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‘असहिष्णुता’ ब्रिगेड रिटर्न्स 2.0

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असहिष्णुता, सामाजिक पहचान, दलित उत्पीड़न, किसान, आरक्षण, सवर्ण, अल्पसंख्यक… ये शब्द भारतीय राजनीति में रचे-बसे हैं। हमारी राजनीति का पहचान बन चुके इन शब्दों के मायने हैं… मायने हैं तो कारनामें भी हैं… जो कांग्रेस ने बीते सत्तर वर्षों की राजनीति में की है। रोटी, कपड़ा, मकान, रोजगार, शिक्षा और सुरक्षा जैसे शब्दों पर जवाब-तलब से बचना हो तो ये और भी उभर कर आते हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति के 70 साल के बाद भी रोटी, कपड़ा, मकान, रोजगार, शिक्षा और सुरक्षा जैसी बुनियादी जरूरतें पूरी नहीं होना क्या हमारे लिए शर्म का सबब नहीं हैं? आखिर सत्तर साल में इनपर काम क्यों नहीं किए गए? लेकिन यही हमारे देश की सियासत का सच है… बीते सत्तर सालों से कांग्रेस ने ऐसी ही राजनीति की है… जन भावनाओं को उभारा है … एक दूसरे से लड़वाया है… लोगों के सेंटिमेंट्स से खेलकर बुनियादी मुद्दों से भटकाया है।

बीते सत्तर सालों का इतिहास देखें तो कांग्रेस की संस्कृति रही है कि समाज में किसी भी वर्ग में भय को जिंदा किया जाए और राजनीति की बिसात बिछाई जाए। लेकिन बीते पांच वर्षों में नरेंद्र मोदी की सरकार ने विकास की बात की है… विकास को मुद्दा बनाया है … और विकास को ही मिशन बनाया है… देश की जनता भी पीएम मोदी के साथ है। लेकिन कांग्रेस अपनी कुत्सित राजनीति के कारण कभी बहुसंख्यक समाज में फूट डालने का काम कर रही है तो कभी मुसलमानों को ‘मोदीफोबिया’ के नाम पर डराने की कोशिश कर रही है। कांग्रेस के इस अभियान में वामपंथी ब्रिगेड के साथ देश के ‘टुकड़े-टुकड़े’ करने की मानसिकता रखने वाले भी साथ हैं।

‘असहिष्णुता ब्रिगेड’ 2.0

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार बने अभी 50 दिन ही पूरे हुए हैं कि एक बार फिर असहिष्णुता ब्रिगेड जाग उठा है। प्रधानमंत्री मोदी के पहले कार्यकाल में असहिष्णुता ब्रिगेड 1.0 ने पूरे पांच साल तक देश में असहिष्णुता का माहौल दिखाने के लिए हर हथकंडे अपनाए थे, वही काम अपने 2.0 वर्जन में असहिष्णुता ब्रिगेड कर रहा है।

मुबंई से बॉलीबुड के 49 कलाकारों ने प्रधानमंत्री मोदी को खुला पत्र लिखकर देश में हुई कुछ ऐसी मॉब लिचिंग की घटनाओं पर कार्यवाई की मांग की है जो या तो झूठी हैं या किसी अन्य कारण से घटना घटी है। सबसे बड़ी बात यह है कि जिस बात के लिए प्रधानमंत्री मोदी को इन 49 कलाकारों ने पत्र लिखा है उसकी जिम्मेदारी राज्य सरकारों के कंधों पर है। राज्य सरकारों का काम है कि अपने अपने राज्य में कानून व्यवस्था को बनाए रखने की जिम्मेदारी निभाएं। श्याम बेनेगल, अनुराग कश्यप, बिनायक सेन, सोमित्र चटर्जी, कोंकणा सेन शर्मा, शुभा मुद्गल, अनुपम रॉय जैसे नाम इस लिस्ट में शामिल हैं।

‘असहिष्णुता ब्रिगेड’ 1.0
2015 में अवार्ड वापसी और जेएनयू में आजादी के नारों के पीछे क्या वजह थी? आखिर क्यों कुछ राज्यों में चुनाव के बाद ऐसे मुद्दे शांत पड़ गए? अब फिर क्यों असहिष्णुता के मुद्दे को हवा दी जा रही है? … मुंबई में एक सेवानिवृत अधिकारियों के एक समूह ने खुली चिट्ठी लिखकर देश में अतिवादी राष्ट्रवाद पर चिंता जताई… इसमें एक संदर्भ राजस्थान में पहलू खान नामक व्यापारी की हत्या का है… जिसे कुछ असामाजिक तत्वों ने पीट-पीटकर मार डाला था। ये राज्य सरकार की कानून-व्यवस्था का मामला है… लेकिन इसे पीएम मोदी यानी केंद्र सरकार से जोड़ा जा रहा है। सबसे खास बात ये कि ये साफ करते हुए कि उनका किसी भी राजनीतिक दल से संबंध नहीं है, खुली चिट्ठी लिखी गई है। जाहिर है जिन 65 अधिकारियों के नाम और पद सहित ये पत्र अखबारों की सुर्खियां बनी हैं… उसका एक मात्र मकसद यह है कि एक बार फिर असहिष्णुता और राष्ट्रवाद जैसे मुद्दे को उछाला जाय… समाज में डर का वातावरण पैदा किया जाए… जिससे मोदी को मात देने की रणनीति पर आगे बढ़ा जा सके।

भाजपा सरकारों को निशाना बना रहे ‘असहिष्णुता ब्रिगेड’
मुंबई मिरर में छपे इस खुले खत में ये साफ दिख रहा है कि उन मुद्दों पर ही बल दिया है जिसका सरोकार कहीं न कहीं भाजपा या भाजपा द्वारा शासित राज्य सरकारों से है। यूपी में रोमियो स्क्वायड पर सवाल उठाते हुए इस ब्रिगेड को इस दस्ते में सिर्फ खराबी ही नजर आती है। इसके अच्छे परिणाम इन्हें नजर नहीं आ रहे, बालिकाओं के साथ छेड़खानी में कमी इन्हें नहीं दिख रही है, अपराधियों में कानून का डर इन्हें नहीं दिख रहा है। दूसरा संदर्भ जम्मू-कश्मीर और राजस्थान में गौरक्षकों की गुंडागर्दी दिखी है… उन्होंने ये नहीं देखा है कि तस्करी के जरिये कैसे इन मवेशियों को बूचड़खानों में पहुंचाया जाता है। इस ब्रिगेड ने यूपी चुनाव में श्मशान और कब्रिस्तान की बात तो याद रही है लेकिन उन्हें इस आधार पर बहुसंख्यक समाज के साथ भेदभाव नजर नहीं आया है। इन्हें खाने की आजादी की बात जरूर याद आ रही है लेकिन केरल में किस तरह सरेआम कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने हिंसा का प्रदर्शन किया उन्हें इसमें कोई खराबी नजर नहीं आ रही है। इस ब्रिगेड का मकसद क्या है ये सब जानते हैं।

बिहार चुनाव से पहले भी जगा था ‘असहिष्णुता गैंग’
बताया जा रहा है कि अभी जिस ‘अहिष्णुता ब्रिगेड’ ने जन्म लिया है वह किसी न किसी आधार पर कांग्रेस सरकार से उपकृत रहे हैं। हालांकि स्वयं को वे किसी भी राजनीतिक दल से जुड़ा हुआ नहीं बता रहे हैं। लेकिन उनकी लिखी बातें क्या कहानी कह रही हैं ये जाहिर है। बहरहाल 2015 में भी ‘असहिष्णुता गैंग’ ने ऐसा ही माहौल तैयार किया था। बिहार चुनाव होने वाले थे… पीएम मोदी की लोकप्रियता चरम पर थी… ऐसा लग रहा था कि बिहार चुनाव भी भाजपा जीत लेगी। लेकिन हार के डर से कैसे सिद्धांतों की बलि दी जाती है वो बिहार में देखने को मिला था। … जिस लालू प्रसाद की सत्ता का विरोध कर नीतीश कुमार ने अपनी छवि विकास पुरुष की गढ़ी थी… उसी लालू प्रसाद की गोद में बैठ गए। …जिस कांग्रेस ने दागी कहकर लालू प्रसाद से पीछा छुड़ाया था।

मोदी विरोध में अवॉर्ड वापसी का चलाया गया था अभियान
प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता कांग्रेस परस्त तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग को कैसे खटकती रही है ये 2015 में पुरस्कार वापसी अभियान में देखा गया। इस अभियान का मकसद पीएम मोदी को हराना और नीतीश कुमार को अपने लक्ष्य तक पहुंचाना था। इस बात का सबूत तब भी सामने आया था जब इस पुरस्कार वापसी समूह के सदस्यों और नीतीश कुमार की एक बैठक हुई जिसमें समान विचारधारा के लेखकों को एक मंच पर लाने की कोशिश की गई। देशभर के इस तरह के लेखकों से नीतीश कुमार की मुलाकातें करवाई गईं ताकि उन्हें पीएम मोदी के विरुद्ध नीतीश कुमार को खड़ा किया जा सके। जाहिर है इस सोच के पीछे भी काफी हद तक कांग्रेस से ‘उपकृत’ साहित्यकार, लेखक, कवि और कलाकार शामिल थे।

आरक्षण खत्म करने का डर दिखाने की राजनीति
बिहार चुनाव से पहले की ही बात है जब आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के एक बयान को आधार बनाकर आरक्षण खत्म करने का भय दिखाया गया। इस मामले को इतना उछाला गया कि आरक्षित वर्ग में आने वाले एक खास वर्ग में आरक्षण खत्म होने का डर पैदा किया गया। जबकि पीएम मोदी ने आरक्षण में किसी भी छेड़छाड़ से बार-बार इनकार किया और इस बात को साफ किया कि वे आरक्षण के पक्ष में हैं। हालांकि इस बात का सीधा लाभ आरक्षण के नाम पर मलाई खाने वाले राजनीतिक दलों को हुआ जरूर… लेकिन इस डर की राजनीति ने बिहार को फिर 25-30 साल पीछे कर दिया। जिस बिहार ने विकास की गति पकड़ ली थी… वो बिहार अब फिर पिछड़ेपन का शिकार हो रहा है।

दलित विरोध का ‘डर’ दिखाने के पीछे साजिश !
हैदराबाद यूनिवर्सिटी में एक स्टूडेंट ने आत्महत्या कर ली… लेकिन इस मुद्दे को केंद्र की सरकार से जोड़कर यह दिखाने की कोशिश की गई कि मोदी सरकार दलित विरोधी है। तमाम प्रदर्शन हुए… हिंसा हुई … मुद्दे को बार-बार तूल दिया जाता रहा… कांग्रेस के युवराज इस आग में घी डालते रहे और इसे सुलगाते रहे। लेकिन जांच हुई तो ये साफ हुआ कि रोहित वेमुला दलित था ही नहीं। बावजूद इसके राजनीति होती रही और मोदी सरकार को दलित विरोधी बताकर डर पैदा करने की कोशिश लगातार होती रही ।

कांग्रेस ने ‘डर’ के लिए रची थी ऊना कांड की साजिश
ऊना में कुछ दलित युवकों को पीटने का वीडियो जारी किया गया… जिससे दलितों का गुस्सा भड़क गया। दरअसल ऊना कांड बिहार चुनाव से ठीक पहले करवाया गया था। इसका मकसद था कि देश भर के दलितों में ये संदेश जाए कि बीजेपी के राज्यों में दलितों पर अत्याचार हो रहे हैं। लेकिन जांच में सामने आया कि समधियाल गांव का सरपंच प्रफुल कोराट ऊना के कांग्रेसी विधायक और कुछ दूसरे कांग्रेसी नेताओं के साथ संपर्क में था। अब तक की जांच में यह साफ हो चुका है कि सरपंच ने ही फोन करके बाहर से हमलावरों को बुलाया था। जो वीडियो वायरल हुआ था वो भी प्रफुल्ल कारोट के फोन से ही बना था। इस साजिश का बदला समधियाल के दलितों ने प्रफुल्ल कोराट को पंचायत चुनाव में हराकर ले लिया।

मोदी सरकार को किसान विरोधी बताने की साजिश
विधानसभा चुनाव से पहले मध्य प्रदेश के मंदसौर में किसान आंदलोन आयोजित किया गया। जिसमें हिंसक प्रदर्शन के बाद फायरिंग हुई और पांच किसानों को अपनी जान गंवानी पड़ी। लेकिन इस हंगामे के पीछे कांग्रेस नेताओं ने कैसी साजिश रची थी ये खुलकर सामने आ गया। दरअसल मंदसौर जिला मध्य प्रदेश, राजस्थान और गुजरात की सीमा से सटा इलाका है… और आने वाले एक साल में इन तीनों ही राज्यों में चुनाव होने वाले थे… इसके साथ ही ये कि इन तीनों ही राज्यों में भाजपा की सरकारें थी। जाहिर है ये साजिश कांग्रेस ने रची और किसान विरोधी बताकर कांग्रेस ने अपनी मंद पड़ चुकी राजनीति को फिर से चमकाने की कोशिश की।

कश्मीरियों में मोदी सरकार से ‘डर’ दिखाने की कोशिश
कश्मीर के मसले पर भी कांग्रेस की राजनीति दोमुंही है। एक तरफ आतंकियों के खिलाफ सेना के अभियान पर सवाल उठाती है तो दूसरी तरफ वह कश्मीर में शांति की बात करती है… देश का अभिन्न अंग कहती है। लेकिन बीते दिनों जब यूपी में भारत का नक्शा जारी किया गया तो उसमें कश्मीर को भारत अधिकृत बता दिया। जाहिर है कांग्रेस यहां भी ‘डर’ की राजनीति ही कर रही थी। एक डर कश्मीरियों के भीतर सेना के लिए ‘डर’ पैदा करने की राजनीति है तो दूसरी तरफ कश्मीरियों के साथ कांग्रेस के साथ खड़े होने का संदेश देने की कोशिश।

अखलाक के मुद्दे पर मुसलमानों में ‘डर’ पैदा करने की साजिश
उत्तर प्रदेश के दादरी में गोमांस रखने के आरोप में भीड़ ने अखलाक की हत्या कर दी। मामला कानून व्यवस्था का था… तत्कालीन प्रदेश सरकार के मुखिया अखिलेश यादव से जुड़ा था। लेकिन इस एक घटना के लिए देश की सरकार को ही कठघरे में खड़ा कर दिया गया? न साहित्यकार की हत्या और न ही किसी अल्पसंख्यक की हत्या पहली बार हुई थी। न ही कोई ये दावा कर सकता है कि गैर मोदी-गैर बीजेपी सरकार में कभी ऐसा नहीं हुआ हो? फिर बुद्धिजीवियों ने मोदी सरकार को देश में ‘बढ़ती’ असहिष्णुता के लिए जिम्मेदार कैसे ठहरा दिया? जाहिर है ये कुछ और नहीं मुसलमानों में मोदी के प्रति नफरत और डर पैदा करने की नीति के तहत ही की गई।

अर्थव्यवस्था पर डर पैदा करने की कोशिश
पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने जब अपना अंतिम प्रेस कांफ्रेंस किया था तो उन्होंने कहा था, ‘नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश विनाश की राह पर जाएगा।” ये वही मनमोहन सिंह थे जिन्होंने केंद्र में प्रधानमंत्री रहते हुए गुजरात राज्य को तीन बार बेस्ट राज्य का अवॉर्ड दिया था। उन्हीं के नेतृत्व में केंद्र की सरकार ने विभिन्न क्षेत्रों में सुशासन के लिए 90 पुरस्कार दिए थे। कई बार गुजरात मॉडल की तारीफ की थी… लेकिन सत्ता जाते ही देश को ‘डर’ दिखाने की कोशिश करने लगे। जाहिर है पीएम मोदी उनकी भी आंखों में खटकने लगे और उनकी लोकप्रियता से कांग्रेस पार्टी घबरा गई।

दरअसल गुजरात दंगों के बाद नरेंद्र मोदी लगातार गुजरात के मुख्यमंत्री बने रहे और इस दौरान उन्होंने चार लगातार चुनावों में धमाकेदार जीत दर्ज की। विकास के मामले में गुजरात ने तमाम राज्यों को पछाड़ दिया। लेकिन कांग्रेस जिस कल्चर से आती है उसे मोदी का गुजरात के विकास में दिया गया योगदान याद नहीं रहा, वो सिर्फ गुजरात दंगे की ही नुख्ता-चीनी करती रही। वहीं कुछ कॉरपोरेट घराने कांग्रेसियों को खुश करने में लगे रहे। जबकि मीडिया का एक वर्ग उनकी किए कार्यों को दंगों की आड़ में कम आंकती रही। लेकिन लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि है इसलिए जनता ने कांग्रेस की साजिश को नाकाम करते हुए नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री चुन लिया और इन तीनों गठजोड़ को आईना दिखा दिया। एक बार फिर कांग्रेस फिर डर की राजनीति के सहारे सत्ता वापसी की साजिश रच रही है… लेकिन अब देश की जनता कांग्रेस के इस ‘डर’ को पहचान चुकी है। 

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