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बाबासाहेब अम्बेडकर के विचारों को जानना चाहते हैं तो इसे जरूर पढ़ें…

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देश में दलितों को लेकर राजनीति परवान चढ़ रही है। अधिकतर राजनीतिक दल इसे वोट बैंक मान रहा है और अपनी ओर खींचने का प्रयास कर रहा है। इसी खींचतान में आज ये हालत हो गई है कि कबीर, डॉ. अम्बेडकर, पेरियार, ज्योतिबा-सावित्री फूले जैसे माहान व्यक्तित्व को भी एक समुदाय विशेष या जातियों के दायरे में कैद कर दिया गया है।

दरअसल ये सभी बड़े विचारक और बड़े चिंतक थे। इनके विचार सारे शोषित, वंचित, दलित तबके के लिए हैं न कि सिर्फ किसी विशेष जाति के लिए।

अब सवाल उठता है कि दलित कौन हैं… तो ऐसे समझिये। पीड़ित, शोषित, दबा हुआ, खंडित, टूटा हुआ, कुचला हुआ, दला हुआ, पीसा हुआ, मसला हुआ और रौंदा हुआ। यह किसी जाति, समुदाय या कोई धर्म विशेष की बात नहीं है, बल्कि वर्ग विशेष की बात है।

अगर यह किसी जाति विशेष की बात होती तो बाबासाहेब के शिक्षक कोई ब्राह्मण न होते। उन्हें पढ़ाई के लिए विदेश भेजने वाला कोई सवर्ण न होता। महाराष्ट्र में अछूतों और महिलाओं के लिए ज्योतिबा फूले और सावित्री बाई फुले ने जब पहला विद्यालय खोला था, तो जमीन वहां के ब्राह्मण समाज ने ही दी थी। महाड के सत्याग्रह में सुरबन्ना तिपिन्स, सहस्त्रबुद्धे जैसे सवर्णों ने आरबी मौर्य का कंधे से कंधा मिलाकर साथ दिया था।

दरअसल कालांतर में हमारी राजनीति ने व्यवस्था परिवर्तन के इस संघर्ष को जाति के दायरे में सीमित कर दिया। विशेषकर डॉ अम्बेडकर के योगदान को एक तरह से कम करके आंकने की एक बड़ी साजिश है। डॉ. अम्बेडकर जिस व्यवस्था परिवर्तन की बात करते थे, वह सामंतवाद, पूंजीवाद, छुआछूत और पुरुषप्रधान समाज के विरूद्ध संघर्ष करने का आह्वान करता है।

डॉ. अम्बेडकर को लेकर हमारे समाज में कई तरह के भ्रम फैलाए जाते हैं, जबकि उनका देश से संबंधित कई मुद्दों पर स्पष्ट मत है। राष्ट्रवाद की अवधारणा उनके रग-रग में थी। आइये आज हम देश समाज से जुड़े उनके कुछ मत के बारे में जानते हैं-

आर्यों पर डॉ. अम्बेडकर का मत
‘डॉक्टर अम्बेडकर राइटिंग एंड स्पीचेस’ खंड – 7 में बाबासाहेब ने लिखा है कि आर्यो का मूलस्थान (भारत से बाहर) का सिद्धांत वैदिक साहित्य से मेल नहीं खाता। वेदों में गंगा, यमुना, सरस्वती के प्रति आत्मीय भाव है। कोई विदेशी इस तरह नदी के प्रति आत्मस्नेह संबोधन नहीं कर सकता।
उन्होंने अपनी पुस्तक ‘Who were shudras’ में पृष्ठ संख्या-80 में स्पष्ट रूप से कहा है कि ‘शूद्र’ दरअसल क्षत्रिय थे और वे लोग भी आर्यो के समाज के ही अंग थे। उन्होंने विदेशी लेखकों की आर्यो के बाहर से आकर यहां पर बसने सम्बंधित मान्यताओं का खंडन किया है।

कॉमन सिविल कोड पर डॉ. अम्बेडकर का मत
समान नागरिक संहिता केवल कानून का मुद्दा नहीं है, बल्कि लोगों की सोच का विषय भी है। फ्रांस में समान नागरिक संहिता लागू है जो वहां के रह नागरिकक पर लागू होती है। यूनाइटेड किंगडम में इंग्लिश कॉमन लॉ लागू है तो अमेरिका में फेडरल लेवल पर कॉमन लॉ सिस्टम लागू है। ऑस्ट्रेलिया में भी इंग्लिश कॉमन लॉ की तरह कॉमन लॉ सिस्टम लागू है। जर्मनी और उज्बेकिस्तान जैसे देशों में भी सिविल लॉ सिस्टम लागू है।

 

बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर भी समान नागरिक संहिता के समर्थक थे। उन्होंने संविधान सभा में कहा था,

”मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि समान नागरिक संहिता का इतना विरोध क्यों हो रहा है? यह सवाल क्यों पूछा जा रहा है कि भारत जैसे देश के लिए समान नागरिक संहिता लागू करना संभव है?’’

उन्होंने कहा, ”समान नागरिक संहिता एक ऐसा कानून होगा जो हर धर्म के लोगों के लिए समान होगा और उसका धर्म से कोई लेना-देना नहीं होगा। इस कानून में परिवार, विवाह, संपत्ति और मूलभूत नागरिक अधिकार के मामलों में बराबरी होगी। राज्य का यह कर्तव्य होगा कि वह लोगों के व्यक्तिगत अधिकार को सुनिश्चित करेगा और समुदाय के नाम पर उनका हनन नहीं होगा।”

मुस्लिमों पर डॉ. अम्बेडकर का मत
बाबा साहब दलितों इस्लाम से दूर रखने के पक्ष में थे। उनका मानना था कि मुस्लिमों का भ्रातृभाव केवल मुसलमानों के लिए है। वे लिखते हैं-

  • ”इस्लाम एक बंद निकाय की तरह है, जो मुसलमानों और गैर-मुसलमानों के बीच जो भेद यह करता है, वह बिल्कुल मूर्त और स्पष्ट है।”
  • ”इस्लाम का भ्रातृभाव मानवता का भ्रातृत्व नहीं है, मुसलमानों का मुसलमानों से ही भ्रातृभाव मानवता का भ्रातृत्व नहीं है, मुसलमानों का मुसलमानों से ही भ्रातृत्व है।”
  • ”यह बंधुत्व है, परन्तु इसका लाभ अपने ही निकाय के लोगों तक सीमित है और जो इस निकाय से बाहर हैं, उनके लिए इसमें सिर्फ घृणा ओर शत्रुता ही है।”
  • ”मुसलमानों के लिए हिन्दू काफिर हैं, और एक काफिर सम्मान के योग्य नहीं है। वह निम्न कुल में जन्मा होता है, और उसकी कोई सामाजिक स्थिति नहीं होती। इसलिए जिस देश में क़ाफिरों का शासन हो, वह मुसलमानों के लिए दार-उल-हर्ब है। ऐसी स्थिति में यह साबित करने के लिए और सबूत देने की आवश्यकता नहीं है कि मुसलमान हिन्दू सरकार के शासन को स्वीकार नहीं करेंगे।”
  • ”इस्लाम सामाजिक स्वशासन की एक पद्धति है और स्थानीय स्वशासन से मेल नहीं खाता, क्योंकि मुसलमानों की निष्ठा, जिस देश में वे रहते हैं, उसके प्रति नहीं होती, बल्कि वह उस धार्मिक विश्वास पर निर्भर करती है, जिसका कि वे एक हिस्सा है।”
  • ”भारत के मुसलमानों में समाज सुधार का ऐसा कोई संगठित आन्दोलन नहीं उभरा जो इन बुराईयों का सफलतापूर्वक उन्मूलन कर सके। हिन्दुओं में भी अनेक सामाजिक बुराईयां हैं। परन्तु संतोषजनक बात यह है कि उनमें से अनेक इनकी विद्यमानता के प्रति सजग हैं और उनमें से कुछ उन बुराईयों के उन्मूलन हेतु सक्रिय तौर पर आन्दोलन भी चला रहे हैं। दूसरी ओर, मुसलमान यह महसूस ही नहीं करते कि ये बुराईयां हैं। परिणामतः वे उनके निवारण हेतु सक्रियता भी नहीं दर्शाते। इसके विपरीत, वे अपनी मौजूदा प्रथाओं में किसी भी परिवर्तन का विरोध करते हैं।”

धारा 370 पर डॉ. अम्बेडकर का मत
पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू जम्मू कश्मीर के लिए विशेष प्रावधान चाहते थे, और उन्होंने बाबासाहेब को संविधान में इस विशेष आर्टिकल जोड़ने के लिए कहा, लेकिन बाबासाहेब ने ऐसा करने से इंकार कर दिया। डॉ. अम्बेडकर जानते थे कि धारा 370 के दुष्परिणाम क्या होंगे। उन्होंने कहा कि ये देश हित में नहीं है इसलिए मैं ऐसा नही करुंगा। उस समय नेहरू के खिलाफ जाने की हिम्मत किसी में नहीं थी लेकिन बाबासाहेब देशहित के लिए नेहरू के खिलाफ भी चले गए थे।

उन्होंने अनुच्छेद 370 के बारे में शेख अब्दुल्ला को लिखे पत्र में कहा था, ”आप चाहते हैं कि भारत जम्मू-कश्मीर की सीमा की सुरक्षा करे, यहां सड़कों का निर्माण करे, अनाज की सप्लाई करे साथ ही कश्मीर के लोगों को भारत के लोगों के समान अधिकार मिले। आप अपनी मांगों के बाद चाहते हैं कि भारत सरकार को कश्मीर में सीमित अधिकार ही मिलने चाहिए। ऐसे प्रस्ताव को भारत के साथ विश्वासघात होगा जिसे भारत का कानून मंत्री होने के नाते मैं कतई स्वीकार नहीं करुंगा।”
गौरतलब है कि जिस दिन यह अनुच्छेद बहस के लिए आया उस दिन बाबासाहेब ने इस बहस में हिस्सा नहीं लिया, और ना ही उन्होंने इस अनुच्छेद से संबंधित किसी भी सवाल का जवाब दिया।

देश के बंटवारे पर डॉ. अम्बेडकर का मत
डॉ. अम्बेडकर एक ओर जहां समाज में दलितों के उत्थाेन के लिए लगातार काम रहे थे, वहीं वे तत्कालीन सियासत और वक्त‍ दोनों पर पूरी नजर रख रहे थे। अपने मत को वे अपने तर्कों के जरिये सिद्ध करते और महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू और मोहम्मद अली जिन्ना जैसे नेताओं की भी आलोचना करने से नहीं चूकते थे।

बाबासाहेब का तीनों ही नेताओं से कई मुद्दों पर विरोध और असहमति थी, लेकिन सबसे बड़ा और अहम विरोध था भारत के विभाजन का।

वे पूरे देश को अखंड देखना चाहते थे, इसिलए वे भारत के टुकड़े करने वालों की नीतियों के जबर्दस्त आलोचक रहे। भारत को दो टुकड़ों में बांटने की ब्रिटिश हुकूमत की साजिश और अंग्रेजों की हां में हां मिला रहे इन तीनों ही भारतीय नेताओं से वे इतने नाराज थे कि उन्होंने बाकायदा पाकिस्तान के विभाजन को लेकर एक पुस्तक ‘थॉट्स ऑन पाकिस्तान’ लिखी जो बहुत ही चर्चा में आई।

अम्बेडकर का मानना था कि देश को दो भागों में बांटना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है और ऐसे विभाजन से राष्ट्रो से ज्या दा मनुष्यता का नुकसान होगा। बड़े पैमाने पर हिंसा होगी। बाबा साहेब की आशंका विभाजन के दौरान सही साबित भी हुई।

हिंदू संस्कृति पर डॉ. अम्बेडकर का मत
बाबासाहेब की जीवनी लिखने वाले सी बी खैरमोड़े ने बाबासाहेब के शब्दों को उद्धृत करते हुए लिखा है, ”मुझमें और सावरकर में इस प्रश्न पर न केवल सहमति है, बल्कि सहयोग भी है कि हिंदू समाज को एकजुट और संगठित किया जाये, और हिंदुओं को अन्य मजहबों के आक्रमणों से आत्मरक्षा के लिए तैयार किया जाए।”
हिदू समज की बुराइयों पर चोट करते हुए भी बाबा साहब भारतीयता की मूल अवधारणा और अपने हिंदू हितों को नहीं भूलते थे।
महार मांग वतनदार सम्मेलन, सिन्नर (नासिक) में 16 अगस्त, 1941 को बोलते हुए बाबासाहेब ने कहा था,
“मैं इन तमाम वर्षों में हिंदू समाज और इसकी अनेक बुराइयों पर तीखे एवं कटु हमले करता रहा हूं, लेकिन मैं आपको आश्वस्त कर सकता हूं कि अगर मेरी निष्ठा का उपयोग बहिष्कृत वर्गों को कुचलते के लिए किया जाता है तो मैं अंग्रेजों के खिलाफ हिंदुओं पर किए हमले की तुलना में सौ गुना तीखा, तीव्र एवं प्राणांतिक हमला करूंगा।”

कई राजनीतिक दल और समाज का एक वर्ग बाबासाहेब को हिंदू विरोधी बताकर हिंदू समाज को तोड़ने में लगा है। परन्तु बाबासाहेब हिन्दू दर्शन में कितनी आस्था रखते थे वो इसी से पता चल जाता है कि जब उन्होंने जातिगत भेदभाव से आक्रोशित होकर हिन्दू धर्म छोड़ा तो हिन्दू दर्शन पर ही आधारित भारत-भूमि पर जन्मा बौद्ध धर्म अपनाया ताकि देश की एकता, सुरक्षा और सामाजिक संरचना को कोई हानि नहीं पहुंचे।
बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर ने इस्लाम और ईसाई दोनों ही धर्मों को विदेश से आयातित धर्म कहा था, और कहा था, 

“हिंदू धर्म की विकृतियों को दूर करना है तो भारत में ही पैदा हुए किसी अन्य धर्म में इसका समाधान ढूंढना होगा। मैं बौद्ध मत में दीक्षित होकर देश को सबसे बड़ा लाभ पहुंचा रहा हूं, क्योंकि बौद्ध मत भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग है। मैंने सावधानी बरती है कि मेरे पंथ-परिवर्तन से इस देश की संस्कृति और इतिहास को कोई हानि न पहुंचे।“ (अम्बेडकर- जीवन और लक्ष्य”, पृष्ठ-498)

राष्ट्रवाद पर डॉ. अम्बेडकर का मत
बाबासाहेब के नाम पर दलित राजनीति करने वाले लोग, विदेशी ताकतों के हाथों की कठपुतली बनकर डॉ. अम्बेडकर के सिद्धांतों की हत्या करने में लगे हुए हैं। दरअसल डॉ अम्बेडकर के जीवन-चिंतन महान राष्ट्रवादी नेता के रूप में उनके दर्शन कराता है।
डॉ. आम्बेडकर सम्पूर्ण वांग्मय के खंड 5 में लिखा है, ”डॉ अंबेडकर का दृढ़ मत था कि मैं हिंदुस्तान से प्रेम करता हूं। मैं जीऊंगा तो हिंदुस्तान के लिए और मरूंगा तो हिंदुस्तान के लिए। मेरे शरीर का प्रत्येक कण और मेरे जीवन का प्रत्येक क्षण हिंदुस्तान के काम आए, इसलिए मेरा जन्म हुआ है।’’

 

 

1 COMMENT

  1. He was a genius person of Indian history. But Nehru did not like him .many time Nehru opposed his.Nehru did not give him The Bharat Ratna Award. I support BJP thinks( vichardhara).because baba sahab did not like dhadra 370 in constitution Nehru & his friends forcely implied it in j&k.he wants one nation one law.BJP today do it.i am happy & congratulate all MP who support government like BSP.

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