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यह पहली बार नहीं, चुनाव आयोग को पहले भी बदनाम करती रही है कांग्रेस

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कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष राजीव गांधी ने चुनाव आयोग पर भेदभाव का आरोप लगाया है। राहुल ने कहा कि आचार संहिता के उल्लंघन के मामलों में आयोग ने बीजेपी की गलतियों को अनदेखा किया जबकि विपक्षी पार्टियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की। एग्जिट पोल आने के बाद कांग्रेस नेता ईवीएम को लेकर भी चुनाव आयोग पर आरोप लगा रहे हैं। उसके साथ-साथ दूसरी विपक्षी पार्टियां भी आयोग पर बीजेपी की मदद करने का आरोप लगा रही हैं। यह सब एक सोची-समझी रणनीति के तहत हो रहा है ताकि चुनाव में हार का ठीकरा आयोग के सिर फोड़ा जा सके। दरअसल, संवैधानिक संस्थाओं को बदनाम करने का कांग्रेस का पुराना इतिहास रहा है। सुप्रीम कोर्ट हो, सीएजी हो या फिर चुनाव आयोग, कांग्रेस अपनी गलतियां छिपाने के लिए इनके ऊपर आरोप लगाने का तरीका पहले से अपनाती रही है। सत्ता में रहे या विपक्ष में, संवैधानिक संस्थाओं को बदनाम करना कांग्रेस की पॉलिटिकल स्ट्रैट्जी का अहम हिस्सा रहा है। आइए जानते हैं ऐसे ही कुछ उदाहरण जब कांग्रेस पार्टी ने चुनाव आयोग पर आरोप लगाए…

फर्जी दस्तावेजों से बदनाम करने की साजिश
2018 में मध्य प्रदेश में विधान सभा चुनाव से पहले कांग्रेस ने राज्य के वोटर लिस्ट में 60 लाख फर्जी नाम शामिल करने का आरोप लगाया। लेकिन कांग्रेस ने इसके लिए जो सबूत पेश किए, वो फर्जी थे। चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि कांग्रेस फर्जी दस्तावेजों के सहारे उसकी छवि खराब करने की साजिश कर रही है।

ईवीएम में गड़बड़ी के आरोप
कांग्रेस पार्टी ने 2014 के लोकसभा चुनाव में हार के बाद पहली बार ईवीएम में हेराफेरी का आरोप लगाया था। चुनाव आयोग ने जब उसे यह आरोप साबित करने की चुनौती दी तो कांग्रेस क्या, कोई विपक्षी पार्टी इसके सबूत नहीं दे सकी। हालांकि, इसके बाद भी पार्टियां ईवीएम में गड़बड़ी के आरोप लगाने से बाज नहीं आईँ। चुनावों के दौरान रैली से लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस तक में कांग्रेस नेता ईवीएम का नाम जरूर लेते हैं।

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लंदन में किया ईवीएम हैकिंग का दावा
ईवीएम की हैकिंग को लेकर कांग्रेस चुनाव आयोग को कोई सबूत नहीं दे सकी, लेकिन पार्टी नेता कपिल सिब्बल लंदन में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में शामिल हुए, जिसमें हैकिंग का फिर से दावा किया गया। प्रेस कॉन्फ्रेंस में सैयद शुजा नाम के एक साइबर एक्सपर्ट ने एक प्रेजेंटेशन के जरिए यह साबित करने की कोशिश की कि ईवीएम को हैक किया जा सकता है। यह एक तरह से चुनाव आयोग को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बदनाम करने की साजिश थी।

2009 में कांग्रेसी नवीन चावला को मुख्य चुनाव आयुक्त बनाया
कांग्रेस संवैधानिक संस्थाओं को किस तरह अपने इशारों पर नचाने की कोशिश करती है, इसका सबसे बड़ा उदाहरण चुनाव आयोग में नवीन चावला की नियुक्ति है। चावला कांग्रेस के पक्ष में काम करने के लिए कुख्यात थे। दिरा गांधी के शासन में इमरजेंसी के दौरान इन पर कांग्रेस के राजनीतिक विरोधियों को प्रताड़ित करने के प्रमाणित आरोप थे। शाह कमीशन ने उनके खिलाफ आरोपों को सही करार दिया था। 2005 में जब उन्हें चुनाव आयुक्त बनाया गया तो तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त एन गोपालस्वामी ने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर उन्हें पद से हटाने की मांग की थी। गोपालस्वामी ने आरोप लगाया था कि चावला आयोग की बैठकों के बीच में टॉयलेट के बहाने बाहर निकलकर खबरें लीक करते हैं। चावला को पद से हटाया तो नहीं गया, उल्टे 2009 में लोकसभा चुनाव से पहले उन्हें मुख्य चुनाव आयुक्त बना दिया गया।

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आरवीएस पेरीशास्त्री के साथ राजीव गांधी का विवाद
1986 से 1990 के बीच मुख्य चुनाव आयुक्त रहे आरवीएस पेरीशास्त्री को चुनावों में ईवीएम के पहली बार इस्तेमाल और मतदान की आयु 21 से कम कर 18 वर्ष करने का श्रेय दिया जाता है, लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के साथ उनके संबंध अच्छे नहीं थे। पूर्व सीएजी सी जी सोमैया ने अपनी किताब में लिखा है कि राजीव 1989 के लोकसभा चुनाव की टाइमिंग और प्रक्रिया को लेकर पेरीशास्त्री पर दबाव बना रहे थे। पेरीशास्त्री नहीं माने तो राजीव ने आयोग में एक की बजाय तीन आयुक्तों की नियुक्ति का शिगूफा छोड़ दिया। यह पेरीशास्त्री को कमजोर करने की कोशिश थी ताकि अपने पसंदीदा अफसरों को चुनाव आयुक्त बनाकर मनमाफिक फैसले करवा सकें।

आयोग को अधिकारहीन बनाए रखना
कांग्रेस के शासन में 1967 से 1991 के बीच चुनाव आयोग को अधिकारहीन बनाने की कई कोशिशें हुईं। 1975 में तारकुंडे कमेटी ने बताया था कि केंद्र सरकार आयोग को अपने मातहत काम करने के लिए मजबूर करती है। कमेटी ने कहा कि इसी चलते आयोग में होने वाली नियुक्तियां अक्सर तय मापदंडों के अनुरूप नहीं होती हैं। रिटायरमेंय के करीब पहुंचे अफसरों को मुख्य चुनाव आयुक्त बनाने के पीछे भी यही सोच थी कि वे सरकार के इशारों पर काम करेंगे। कांग्रेस शासन में चुनाव आयोग चुनाव की तारीख से लेकर चुनाव प्रक्रियी की घोषणा भी केंद्र सरकार की इच्छा के अनुरूप करता था। यह सिलसिला 1987 तक चलता रहा आरवीएस पेरीशास्त्री ने इस मामले में सरकार का निर्देश मानने से पहली बार इनकार कर दिया।

 

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