादव कानून द्वारा घोषित भ्रष्टाचारी और घोटालेबाज हैं। पिछड़ा और समाजवाद की दुहाई देकर गरीबों को इन्होंने जितना गरीब बनाया है उसका दूसरा उदाहरण ढूंढना मुश्किल है। हजारों करोड़ की अवैध संपत्ति जुटाने के आरोप हैं, लेकिन सिर्फ एक जाति में पैदा होने के कारण स्वयं को गरीब और पिछड़ा बताते नहीं थकते। जब भी अपनी अवैध संपत्ति छिनने का भय महसूस होता है, दलित, शोषित और पिछड़ों का रोना शुरू कर देते हैं। जाति के नाम पर पिछले तीन दशकों से देश की जनता को ठगते चले आ रहे हैं। दुनिया जानती है कि पिछड़ों की दुहाई देकर इन्होंने देश का खजाना लूटकर सिर्फ अपना घर भरा है। चारा चोरी में सजा मिलने के चलते चुनाव लड़ने पर रोक लगी है, चुनाव लड़ने लायक नहीं बचे हैं। लेकिन फिर भी कांग्रेस और बाकी विपक्षी नेताओं के आंखों का तारा बने हुए हैं। वजह एक ही है, गरीब को और गरीब बनाते रहें, अपना खजाना भरते रहें।

मुलायम परिवार अब भी पिछड़ा है ?
यूपी में मुलायम सिंह यादव के परिवार की कहानी भी लालू परिवार से बहुत अलग नहीं है। तीन दशकों से अधिक समय से गरीबों, पिछड़ों और समाजवाद की राजनीति करते आए हैं। परिवार की गिनती अब राज्य के गिने-चुने धनाढ्यों में होती है, लेकिन पिछड़े होने की मलाई अभी खा रहे हैं। क्योंकि जाति के नाम की मलाई खाने की आदत सी पड़ गई है। जाति के नाम पर गरीबों की भावनाओं का दोहन करो और अपना खजाना भरते रहो। वाह रे गरीबी !

मीरा कुमार को चीख-चीख कर दलित-पीड़त बताने वाली बाकी पार्टियों और राजनेताओं का भी कमोवेश यही हाल है। इनमें से कुछ पिछड़े हैं, तो कुछ अगड़े होकर भी पिछड़ों के नाम पर मलाई खाने के आदी रहे हैं। उदाहरण के तौर पर ममता बनर्जी, शरद पवार, करुणानिधि के परिवार या वामपंथी नेताओं का नाम लिया जा सकता है। ममता बनर्जी तो अभी भी साधारण साड़ी और चप्पल पहनने की नौटंकी करती हैं। लेकिन पश्चिम बंगाल की गरीब जनता को उन्होंने किस तरह से चूना लगाया है वो दुनिया जानती है। वैसे पश्चिम बंगाल में वामपंथियों की उनसे नहीं बनती, लेकिन बारी दिल्ली की मलाई खाने की आती है तो पता ही नहीं चलता की दोनों में किसी तरह की वैचारिक विभिन्नता भी है। रही बात पवार और करुणानिधि के परिवारों की तो इनका राजनीतिक जीवन और उस दौरान बनाई गई अकूत संपत्ति ही इनकी पोल खोलने के लिए काफी हैं।

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