Home नरेंद्र मोदी विशेष मोदी-राज में खादी ने छुआ आसमान

मोदी-राज में खादी ने छुआ आसमान

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खादी एक वस्त्र नहीं, विचार है। खादी के लिए इस विचारधारा के साथ, इसके विकास के लिए प्रयत्नशील मोदी सरकार ने वास्तव में वह कर दिखाया है, जो खादी को ‘अपना’ अधिकार क्षेत्र मानती रही पिछली सरकारें, अपने दशकों के शासन के बावजूद नहीं कर पाई।

आसमान छूती खादी की बिक्री 

प्रधानमंत्री मोदी ने स्वयं अपने जीवन में खादी को अपनाकर और अपने रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ में खादी-उत्पादों की ओर देश का ध्यान आकर्षित करते हुए, उसे अपनी नियमित जीवनचर्या में अपनाने के लिए, देश का आह्वान किया था। उसका क्या परिणाम निकला, इसे हम वर्तमान के ताजा आंकड़ों से समझ सकते हैं। इसी वर्ष अप्रैल 2017 से सितंबर 2017 की तिमाही के दौरान ही खादी उत्पादों की बिक्री में लगभग 90 प्रतिशत की बढ़त दर्ज की गई। केवल धनतेरस के दिन, 17 अक्टूबर, 2017 को अकेले राजधानी दिल्ली के कनॉट प्लेस स्थित खादी के शोरूम पर ही खादी के उत्पादों की रिकॉर्ड बिक्री दर्ज हुई। यह बिक्री थी- 1.2 करोड़ रुपये, जो कि पिछले वर्ष 1.11 करोड़ की तुलना में बहुत उत्साहजनक है।

खादी के दावेदारों की चिरातन उपेक्षा

यह बात विगत रहे कि कुछ समय पहले कांग्रेस के अभिषेक मनु सिंघवी ने यह बयान दिया था कि खादी की सोच, खादी का प्रचार और खादी से संबंध पर ‘एकमात्र’ गांधी जी का ही अधिकार था। कितना ही अच्छा होता कि वे इस बात को समझ पाते कि निसंदेह गांधी जी ने खादी को देश के जनमानस में जो स्थान दिलाया था, उससे तो कोई भी, किसी की भी तुलना नहीं कर सकता। स्वयं प्रधानमंत्री मोदी ने भी कभी ऐसा कोई दावा नहीं ठोका, परंतु खादी पर ‘अपनी’ दावेदारी जताने वालों ने क्या गांधी जी के योगदान के उन सच्चे अर्थों को समझा कि ऐसा करने के पीछे गांधी जी का उद्देश्य खादी पर एकमात्र अपना आधिपत्य स्थापित करना नहीं, बल्कि सामान्य जन को खादी से जोड़ना था। इन आधुनिक दावेदारों ने खादी के प्रति अपने कर्तव्यों की न तो कभी कोई बात की और न ही इसे वर्तमान आधुनिक परिवेश में भी प्रासंगिक बनाए रखने के लिए कभी कोई प्रयास किया। खादी बुनकरों की दशा में परिवर्तन लाने के लिए उनके द्वारा कोई ठोस प्रयास करना तो दूर की बात है।

मन की बात में खादी का साथ

अब हम आते हैं खादी के प्रति प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रयासों पर। लगभग तीन साल पहले सत्ता में आने के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने ‘मन की बात’ कार्यक्रम के मंच से पहली बार देशवासियों से खादी को अपने जीवन में, चाहे छोटा सा ही सही, स्थान देने का आह्वान किया था। उन्होंने देशवासियों को इस बात के लिए प्ररित किया कि वे खादी का कोई न कोई उत्पाद जरूर खरीदें। चाहे वह कपड़े, बैग, कुशन कवर, पर्दे, यहां तक कि एक रूमाल ही क्यों न हो। उनके इस आह्वान का नतीजा यह निकला कि देश का ध्यान तेजी से इस ओर आकर्षित हुआ। साथ ही इन व्यावहारिक आंकड़ों पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है कि कांग्रेस शासनकाल में खादी की बिक्री 2.7 प्रतिशत थी, जो मोदी सरकार के केवल 3 वर्ष के शासनकाल में बढ़कर 35 प्रतिशत पर पहुंच गई।

देश-प्रेम का प्रतीक है खादी

भारत के लिए खादी का क्या महत्त्व है, यह बात किसी भी देशवासी को बताने की आवश्यकता नहीं है। महात्मा गांधी ने पहली बार वर्ष 1920 में खादी के रूप में स्वदेशी अपनाने के आह्वान के साथ ही देश को इससे जोड़ दिया था और उनकी प्रेरणा से खादी अपनाने को देशवासियों ने एक अहिंसक हथियार के रूप में प्रयोग किया। समय के साथ खादी एक ‘विशिष्ट’ वर्ग से जुड़ी भी और फिर उन्हीं तक सीमित भी हो गई। ‘खादीधारी’ धीरे-धीरे एक ऐसा शब्द बनता चला गया, जिसका अर्थ होता था, सामान्य जनता से दूर।

खस्ताहाल है खादी बनाने वालों का हाल 

वास्तव में खादी उस भारत का प्रतिनिधित्व करती है, जो आज भी गांवों में ही बसता है। खादी-उद्योग की स्थापना के लिए बहुत कम संसाधन, मगर बहुत कठिन श्रम की आवश्यकता पड़ती है। इस कारण से यह गरीब ग्रामवासियों के लिए रोजगार का उत्तम विकल्प है, जो कि कोई बड़ा व्यवसाय आरंभ कर पाने में सक्षम नहीं होते। औद्योगिकरण के कारण सभी इकाइयों के तेजी से हो रहे मशीनीकरण के चलते ग्रामोद्योग की ओर गंभीरतापूर्वक ध्यान देने की आवश्यकता और अधिक बढ़ जाती है, क्योंकि खादी उत्पादन से जुड़ा वर्ग आज भी गांवों में बसा एक गरीब-गुरबा ही है। गांवों का चेहरा होने के बावजूद, खादी अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए शहरी खरीदारों पर आश्रित है। विशिष्ट वर्ग का प्रतिनिधि होने के बावजूद खादी को आवश्यकता है, सामान्य वर्ग के सामान्य जीवन की निरंतरता से जुड़ने की। यह और बात है कि पिछली सरकारों के शासनकाल में ऐसा कुछ नहीं हुआ और खादी अपनी दुर्दशा के चरम पर पहुंच गई।

खादी फॉर ट्रांसफॉर्मेशन

मोदी सरकार ने सत्ता में आते ही ग्रामीण इकाइयों के उत्थान की दिशा में प्रयास तेज कर दिए। इन लघु इकाइयों को अनेक योजनाओं की सहायता से हर जरूरी साधन-संसाधन उपलब्ध कराए, इकाई आरंभ करने के लिए ऋण उपलब्ध कराया। प्रशिक्षण उपलब्ध कराया और यह सब करने के लिए नरेंद्र मोदी ने सबसे पहले स्वयं अपने नियमित जीवन से खादी को जोड़ा।  आज ‘मोदी कट’ कुर्ता नया फैशन स्टाइल है, जिसकी खादी के शोरूमों पर भारी मांग रहती है। उन्होंने इस व्यवसाय से जुड़े लोगों की आवश्यकताओं और परेशानियों को समझा। उसे दूर करने के लिए आवश्यक प्रावधान किए। यहां तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इन योजनाओं का लक्ष्य है, खादी को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक सशक्त भारतीय ब्रांड बनाना। प्रधानमंत्री का यह कथन उनके इन प्रयासों की पुष्टि भी करता है- पहले खादी फॉर नेशन से खादी फॉर फैशन थी और अब यह खादी फॉर ट्रांसफॉर्मेशन है।

इसमें कोई शंका नहीं है कि मोदी-नेतृत्व में खादी  जल्दी ही खादी फॉर वर्ल्डस् डेकोरेशन बन जाएगी।

 

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