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मोदी सरकार ने बदली जम्मू-कश्मीर की महिलाओं की जिंदगी, ‘उम्मीद’ से घर में आईं खुशियां

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जम्मू-कश्मीर की फिजाओं में फैली आतंक की हवा के रुख को मोड़ने में लगे हैं। उन्होंने ऐसी रणनीति बनायी है, जिसमें आतंक पर चौतरफा हमले के साथ ही राज्य में विकास की धारा को भी तेज कर दिया गया है। युवाओं को रोजगार के अवसर उपलब्ध करने के साथ ही महिलाओं को भी आर्थिक और सामाजिक रूप से सक्षम बनाया जा रहा है। मोदी सरकार की ‘उम्मीद’ योजना ने राज्य के मरियम और सुमबल इलाक़े में हजारों महिलाओं की जिंदगियां बदल दी हैं।

‘उम्मीद’ बनी जीने का सहारा

जम्मू-कश्मीर में ‘उम्मीद’ के नाम से चलाई जा रही राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन योजना अपने नाम के मुताबिक कई महिलाओं के लिए बेहतरी की उम्मीद बन गई है। इस योनजा को आजीविका या दीनदयाल उपाध्याय अंत्योदय योजना भी कहा जाता है। विश्व बैंक द्वारा समर्थित यह देशव्यापी योजना ग्रामीण गरीबों की घरेलू आय और स्थायी आजीविका बढ़ाने के मकसद से शुरू की गई थी। देश के अन्य हिस्सों में तो यह योजना ग्रामीण विकास मंत्रालय के तहत 2011 से ही चल रही थी। लेकिन कश्मीर घाटी में यह 2014 में लागू हुई। सुमबल शायद पहला ब्लॉक था जहां यह योजना लोगों के बीच लाई गई। 

‘उम्मीद’ से जुड़ी हजारों महिलाएं

शुरू-शुरू में ज्यादातर महिलाएं ‘मान-मर्यादा’ के चलते इस योजना से दूर ही थीं। एक स्थानीय महिला शाइस्ता ने बताया कि जब 2014 में बाढ़ ने कोहराम मचाया तो यहां की औरतों को एक ही रास्ता नजर आया और वो थी यह योजना। धीरे-धीरे ‘उम्मीद’ से जुड़ने वाली महिलाओं की संख्या बढ़ने लगी और इस समय सिर्फ सुमबल ब्लॉक में 4500 महिलाएं इस योजना का लाभ उठा रही हैं।

महिलाओं के हाथ में है ‘उम्मीद’ की डोर

इस योजना में 10 औरतों का एक स्वयं सहायता समूह (SHG) बनता है। पहले तीन महीने तक हर हफ्ते सबको अपनी जेब से 25-25 रुपये जमा कराने होते हैं। तीन महीने बाद इनको 15000 रुपये मिलते हैं, और यही औरतें तय करती हैं कि किसको कितने पैसे की ज़रूरत है। कर्जे की किस्त भी यही तय करती हैं। महिलाओं को दूसरी किस्त 25 हजार रुपये की मिलती है और यह पैसा वापस भी आता है तो इन्हीं समूहों में घूमता रहता है।

SHG में जमा हुए करोड़ों रुपए

महिलाएं हर हफ्ते एक खास रकम जमा करती है। जमा की गई यही रकम सुमबल ब्लॉक में इस समय दो करोड़ से ऊपर की है। और ये दो करोड़ सुमबल की सिर्फ 16 ग्राम पंचायतों में चल रहे 450 एसएचजी की जमा की हुई है। जमा किए गए इन पैसों में से ही इन औरतों के चुने गए प्रतिनिधियों को वेतन मिलता है। इन प्रतिनिधियों में कम्यूनिटी ट्रेनर, कम्यूनिटी मोबिलाइज़र और क्लस्टर कोऑर्डिनेटर शामिल हैं, जिन्हें 1500 से 8000 रु तक वेतन दिया जाता है।

आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन रही हैं महिलाएं

हैरानी की बात यह है कि SHG से जुड़ी ज़्यादातर महिलाएं अनपढ़ हैं और इस समय अलग-अलग कामों के जरिये अपने परिवारों को धीरे-धीरे ग़रीबी से बाहर निकाल रही हैं। यहां कोई महिला डेयरी चला रही है, कोई रेशम के कीड़े का पालन कर रही है, कोई पेपर माशी का काम, कोई कालीन बुन रही है तो कोई स्वेटर। स्थानीय आदिल कहते हैं कि यह गजब है कि एक छोटी-सी पहल, एक छोटी-सी योजना कैसे हजारों लोगों को गरीबी से बाहर निकाल रही है। मैं रोज़ देखता हूं और रोज़ हैरान होता हूं। यह योजना सिर्फ लोगों को गरीबी से बाहर नहीं निकाल रही, बल्कि कुछ लड़कियों के ख्वाब भी पूरे कर रही है।

महिलाओं की सामाजिक स्थिति में बदलाव

दिलचस्प बात यह भी है कि यह योजना सिर्फ आर्थिक रूप से इन औरतों कि मदद नहीं कर रही बल्कि इसकी बदौलत उन्हें सामाजिक मजबूती भी मिल रही है। सुमबल के नौगाम गांव में रहने वाली जैतूना भुट्टो कहती है कि आमदनी तो नियमित हुई ही है, समाज में उनकी इज्ज़त भी बढ़ गयी है और जहां पहले औरतों को सामाजिक मुद्दों में दखलंदाजी से रोका जाता था। अब वहीं गांव के मर्द उनसे मशविरा किए बगैर कोई काम नहीं करते।

इसी तरह 2015 में एक एसएचजी से जुड़ी एक स्थानीय महिला पोशा कहती है कि उसने एसएचजी से पहला लोन लिया। इन पैसों से कालीन बुनने का समान खरीदा और अपनी बेटी के लिए पशमीना का काम ले आयीं। इसके बाद उनकी माली हालत लगातार सुधरी। आज मेरे पति मेरी मंजूरी के बगैर कोई काम नहीं करते। यहां तक कि पड़ोस के मर्द भी मुझसे सलाह मांगने आते हैं। गांवों के मर्द भी अब यह मानने लगे हैं कि औरतें सिर्फ घर संभालने के लिए नहीं होतीं और वे मर्दों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल सकती हैं।

जम्मू-कश्मीर में आए इस बदलाव के पीछे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की दूरदर्शी नीति और उनकी प्रेरणा ने भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। प्रधानमंत्री ने ठीक एक साल पहले जुलाई 2018 में दीनदयाल अंत्योदय योजना-राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (डीएवाई-एनआरएलएम), डीडीयू-जीकेवाई और आरएसईटीआई के तहत जम्मू-कश्मीर सहित पूरे देश के स्वयं सहायता समूह से जुड़ी महिलाओं से संवाद किया। नरेन्द्र मोदी ऐप के माध्यम से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से बात करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा, ”महिला सशक्तीकरण के लिए सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता होती है, महिलाओं को स्वयं की शक्तियों को, अपनी योग्यता को, अपने हुनर को पहचानने का अवसर उपलब्ध कराना।” उन्होंने कहा कि सेल्फ हेल्प ग्रुप एक तरह से गरीबों, खासकर महिलाओं की आर्थिक उन्नति का आधार बने हैं। ये ग्रुप महिलाओं को जागरूक कर रहे हैं, उन्हें आर्थिक और सामाजिक तौर पर मजबूत भी बना रहे हैं।

प्रधानमंत्री मोदी ने जानकारी दी कि अब तक महिलाओं के करीब 45 लाख सेल्फ हेल्प ग्रुप बनाए गए हैं। इनसे तकरीबन 5 करोड़ महिलाएं सक्रिय रूप से जुड़ी हुई हैं।

उन्होंने बताया कि 2011 से 2014 तक 5 लाख सेल्फ हेल्प ग्रुप बने थे और सिर्फ 50 से 52 लाख परिवारों को सेल्फ हेल्प ग्रुप से जोड़ा गया था। जबकि 2014 से 2018 तक 20 लाख से अधिक नये सेल्फ हेल्प ग्रुप बने हैं और सवा दो करोड़ से अधिक परिवारों को सेल्फ हेल्प ग्रुप से जोड़ा गया है। यानि पहले की तुलना में सेल्प हेल्प ग्रुप चार गुना बढ़े हैं और चार गुना लोगों को इसका लाभ मिला है।

उन्होंने कहा कि दीनदयाल अंत्योदय योजना-राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत देश भर के 2.5 लाख ग्राम पंचायतों में करोड़ों ग्रामीण गरीब परिवारों तक पहुंचने और उन्हें स्थायी आजीविका के अवसर उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया है।

प्रधानमंत्री मोदी ने सेल्फ हेल्प ग्रुप के सदस्यों और लाभार्थियों से संवाद किया। बातचीत करने वाली महिलाओं ने बताया कि स्वयं सहायता समूह से जुड़ने के बाद उनके जीवन में बदलाव आया है। आइए देखते हैं देश में महिलाओं की जिंदगी में कितना बदलाव आया है…

स्वयं सहायता समूह से जुड़कर बदल गई अमृता की जिंदगी
बिहार में खगड़िया की रहने वाली अमृता देवी के पास एक एकड़ जमीन थी और परिवार में नौ लोग थे। पहले भरण पोषण होना भी मुश्किल था। अमृता देवी ने हा, ”जब जीविका आया तो हमलोग समूह में जुड़कर लोन लेने लगे। खेत पट्टा पर लिए फिर उत्पादन कर लोन चुका दिए। फिर 25 हजार लोन लिए गाय और बकरी पालन के लिए। फिर यह कर्ज भी चुका दिए। इसके बाद 30 हजार लोन लिए और किराना दुकान खोल दिए। फिर लोन चुका दिया। समूह में मुझे एचआरपी पद पर रख लिया गया। अब दो हजार रुपया महीना मिलने लगा है। उसी से हमलोग खुशहाल हैं। बच्चों को भी अच्छे से पढ़ाते हैं।”

अमृता देवी ने बताया कि एक समूह में 200 परिवार हैं और सभी महिलाएं खेती का काम करती हैं। विशेषकर मक्के का उत्पादन करने वाली 1500 महिलाओं मिलकर एक कंपनी खोली और अब बिचौलियों के बिना ही मक्का बेच पाती हैं जिससे इन्हें प्रति क्विंटल चार सौ से पांच सौ की बचत हो जाती है।

लागत का तीस प्रतिशत मुनाफा कमाता है मीना मांझी का स्वयं सहायता समूह
छत्तीसगढ़ में राजनंदगांव के कोरेवाड़ा गांव की रहने वाली मीना मांझी ने बताया कि उनका ग्रुप ईंट का निर्माण करता है। इस वर्ष डेढ़ लाख रुपये ईंट बनाए हैं। 12 लोगों का एक समूह यह कार्य करता है और इसके लिए बाहर से भी बुलाया जाता है। दो रुपये की लागत से बना एक ईंट तीन रुपये में बेचा जाता है, यानि एक ईंट पर तीस प्रतिशत से अधिक मुनाफा होता है। ग्रुप से जुड़ी महिलाओं की 8 से दस हजार तक प्रति माह की कमाई हो जाती है।

प्रधानमंत्री ने जानकारी दी कि सेल्फ हेल्प ग्रुप के माध्यम के तहत 33 लाख महिला किसानों को ट्रेनिंग दी गई है। 25 हजार से अधिक कम्युनिटी लाइवलहुड रिसोर्स पर्सन चुने गए हैं जो ग्रामीण अवसर पर 24 घंटे रिसोर्स उपलब्ध करवा रहे हैं।

पीएम मोदी ने कहा कि अब लोग कृषि के क्षेत्र में वैल्यू एडिशन का महत्व समझने लगे हैं और इसे अपना रहे हैं। इसका लाभ भी मिल रहा है।

उन्होंने जानकारी दी कि कई राज्यों में कुछ विशेष उत्पाद के लिए मक्का, आम, फूलों की खेती और डेयरी के लिए वैल्यू चेन एप्रोच को अपनाया गया है। इसके लिए सेल्फ हेल्प ग्रुप से 2 लाख सदस्यों को सपोर्ट किया गया है।

उन्होंने बताया कि बिहार में ढाई लाख से अधिक सदस्य प्रशिक्षण प्राप्त कर धान की बेहतर खेती कर रहे हैं। 2 लाख नये सदस्य सब्जी की खेती कर रहे हैं। बिहार में ही लाख की चूड़ियां बनाने के लिए क्लस्टर भी स्थापित किए गए हैं और एक प्रोड्यूसर ग्रुप भी बनाया गया है। करीब दो हजार सेल्फ हेल्प ग्रुप इससे जुड़े हुए हैं।

उन्होंने बताया कि छत्तीसगढ़ के 22 जिलों में 122 बिहान बाजार आउटलेट बनाए गए हैं, जहां सेल्फ हेल्प ग्रुप के 200 वेराइटी के उत्पाद बेचे जाते हैं।

10 से 12 हजार रुपए प्रतिमाह की हो रही रही कमाई- सुधा बघेल
मध्य प्रदेश की सुधा बघेल ने बताया कि आजीविका मिशन में जुड़ने से पहले उनकी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। गरीबी में जीवन यापन कर रही थी। बाद में समूह से जुड़ीं और छोटी-छोटी बचत से शुरुआत की। अब तक उन्होंने डेढ़ लाख लोन लिए हैं और बकरी पालन, चूड़ी निर्माण और अपनी सूखी जमीन को सिंचित करवाया है। आज 10 से 12 हजार रुपए प्रतिमाह आय है। दो बच्चे हॉस्टल में है और वे पढ़ाई भी कर रही हैं। उन्होंने बताया, ‘’हमारे ब्लॉक में 15 दीदियां सेनिटरी नैपकिन के निर्माण का कार्य करती हैं। प्रति दिन उहें 300 रुपया मिलता है। हमारे साथ में मार्केटिंग करने के लिए 20 दीदियां हैं जो गांव-गांव जाकर सेनिटरी नैपकिन, टॉयलेट क्लीनर, हैंडवास, फिनाइल गांव-गांव पहुंचाते हैं।‘’

एक हजार से अधिक खाते खोल चुकी हूं – रेखा गिरासे 
मध्य प्रदेश की रेखा गिरासे बैंकर सखी का कार्य कर रही हैं। 12वीं तक पढ़ी रेखा तीन साल पहले मिशन से जुड़ीं और रोजगार में लग गईं। प्रशिक्षण लिया और बैंकर सखी बन गईं। उन्होंने कहा, ‘’मैं तीन साल पहले बैंक नहीं जानती थी, लेकिन आज 1000 से अधिक खाते भी खोल चुकी हूं जिसमें साढ़े तीन करोड़ का लेन-देन कर चुकी हूं। मुझे आठ से दस हजार कमीशन मिल जाता है।‘’

ब्यूटी पार्लर से कमाती हूं 10 हजार रुपये महीना- वंदना कुशवाहा
बड़वानी जिले के ग्राम कलून की वंदना कुशवाहा ने बताया कि उनकी तीन बेटियां हैं जिसे वे पढ़ाना चाहती थीं। लेकिन गरीबी के कारण संभव नहीं हो पा रहा था। आरसीटी का कैंप लगा तो उन्होंने ट्रेनिंग ली। उन्होंने अनुभव बताते हुए कहा, ‘’मैंने ब्यूटी पार्लर की ट्रेनिंग के साथ उद्यमिता विकास की ट्रेनिंग ली। मेरे मन का डर निकल गया और मैंने काम करना शुरू कर दिया।‘’ उन्होंने कहा कि अब वे प्रति माह आठ से दस हजार कमाती हैं और आरसीटी में ट्रेनिंग का भी काम करती हैं।

20 हजार रुपये प्रतिमाह कमाकर माता-पिता की सहायता कर रही हूं- रेवती चौबे
एमपी के सागर के जैदपुर गांव की रहने वाली रेवती चौबे ने बताया कि माता पिता के 9 संतान में से वह चौथे नंबर की हैं। घर में गरबी थी, लेकिन वह अपने माता-पिता की सहायता करना चाहती थीं। आजीविका मिशन के तहत डीडीयूजीकेवाय के सागर सेंटर से हॉस्पीटल की ट्रेनिंग ली और अहमदाबाद में काम किया। अब इंदौर में डीडीए में कार्यरत हैं जहां उनकी तन्ख्वाह 20 हजार रुपये महीने है।

इस पर पीएम मोदी ने जानकारी दी कि देश के प्रत्येक जिले में ग्रामीण स्वरोजगार प्रशिक्षण संस्थान स्थापित किया गया है। मई तक के आंकडों के अनुसार करीब छह सौ ग्रामीण स्वरोजगार प्रशिक्षण संस्थान काम कर रहे हैं और इसके तहत 28 लाख युवाओं को ट्रेनिंग दी गई है। इनमें 19 बीस लाख को रोजगार से जोड़ा जा चुका है।

उन्होंने बताया कि करीब 2000 सेल्फ हेल्प ग्रुप देश भर में बैंक मित्र या बैंक सखी के रुप में काम कर रहे हैं। इससे करीब साढ़े तीन सौ करोड़ का लेनदेन हुआ है।

स्वयं सहायता समूह से जुड़कर बढ़ा आत्मविश्वास-नीरज नोनोमय 
राजस्थान में डुंगरपुर केखजूरिया की नीरज नोनोमय ने कहा, ‘’समूह में जुड़ने से पहले आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। 25 रुपये की बचत कर मैंने छह बार लोन लिया। बकरी पालन, सिलाई मशीन और जमीन गिरवी को छुड़वा लिया। मुझे बाहर निकलने का मौका मिला, मेरा आत्मविश्वास बढ़ा। आज मैं खुद निर्णय ले सकती हूं।‘’ उन्होंने बताया कि उनके ग्रुप में 53 महिलाएं हैं और सोलर लैंप और सोलर पैनल बनाती हैं।

स्वयं सहायता समूह ने घर से बाहर निकलने की दी हिम्मत- कौश सायन
तेलंगाना में वारंगल की रहने वाली कौश सायन गणिका दुर्गा महिला स्वयं सहायता समूह की सदस्य हैं। गरीब परिवार का होने के कारण मुश्किल थी। बाल विवाह हुआ, 20 साल में दो बच्चे भी हो गए। नशे के आदी पति से अलगाव हो गया। इसके बाद एनआरएलएम के तहत सीआरपी का चुनाव हुआ। वह अब तक आठ राज्यों में घूम चुकी हैं। उन्होंने कहा, ‘’एक गरीब महिला बिना किसी के मदद के आजीविका चला सकती है ये मैं समूह में जुड़कर कर पाई। घर पार करके, जिला पार करके, राज्य पार करके जो हिम्मत दी है।“

बकरी से जुड़े उत्पादों से बढ़ी कमाई, बदली जिंदगी-रंजना
महाराष्ट्र में यवतमाल की रंजना ने बताया कि लक्ष्मी माता ग्राम संगठन में 2015 से काम कर रही हैं। पहले उनके पास एक बकरी थी और अब खुद की चालीस बकरियां हैं जबकि ग्रुप में 2900 बकरियां हैं। पशु संसाधन केंद्र के माध्यम से बकरी के दूध का साबुन बनाती हैं। बकरी के दूध से पनीर बनाती हैं। आइसक्रीम बनाती हैं। बकरी के लीद से खाद बनाती हैं। उन्होंने कहा, मेरी आय बढ़ गई है।‘’

इस पर प्रधानमंत्री मोदी ने उनकी प्रशंसा की और कहा, ”मेरे लिए यह नई जानकारी है कि बकरियों के माध्यम से इतना बड़ा कारोबार खड़ा किया जा सकता है।”

प्रधानमंत्री मोदी के अभियान से मुझे मिली नई दिशा -लक्ष्मी अमोल शिंदे
महाराष्ट्र में वर्धा की रहने वाली लक्ष्मी अमोल शिंदे ने कहा कि उनका पापड़ का बिजनेस है। उन्होंने कहा कि ग्रुप से जुड़ने के बाद पहले दो दीदी जुड़ीं और अब दस दीदियां जुड़ गई हैं। उन्होंने बताया, ‘’कुल आमदनी तीस से पैंतीस हजार होती है जो 11 महिलाओं में बंट जाती है। उन्होंने कहा, ‘’मैं 15 हजार रुपया कमा पाती हूं। मैं इस अभियान को धन्यवाद देती हूं। मुझे इससे नई दिशा मिली।‘’

महाराष्ट्र के कोलव गांव की सोनू मांद्रे ने बताया कि तीन महीने की ट्रेनिंग में बहुत कुछ सीखने को मिला। टीम वर्क, मनी मैनेजमेंट, टाइम मैनेजमेंट जैसी चीजें सीखीं। उन्होंने कहा ”मैंने अपनी कमाई से भाई को 70 हजार रुपए का गिफ्ट दिया, पिता की मदद की और बहन की शादी के लिए 40 हजार रुपए जमा करके रखी हूं।”

 
पीएम मोदी ने इस पर बताया कि दीन दयाल उपाध्याय योजना के तहत कई काम किया जा रहा है। नये गांवों में जाकर लोगों को प्रशिक्षण दिया जा रहा है। उन्होंने जानकारी दी कि इसके तहत लोन का वापस भुगतान भी समय पर किया जा रहा है। सेल्फ हेल्प ग्रुप के 99 प्रतिशत पैसे वापस आ जाते हैं। ये गरीबों की अमीरी है। पीएम मोदी ने बताया कि इस पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है कि सेल्फ हेल्प ग्रुप से बाजार जुड़े। इसके लिए सरकार सरस मेला को साल में दो बार अनुदान देती है। उन्होंने कहा कि सरकार के पोर्टल GEM पर रजिस्टर करवाने से सरकार इनके उत्पादों को सीधे खरीद सकती है।

निंबोली इकट्टी कर लक्ष्मी बेन ने की लाखों की कमाई 
गुजरात में खेड़ा की रहने वाली लक्ष्मी बेन ने कहा कि मेरे घर की स्थिति खराब थी हमारे पास खेत नहीं थी दूसरों के खेत में मजदूरी करती थी। निंबोली इकट्ठा करने से साढ़े तीन लाख की कमाई की। इसका उपयोग नीम कोटिंग यूरिया में किया जाता है।

राजस्थान में पाली जिले की बाली देवी ने कहा कि वैल्यू चेन के तहत 16 कलेक्शन सेंटर खोले हैं जिसके तहत सीताफल बेचा जा रहा है। इससे काफी लाभ मिला है। वहीं पाली की ही शांति देवी ने बताया कि महिला विकास समूह के तहत उन्होंने चूड़ी बनाने का काम किया। पहले तीस महिलाएं काम करती थीं अब 150 लोग काम कर कर रहे हैं। समूह को कई शहरों से इस साल आठ लाख रुपये के ऑर्डर मिल चुके हैं। वहीं जम्मू कश्%