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ममता के कारण फिर उठी अलग गोरखालैंड की मांग

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दार्जिलिंग में अलग गोरखालैंड की मांग को लेकर जो आंदोलन चल रहा है, वह काफी हद तक 1985-86 में हुए आंदोलन जैसा है। गोरखालैंड की मांग नई नहीं है। फिर भी, अलग गोरखालैंड की मांग के आंदोलन के लिए भले ही पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री ममता बनर्जी केंद्र सरकार को जिम्मेदार ठहराएं लेकिन इस आंदोलन की आग उन्होंने खुद ही सुलगाई है। ममता बनर्जी सरकार ने पहले गोरखालैंड टेरीटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन को फंड देने में रूकावटें डाली। फिर अपनी पार्टी टीएमसी की पहुंच बढ़ाने के लिए क्षेत्र में फूट डालने की कोशिश हुई। इस सबके बीच पूरे बंगाल में बंगाली भाषा अनिवार्य करने के आदेश ने आग में घी का काम किया।

गोरखालैंड की अलग है पहचान
अलग गोरखालैंड के लिए जो क्षेत्र चिह्नित किए गए हैं। वहां के लोगों का रहन-सहन, पहनावा, बोली, खान-पान, सबकुछ पूरे पश्चिम बंगाल से अलग है। आजादी के बाद से, पहाड़ी क्षेत्र की ओर पहले की सरकारों ने ध्यान नहीं दिया। इस कारण यह क्षेत्र अन्य भूभाग से पिछड़ गया। पिछड़ेपन की समस्या और अलग संस्कृति की पहचान के लिए अलग गोरखालैंड की मांग जोर पकड़ी थी। उस आंदोलन से अलग गोरखालैंड तो नहीं बना लेकिन क्षेत्र के लिए समर्पित स्वायत्त संस्था गोरखालैंड टेरीटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन (जीटीए) सामने आया।

जीटीए को फंडिंग में रूकावट
वर्तमान में, गोरखालैंड टेरीटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन की सत्ता गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (जीजेएम) के पास है। जीजेएम का कहना है कि पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की सरकार बनने के बाद से लगातार इस एडमिनिस्ट्रेशन को फंड में दिक्कत हुई। सीएम बनर्जी बार-बार फंड की राह में रोड़ें अटकाती रही हैं। हालांकि केंद्र से मिलने वाला पैसा लगातार इस एडमिनिस्ट्रेशन को मिल रहा है।

बंगाली भाषा अनिवार्य करने पर उबले गोरखा 
ममता बनर्जी सरकार ने दार्जिलिंग समेत पश्चिम बंगाल के हर कोने में बंगाली पढ़ना अनिवार्य करने की घोषणा के साथ गोरखालैंड टेरीटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन की स्वायत्तता को ठेस पहुंचाई है। हालांकि बाद में इस आदेश को वापस ले लिया गया लेकिन तब तक आग में घी पड़ चुका था।

पहाड़ी एकता में फूट डालने की कोशिश
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अपनी और पार्टी तृणमूल कांग्रेस की पहुंच बढ़ाने के लिए गोरखा संप्रदाय के बीच तरह-तरह से फूट डालने की कोशिश की है। गोरखा लोगों के साथ जो लेप्चा और भूटिया लोग हैं, उनको भी बांटने की कोशिश की गई है। पहाड़ पर रहने वाला हर व्यक्ति चाहे वह लेप्चा हो, भूटिया हो, गुरुंग हो, शेरपा हो या फिर बिहारी, झारखंडी, बंगाली, मारवाड़ी हो, सबके सब गोरखा हैं। गोरखा कोई जाति नहीं, इस क्षेत्र की राजनीतिक पहचान है।

केंद्र पर आरोप लगाकर ममता बच नहीं सकतीं
अलग गोरखालैंड की मांग का नेतृत्व जीजेएम कर रहा है, जो भारतीय जनता पार्टी के साथ एनडीए में शामिल है। क्षेत्र में राजनीतिक रूप से घुसपैठ करने की कोशिश में टीएमसी ने क्षेत्र की एकता में फूट डालने की कोशिश की। इसके बाद गोरखा पश्चिम बंगाल सरकार के खिलाफ आंदोलन फिर से शुरू हो गया। अब राजनीतिक विरोध चमकाने और अपनी गर्दन बचाने के लिए केंद्र सरकार पर आरोप मढ़ने से ममता बनर्जी की सरकार जिम्मेदारी से बच नहीं सकती।

एक सार्वजनिक बैठक में ममता बनर्जी ने कहा कि मैं बंगाल का विभाजन नहीं होने दूंगी। उन्होंने गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (जीजेएम) के आंदोलन को गहरे षडयंत्र का हिस्सा बताया और कहा कि इस आंदोलन को पूर्वोत्तर भारत के उग्रवादी समूह और विदेशी देशों द्वारा समर्थन दिया जा रहा है। केंद्र सरकार पर भी हमला करते हुए ममता बनर्जी ने कहा कि वह कश्मीर को संभाल नहीं सकते हैं और दार्जलिंग में दखल दे रहे हैं।

सिक्किम ने की केंद्र से हस्तक्षेप की मांग
अलग गोरखालैंड की मांग के लिए हो रहे आंदोलन की आंच सिक्किम भी पहुंच गई है। यहां भी गोरखालैंड की मांग को लेकर प्रदर्शन शुरू हो गए। ये प्रदर्शन हिंसक होते जा रहे हैं। इसके अलावा सिक्किम को पूरे देश से जोड़ने वाला एक मात्र सड़क मार्ग है राष्ट्रीय राजमार्ग दस। एनएच 10 उत्तर बंगाल के सिलिगुडी को गंगटोक से जोड़ता है। यह राजमार्ग पिछले माह जून की 15 तारीख से बंद है। इससे भी सिक्किम को दिक्कत हो रही है। इसको देखते हुए सिक्किम के सीएम पवन कुमार चामलिंग ने केन्द्र सरकार से हस्तक्षेप करने की मांग की है। सीएम चामलिंग ने कहा है कि केन्द्र सरकार अगर काई त्वरित कार्रवाई नहीं करती है तो वे सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाएंगे।

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