Home झूठ का पर्दाफाश LIES AGAINST NAMO : मार्केटिंग की सरकार

LIES AGAINST NAMO : मार्केटिंग की सरकार

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मोदी सरकार पर एक और आरोप लगता है कि यह मार्केटिंग की सरकार है। पर सच ये है कि विकास के लगातार हो रहे काम विरोधियों के लिए आश्चर्य की बात है। विकास के काम को, जनता के अधिकार और उनके कर्तव्यों को सबको बताना हर सरकार का नैतिक दायित्व होता है। 

क्या मार्केटिंग है योजनाओं की बात करना?
विपक्ष जिसे मार्केटिंग बताने में लगा रहा है वो दरअसल जनता के हित से जुड़े मुद्दे हैं जिन पर मोदी सरकार ने अभूतपूर्व तरीके से परफॉर्म किया है। नेकभाव से किसी को ये समझने में दिक्कत नहीं आएगी कि लोकतंत्र में किसी भी जिम्मेदार सरकार के लिए ये बताना भी जरूरी होता है कि नागरिकों को लोककल्याण की योजनाओं के बारे में पता हो, कैसे नागरिक इसका लाभ उठा सकते हैं, ये पता हो। सरकार का यह भी नैतिक कर्त्त्वय है कि वो बताए कि अपने नागरिकों की बेहतरी के लिए वो आखिर कितनी मुस्तैद है? मोदी सरकार ने एक जिम्मेदारी भरी परंपरा की शुरुआत कर पूरे देश को जागरूक रखने का काम किया है।

मौजूदा सरकार कभी ये बताने में नहीं हिचकिचाई कि जनता को लेकर उसकी योजनाएं क्या हैं-उन योजनाओं पर सरकार किस तरीके से काम कर रही है और उन योजनाओं का मकसद पूरा हो रहा है या नहीं यानी देशवासियों तक उन योजनाओं का लाभ पहुंच रहा है कि नहीं? योजनाओं को सिर्फ कागज पर रखकर नहीं उन पर जमीनी अमल कर मोदी सरकार ने जनता का दिल जीता है जिससे विरोधी ईर्ष्या में हैं।

उतर गया कांग्रेस के विकास का मुखौटा
गरीबी हटाओ का नारा देकर सत्ता पाने वाली कांग्रेस ने देश में अपने 60 साल के शासन के दौरान गरीबों के लिए क्या किया उसकी अब असलियत मोदी सरकार के कामकाज से खुलकर सामने आ रही है। कांग्रेस के विकास के मुखौटे की परतें उघड़ रही हैं और इसी की प्रतिक्रिया में उसकी बौखलाहट दिखती रहती है। कांग्रेस ने अपने राज में कभी इस पर काम किया कि देश के गरीबों के भी बैंक अकाउंट खुलें और विकास की रेस में गरीब भी खुद को शामिल महसूस करें? मोदी सरकार की जन-धन की योजना के तहत अब तक ना सिर्फ 28.5 करोड़ से ज्यादा बैंक खाते खोले जा चुके हैं, बल्कि उन खातों में गरीब लोग अपनी मेहनत की कमाई जमा कर देश की आर्थिक शक्ति बढ़ाने में भी योगदान दे रहे हैं। सोचिए, मोदी सरकार इस योजना की बात करे तो क्या वो मार्केंटिंग है?

किसानों की उन्नति के कदम उठाना क्या मोर्केटिंग है?
मोदी सरकार ने देश के किसानों की आय को 2022 तक दुगना करने का लक्ष्य  रखा है और इस दिशा में सरकार अपनी कई योजनाओं के साथ किसानों की उन्नति की कोशिश में लगी हुई है। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना हो या प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना या फिर किसानों की फसल बिक्री के लिए eNAM का राष्ट्रीय प्लेटफॉर्म बनाना, सरकार ने किसानों के हक में कई ऐसी योजनाएं शुरू कीं जिनसे किसानों का तनाव बहुत हद तक दूर हुआ है। क्या कृषि आधारित अर्थव्यवस्था वाले भारत में किसानों के हौसले को बढ़ाने वाली योजनाओं की बात करना मार्केटिंग है?

किसने ली छोटे उद्यमियों की सुध?
छोटे उद्यम चलाने वालों और शुरू करने की चाहत रखने वालों को मोदी सरकार की प्रधानमंत्री मुद्रा योजना से नया हौसला मिला जिसमें 50 हजार रुपये से लेकर 10 लाख रुपये तक के ऋण मुहैया कराने का प्रावधान है। मुद्रा योजना का अब तक करीब 7.5 करोड़ लोगों ने फायदा उठाया है जिसमें 70 फीसदी से ज्यादा महिलाएं हैं। न्यू इंडिया के सपने को सफलीभूत करने में महिलाएं भी आगे आ रही हैं, तो विरोधियों से देखा नहीं जा रहा है।

वोटबैंक के लक्ष्य से सफल नहीं होती योजनाएं
विरोधियों को तकलीफ इस बात से हो रही है कि धुएं में आंसू बहाकर खाना पकानेवाली महिलाओं के लिए को मुफ्त रसोई गैस देने की उज्ज्वला जैसी योजना का ख्याल उसे क्यों नहीं आया? लेकिन विपक्ष को ये भी जानना चाहिए कि ख्याल आ भी जाए तो वोट बैंक की राजनीति के साथ उसका क्रियान्वयन संभव नहीं..उसके लिए नीयत में ईमानदारी की भी दरकार होती है। आखिर महिला सशक्तिकरण की बात सिर्फ कागज पर तो नहीं हो सकती!

विपक्ष नहीं चाहता बेरोजगारी का स्थायी समाधान?
देश की नौजवान पीढ़ी हुनरमंद हो, अपनी पसंद के क्षेत्र में उन्हें रोजगार मिले साथ ही वो रोजगार देने वाले भी बन सकें, इसके लिए मोदी सरकार की स्किल डेवलपमेंट यानी कौशल विकास योजना को युवाओं ने हाथों-हाथ लिया। देश में पहली बार किसी सरकार ने कौशल विकास के लिए अलग से मंत्रालय का गठन किया। इस योजना के तहत चार साल में एक करोड़ लोगों को अलग-अलग हुनर का प्रशिक्षण दिये जाने का लक्ष्य है। एक रिपोर्ट बताती है कि अगले पांच साल में कई सेक्टरों में बड़े पैमाने पर कुशल कामगारों की आवश्यकता होगी।   मोदी सरकार में बेरोजगारी के स्थायी समाधान की कोशिश तेज है तो विरोधी परेशान हैं।

 

सरकार मार्केटिंग करती तो जनता नकार देती
दरअसल विपक्ष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकास के विजन और उस विजन को जनजीवन में लागू कर दिखाने की उनकी काबिलियत को पचा नहीं पा रहा है। प्रधानमंत्री के स्वच्छता अभियान में जनभागीदारी देखकर भी विपक्ष को अब अपनी सियासत का गेट खुलने की उम्मीद नहीं दिख रही।  बड़ी योजनाओं पर मोदी सरकार की सफलताओं की कहानियों ने विपक्ष को हिलाकर रख दिया है। वो इस सरकार की उपलब्धियों को मार्केटिंग बता रहा है तो ये उसकी सियासी मजबूरी से ज्यादा और कुछ नहीं। काला धन और भ्रष्टाचार पर लगाम के लिए नोटबंदी जैसे कदमों को मिला जन समर्थन और फिर विधानसभा चुनावों में लगातार मिली सफलताओं से ये जाहिर हो गया कि मौजूदा सरकार सिर्फ मार्केटिंग की होती तो जनता ने इसे नकार दिया होता। मोदी सरकार ने योजनाओं पर क्रियान्वयन करके दिखाया है और विपक्ष भी अंदर से इस सच को महसूस कर रहा है, लेकिन वो इसे स्वीकार कर ले तो फिर क्या होगा उसकी सियासत का। मोदी सरकार के तीन साल के प्रदर्शन के सामने ही उसे अपने साठ साल का प्रदर्शन बौना नजर आने लगा है।

कोरी बयानबाजी में देशहित भी भूल रहा विपक्ष
आतंक के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति हो या पाकिस्तान पर सख्ती का रुख मोदी सरकार ने इन मोर्चों पर भी हमेशा बिना किसी देरी के ठोस कदम उठाकर दिखाया है। विरोधियों की मजबूरी देखिए कि वो किस तरह मोदी सरकार के हर फैसले पर सवाल उठाकर या मार्केटिंग से जोड़कर देशहित को भी नजरअंदाज कर जा रहे हैं। देशवासियों को गौरवान्वित करनेवाले सर्जिकल स्ट्राइक जैसे कदम को लेकर भी अगर सरकार से सबूत मांगा जाए, तो इसे पाकपरस्ती नहीं तो फिर क्या माना जाए?

काम करने वाली सरकार ही देती है रिपोर्ट कार्ड
अपने कामकाज की शुरुआत में ही मोदी सरकार सवा सौ करोड़ देशवासियों के हित को लेकर अपनी प्रतिबद्धको ता जता चुकी थी। डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर-DBT के जरिए सरकारी स्कीमों की सौ प्रतिशत रकम जनता के खाते में पहुंचाकर ये सरकार उस प्रतिबद्धता  को साबित भी कर चुकी है। फिर कांग्रेस की कौन सी ऐसी सरकार रही थी जिसने जनता के बीच जाकर अपना रिपोर्ट कार्ड दिया हो। रिपोर्ट कार्ड के लिए कामकाज के खाते में कुछ होना भी तो चाहिए…क्या कांग्रेस स्पेक्ट्रम, कोलगेट और कॉमनवेल्थ घोटालों से लैस रिपोर्ट कार्ड दिखाती? मोदी सरकार को मार्केटिंग की सरकार करार देकर कांग्रेस समेत तमाम विपक्ष उसी कहावत को चरितार्थ कर रहा है कि खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे!

राजनीतिक रोटी नहीं पका पाने का गुस्सा
जनता की आवश्यकता से जुड़े मुद्दों पर भी राजनीतिक रोटी सेंकने की आदत पर कुठाराघात क्या हुआ, तिमलमिलाये विरोधियों ने नया राग अलापना शुरू कर दिया कि मोदी सरकार मार्केंटिंग की सरकार है। इसमें कांग्रेस के दिग्विजय सिंह सरीखे नेता सबसे आगे हैं जो मोदी सरकार में लागू योजनाओं की चर्चा में तो नहीं जाते लेकिन बड़े ही शातिर तरीके से विकास के सच को मार्केटिंग से जोड़कर पेश करने की नाकाम कोशिश करते हैं।

 

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