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योग दिवस विशेष: प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की योग दृष्टि

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प्राचीन भारतीय ग्रंथों में लिखी योग की बातों को नए संदर्भ में जानने-समझने की कोशिश पूरी दुनिया में चल रही है। योग विद्या दुनिया को भारत की देन है। भारत में योगियों ने इसे ज्ञान का सर्वोपरि साधन माना है। इसकी जड़ें अनादि काल से हैं। ऋग्वेद में इसके उल्लेख का अभिप्राय यही है कि वैदिक ऋचाओं से पहले भी भारतीय दर्शन में योग का माहात्म्य था। स्वयं भगवान शिव को आदि योगी माना गया है। गीता में कहा गया है, ‘योग: कर्मेषु कौशलम्‌’। यानी जो योग की साधना करता है, उसके कर्मो में निपुणता आती है।

जब 21 जून, 2015 को पहला अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाया जा रहा था तब भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पूरे विश्व की तरफ से उन सभी महापुरुषों के प्रति आभार व्यक्त किया, जो सैकड़ों-हजारों वर्षों से योग की विद्या को न सिर्फ संजो कर रखते आए, बल्कि अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का माहात्म्य भी करते रहे हैं। जाहिर है योग पर जब भी इतिहास के पन्ने पलटे जाएंगे, तो सैकड़ों हजारों योगियों की चर्चा के बिना इसका अभिप्राय पूरा नहीं होगा। परंतु एक सच यह भी है कि आज जब योग पूरी दुनिया में जन आंदोलन का रूप ले चुका है, ऐसे में नरेन्द्र मोदी के विचारों के बिना योग को संपूर्णता में समझना आसान न होगा। इसलिए मैंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा योग के संबंध में कहे गए विचारों का विश्लेषण करने की कोशिश की है। साथ ही उन सभी भाषणों को इकट्ठा करने का प्रयत्न किया है, जो उन्होंने योग के संबंध में कही है। इन सभी बातों में महत्वपूर्ण बातों को दिनांक, वर्ष और स्थान के हिसाब से अलग-अलग जुटाने का प्रयत्न किया है। इन भाषणों से आज के संदर्भ में योग को, उसके स्वरूप को और योग को लेकर प्रधानमंत्री के विजन को समझना आसान रहेगा।

23 मई, 2013 – अहमदाबाद में देश के पहले योग विश्वविद्यालय लकुलीश योग युनिवर्सिटी के उद्घाटन के अवसर पर उन्होंने कहा कि, आज का मानव भौतिक जीवन में कई समस्याओं से ग्रस्त होकर तनावपूर्ण जीवन बिताता है, योग की शक्ति से ही तनाव व अवसाद से दुनिया को बाहर निकाला जा सकता है। लोग डॉलर व पाउण्ड की तुलना रुपयों के साथ करने में व्यस्त हैं, लेकिन जीवन में सच्ची खुशी चाहिए तो जीवन को योग के साथ संतुलित करना चाहिए। आज दुनिया में हर कोई भ्रमित, दुखी है और आंतरिक शांति की तलाश में है, उसे भौतिक दौलत नहीं चाहिए, बल्कि शांति चाहिए और केवल योग से ही इसे प्राप्त किया जा सकता है।

27 सितंबर, 2014 को संयुक्त राष्ट्र में पहली बार अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाने की अपील की और कहा कि, योग हमारी पुरातन पारंपरिक अमूल्‍य देन है। योग मन व शरीर, विचार व कर्म, संयम व उपलब्धि की एकात्‍मकता का तथा मानव व प्रकृति के बीच सामंजस्‍य का मूर्त रूप है। यह स्‍वास्‍थ्‍य व कल्‍याण का समग्र दृष्टिकोण है। योग केवल व्‍यायाम भर न होकर अपने आप से तथा विश्व व प्रकृति के साथ तादात्म्य को प्राप्त करने का माध्यम है। यह हमारी जीवन शैली में परिवर्तन लाकर तथा हम में जागरूकता उत्पन्न करके जलवायु परिवर्तन से लड़ने में सहायक हो सकता है। आइए हम एक ‘’अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस’’ को आरंभ करने की दिशा में कार्य करें।

21 जून, 2015 को दिल्ली के राजपथ में आयोजित पहले अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि, कभी किसी ने सोचा होगा कि ये राजपथ भी योगपथ बन सकता है। संयुक्त राष्ट्र के द्वारा आज अंतर्राष्‍ट्रीय योग दिवस का आरम्‍भ हो रहा है। लेकिन मैं मानता हूं आज 21 जून से, अंतर्राष्‍ट्रीय योग दिवस से न सिर्फ एक दिवस मनाने का प्रारम्‍भ हो रहा है, बल्कि शांति, सद्भावना की ऊंचाइयों को प्राप्‍त करने के लिए, मानव मन को ट्रेनिंग करने के लिए एक नए युग का आरम्‍भ हो रहा है।

प्रधानमंत्री ने कहा कि मैं आज ये कहना चाहूंगा कि सदियों से जिन महापुरुषों ने, जिन ऋषियों ने, जिन मुनियों ने, जिन योग गुरुओं ने, जिन योग शिक्षकों ने, जिन योग अभ्‍यासियों ने सदियों से इस परंपरा को निभाया है, आगे बढ़ाया है, उसमें विकास के बिंदु भी जोड़े हैं, मैं आज पूरे विश्‍व के ऐसे महानुभावों को आदरपूर्वक नमन करता हूं और मैं उनका गौरव करता हूं। आज विश्‍व के पास योग एक ऐसी विद्या है, जिसमें विश्‍व के अनेक भू-भागों के, अनेक रंग वाले लोगों ने, अनेक परंपरा वाले लोगों ने अपना-अपना योगदान दिया है। उन सबका योगदान स्‍वीकार करते हुए अंतर्मन को कैसे विकसित किया जाए, अंतर-ऊर्जा को कैसे ताकतवर बनाया जाए, मनुष्‍य तनावपूर्ण जिंदगी से मुक्‍त हो करके शांति के मार्ग पर जीवन को प्रशस्‍त करे। 

श्री मोदी ने कहा कि ज्‍यादातर लोगों के दिमाग में योग, यानि एक प्रकार से अंग-मर्दन का कार्यक्रम है। मैं समझता हूं यह सबसे बड़ी गलती है। योग, यह अंग-उपांग मर्दन का कार्यक्रम नहीं है। अगर यही होता तो सर्कस में काम करने वाले बच्‍चे योगी कहे जाते। इसलिए सिर्फ शरीर को कितना हम लचीला बनाते हैं, कितना मोड़ देते हैं, वो योग नहीं है।

उन्होंने कहा कि मैं आज संयुक्त राष्ट्र का आभार व्‍यक्‍त करता हूं। दुनिया के 193 देशों का आभार व्‍यक्‍त करता हूं, जिन्‍होंने सर्वसम्‍मति से इस प्रकार के प्रस्‍ताव को पारित किया। मैं उन 177 देशों का आभार व्‍यक्‍त करता हूं जिन्होंने सह-प्रस्तावक बन करके योग के महत्त्व को स्‍वीकारा। आज सूरज की पहली किरण जहां से प्रारंभ हुई और चौबीस घंटे के बाद सूरज की आखिरी किरण जहां पहुंचेगी, सूरज की कोई भी किरण ऐसी नहीं होगी, सूरज की कोई यात्रा ऐसी नहीं होगी कि जिन्हें इन योग अभ्यासियों को आशीर्वाद देने का मौका न मिला हो। पहली बार दुनिया को यह स्‍वीकार करना होगा कि अब ये सूरज योग अभ्यासियों की जगह से कभी ढलता नहीं है। वो पूरा चक्र जहां सूरज जाएगा, वहां-वहां योगाभ्यास मौजूद होगा, ये बात आज दुनिया में पहुंच चुकी है।

पीएम श्री मोदी ने कहा कि मन, बुद्धि, शरीर और आत्‍मा ये सभी संतुलित हो, संकलित हो, सहज हो, इस अवस्था को प्राप्त करने में योग की बहुत बड़ी भूमिका होती है। ये सिर्फ और सिर्फ मानव कल्याण का कार्यक्रम है, तनाव मुक्त विश्व का कार्यक्रम है, प्रेम, शांति, एकता और सद्भावना का कार्यक्रम है, संदेश पहुंचाने का कार्यक्रम है और इसे जीवन में उतारने का कार्यक्रम है।

21 जून, 2015 को दिल्ली में योग पर आयोजित अंतर्राष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस में नरेन्द्र मोदी ने कहा कि, जब मैंने 27 सितंबर, 2014 को संयुक्‍त राष्‍ट्र महासभा में भाषण के दौरान वैश्विक समुदाय से अनुरोध किया था कि अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाया जाए, उसके बाद जो उत्‍साह देखा गया, वैसा मैंने बहुत कम देखा है। देशों के समुदाय ने एकजुट होकर जवाब दिया। 11 दिसंबर, 2014 को 193 सदस्‍यों की संयुक्‍त राष्‍ट्र महासभा ने रिकॉर्ड 177 समर्थक देशों के साथ आम सहमति से इस प्रस्‍ताव का अनुमोदन कर दिया। वैसे संयुक्त राष्ट्र के इतिहास में अपने आपमें एक बहुत बड़ी घटना है।

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि कहा जाता है कि योग जीवन का कायाकल्‍प करता है। दुनिया में कोई इंसान ऐसा नहीं होगा, जो ये न चाहता हो कि वो जीवन को जी-भर जीना चाहता है। हर कोई जीवन को जी-भरके जीना चाहता है और मैं विश्‍वास से कहता हूं कि योग ये जीवन को जी-भरके जीने की जड़ी-बूटी है। योग से पूरा फायदा उठाने के लिए, योग को संपूर्णता से समझने के लिए हमें समझना चाहिए कि योगी कौन है। योगी वह व्‍यक्ति है जो सामंजस्‍य के साथ अपने आपमें, अपने शरीर और अपने आसपास प्रकृति के साथ रहता है। योग का मतलब यही सामंजस्‍य हासिल करना है।
उपनिषदों में योग का मतलब है शरीर के नियंत्रण के जरिए और स्थिर अभ्‍यास के जरिए, भावना पर नियंत्रण के माध्‍यम से मानव चेतना का कायाकल्‍प। शरीर उस सर्वोच्‍च अवस्‍था को साक्षात् बनाने का माध्‍यम है। भगवद् गीता दुनिया का गीत है, जो योगशास्‍त्र को परिभाषित करती है। योगशास्त्र गीता कहती है, “योग कर्मेषु कौशलम्” – अर्थात योग कार्य की उत्‍कृष्‍टता है। समर्पण और निस्‍वार्थ कर्म ही योग है। गीता यह भी कहती है “योगस्य तथा कुरू कर्माणी” – योगी के विवेक से कर्म।

उन्होंने कहा कि योग मानवता के लिए साकल्‍यवादी भविष्‍य का दृष्टिकोण है। यह एक “अवस्था” है, जो दिमाग की अवस्‍था है, एक “व्यवस्था”। कई लोगों को योग एक व्यवस्था के रूप में दिखता है, योग एक अवस्था है, योग कोई संस्था नहीं है। यह आस्था है और जब तक हम उसे उस रूप में नहीं पाते, जब तक हम उसे टुकड़ों में देखते हैं, उसकी पूर्णता को पहचान नहीं पाते।

श्री मोदी ने कहा कि परमात्मा ने जीव मात्र में जहां है, वहां से ऊपर उठने की सहज इच्छाशक्ति दी है और योग उस परिस्थिति को पैदा करने का एक माध्यम है। इसलिए जिसको ज्ञान नहीं है, अनुभव नहीं है, उसको शक होता है कि क्या योग से संभव हो सकता है, लेकिन जिसने बीज से बने वृक्ष की कथा को समझा है, उसके लिए यह संभव है। यदि बीज वटवृक्ष में परिवर्तित हो सकता है तो नर भी नारायण की स्थिति प्राप्त कर सकता है। अहम् ब्रह्मास्मि।

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि योग एक प्रकार से स्व से समस्ती की यात्रा है। योग एक प्रकार से अहम् से वयम् की ओर जाने का मार्ग है और इसलिए जो अहम् से वयम् की ओर जाना चाहता है, जो स्व से समस्ती की ओर जाना चाहता है, जो प्रकृति के साथ जीना सीखना चाहता है, योग उसको उंगली पकड़ के ले जाता है, चलना तो उसको ही पड़ता है।

उन्होंने कहा कि आप कल्पना कर सकते हैं कि श्री अरबिंदो के ज़माने में ये कहीं नज़र नहीं आता था कि योग जन सामान्य का विषय बनेगा। बहुत ही सीमित दायरे में था, लेकिन योगी अरबिंद के पास दृष्टि थी और उन्होंने ये तब देखा था कि वो वक्त आएगा जब योग जनसामान्य के जीवन का हिस्सा बनेगा। वो कुछ परंपराओं में या संतों तक सीमित नहीं रहेगा, वो जन-जन तक पहुंचेगा। आज से करीब 75 साल पहले श्री अरबिंदो ने जो देखा था, वो आज हम अनुभव कर रहे हैं। यही तो ऋषि-मुनियों के सामर्थ्य का परिचायक होता है। ये ताकत आती है योग के समर्पण से , योग की अनुभूति से और योगमय जीवन से।

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि भारत के सामने एक बहुत बड़ी जिम्‍मेवारी है, मैं बहुत जिम्‍मेवारी के साथ कहता हूं, अगर योग को हम कमोडिटी बना देंगे, तो शायद योग का सबसे ज्‍यादा नुकसान हमारे ही हाथों हो जाएगा। योग एक कमोडिटी नहीं है, योग वो ब्रैंड नहीं है, जो बिकाऊ हो सकता है। ये जीवन को जोड़ने वाला, जीवन को प्रकृति से जोड़ने वाला एक ऐसा महान उद्देश्य है, जिसको हमें चरितार्थ करना है।

श्री मोदी ने कहा कि जगत के कल्‍याण के लिए, मानव के कल्‍याण के लिए, मानव के भाग्‍य को बदलने के लिए भारत की भूमि का योगदान है। उसमें संजोने-संवारने का काम भारत के बाहर के लोगों ने भी किया है। उनका भी ऋण स्‍वीकार करना होगा। इसे हम हमारी बपौती बना करके न बैठें। ये विश्‍व का है, मानवजाति का है और मानवजाति के लिए है। ये इस युग का नहीं, अनेक युगों के लिए है और समय के अनुकूल उसमें परिवर्तन भी आने वाला है।

3 जनवरी, 2016 को बैंगलुरू में योग रिसर्च पर एक कार्यक्रम के अवसर पर प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि, योग स्वास्थ्य और बेहतरी की सार्वभौमिक आकांक्षा का प्रतीक है। साथ ही यह मानव और प्रकृति माता के बीच संतुलन और लोगों और देशों के बीच शांति और एकता कायम करने की लोगों की साझा वैश्विक आकांक्षा को भी प्रदर्शित करता है। अपनी अंतरात्मा और बाहरी दुनिया से एकता कायम करने के लिए इसकी मदद ली जा रही है। लोगों के अस्तित्व और उनके माहौल के बीच कड़ी जोड़ने में इसका सहारा लिया जा रहा है।

श्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि कुछ अध्ययनों का आकलन है कि गैर संक्रामक बीमारियों और खराब मानसिक स्वास्थ्य की वजह से 2030 तक भारत को 4.58 ट्रिलियन डॉलर का नुकसान उठाना पड़ेगा। इसलिए जैसे-जैसे हम शारीरिक और भौतिक जीवन में आगे तरक्की करते जाएंगे, हमें अपने अस्तित्व की मनोवैज्ञानिक स्थिति से जुड़े सवालों को भी सुलझाना होगा। यही वह स्थिति है, जहां योग सर्वोपरि हो जाता है। जैसे-जैसे हमने इसकी सीमाओं और साइड इफेक्टस को समझना शुरू किया है और जैसे-जैसे आधुनिक दवाओं की लागत बढ़ रही है, वैसे-वैसे हमने पारंपरिक चिकित्सा पद्धति की ओर ध्यान देना शुरू किया है। यह सिर्फ भारत में ही नहीं पूरी दुनिया में हो रहा है। पूरी दुनिया में लोग पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों को बड़े उत्साह से अपना रहे हैं।

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि यह विभिन्न संस्कृतियों के लोगों की अपनी जिंदगी की परिचित सीमा से बाहर आने और व्यापक हित में एकत्रित होने की क्षमता को भी दिखाता है। एकता की यही भावना बताती है कि योग एक कालातीत विज्ञान है। योग की पहचान पूरी दुनिया में छाने लगी है। सभी संस्कृतियों और भू-भागों के लोग अपने जीवन को दोबारा परिभाषित करने में इसे अपना रहे हैं, इसकी मदद ले रहे हैं।

21 जून, 2016 को द्वितीय अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर चंडीगढ़ में आधिकारिक कार्यक्रम के अवसर पर उन्होंने कहा कि, कभी-कभी लोगों को लगता है कि योग से क्या मिलेगा? ये पूरा विज्ञान लेने-पाने के लिए है ही नहीं। योग, क्या मिलेगा, इसके लिए नहीं है। योग, मैं क्या छोड़ पाऊंगा, मैं क्या दे पाऊंगा, मैं किन-किन चीजों से मुक्त हो पाऊंगा, ये मुक्ति का मार्ग है, पाने का मार्ग नहीं है।

उन्होंने कहा कि योग परलोक के लिए नहीं है। मृत्यु के बाद क्या मिलेगा, इसका रास्ता योग नहीं दिखाता है और इसलिए ये धार्मिक कर्मकांड नहीं है। योग इहलोक में तुम्हारे मन को शांति कैसे मिलेगी, शरीर को स्वस्थता कैसे मिलेगी, समाज में एकसूत्रता कैसे बनी रहेगी, उसकी ताकत देता है। मन अस्थिर होता है, शरीर स्थिर होता है। ये योग है जो हमें सिखाता है, मन को स्थिर कैसे करना और शरीर को गतिवान कैसे बनाना। ये Balance हो जाता है, तो जीवन में ईश्वर प्रदत्त, ये जो हमारा शरीर है, वो हमारे सभी संकल्पों की पूर्ति के लिए उत्तम माध्यम बन सकता है।

उन्होंने कहा कि योग आस्तिक के लिए भी है, योग नास्तिक के लिए भी है। जीरो बजट से दुनिया में कहीं पर भी हेल्थ Insurance नहीं होता है, लेकिन योग ऐसा है जो जीरो बजट से हेल्थ Assurance देता है। योग बीमारी से ही मुक्ति का मार्ग नहीं है। ये सिर्फ फिटनेस की नहीं, ये वेलनेस की गारंटी है। अगर जीवन को एक हॉलिस्टिक डेवलपमेंट की ओर ले जाना है, ये उसका उत्तम मार्ग है। भारत जैसे गरीब देश, दुनिया के गरीब देश, विकासशील देश, उनके हेल्थ के बजट में अगर प्रिवेंटिव हेल्थकेअर पर बल दिया जाए, तो काफी बचाया भी जा सकता है और सही काम में उपयोग भी लाया जा सकता है। इसलिए प्रिवेंटिव हेल्थकेअर के जितने उपाय हैं, उसमें योग एक सरल, सस्ता और हर किसी को उपलब्ध मार्ग है।

पीएम मोदी ने कहा कि योग को अमीर-गरीब का भेद नहीं है। विद्वान-अनपढ़ का भेद नहीं है। गरीब से गरीब व्यक्ति भी, अमीर से अमीर व्यक्ति भी योग आसानी से कर सकता है। किसी चीज की जरूरत नहीं है। एक हाथ फैलाने के लिए कहीं जगह मिल जाए, वो अपना योग कर सकता है और अपने तन-मन को तंदुरुस्त रख सकता है। जिस प्रकार से आज मोबाइल फोन आपके जीवन का हिस्सा बन गया, उतनी ही सहजता से आप योग को अपने जीवन का हिस्सा बना सकते हैं। कोई कठिन काम नहीं है, उसको सरलता की ओर ले जाने की जरूरत है।

प्रधानमंत्री ने कहा कि यूनाइटेड नेशन्स के द्वारा कई ऐसे अंतर्राष्ट्रीय दिवस मनाए जाते हैं, लेकिन शायद ही यूनाइटेड नेशन्स द्वारा मनाए गए इतने सारे दिवसों में कोई दिवस जन आंदोलन बन गया हो। विश्व के हर कोने में उसको समर्थन और स्वीकृति प्राप्त होती हो, शायद अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस की बराबरी कोई और दिवस नहीं कर पा रहा है। Health को लेकर के भी अनेक दिन, दिवस UN के द्वारा मनाए जाते हैं, लेकिन यही है जिसका सीधा संबंध Health के साथ तो है, शारीरिक-मानसिक-सामाजिक तंदुरुस्ती के साथ भी संबंध है। योग आज इतने बड़े पैमाने पर जन सामान्य का आंदोलन बना है और मैं समझता हूं कि ये हमारे पूर्वजों ने, हमें जो विरासत दी है, इस विरासत की ताकत क्या है? इस विरासत की पहचान क्या है? इसका परिचय करवाते हैं।

17 जनवरी, 2017 को दिल्ली में द्वितीय रायसीना डायलॉग कार्यक्रम में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि, योग और आयुर्वेद सहित भारत की सांस्कृतिक विरासत के लाभ को वैश्विक भलाई के लिए प्रसार करना है। इसलिए बदलाव केवल घरेलू क्षेत्रों पर केंद्रित नहीं है, बल्कि यह हमारे वैश्विक एजेंडे में शामिल है।

24 फरवरी, 2017 को कोयम्बटूर में “आदियोगी शिव” की 112 फीट ऊंची प्रतिमा के उद्घाटन के अवसर पर पीएम मोदी ने कहा कि, योग रोग मुक्ति के साथ-साथ भोग मुक्ति भी है। तनाव का बोझ बहुत भारी होता है और योग तनाव से मुक्ति पाने का सबसे कारगर हथियार है। इस बात के पर्याप्त साक्ष्य हैं कि योग तनाव और पुरानी स्थितियों से बाहर आने में मददगार होता है। यह शरीर मन का मंदिर है, तो योग इस सुंदर मंदिर का निर्माण करता है। यही कारण है कि मैं योग को स्वास्थ्य बीमा का पासपोर्ट कहता हूं। बीमारियों का इलाज होने से ज्यादा यह कल्याण का साधन है। योग को केवल एक ऐसे अभ्यास के रूप में देखना अनुचित होगा, जो शरीर को फिट रखता है। योग शारीरिक अभ्यास से कहीं ज्यादा आगे है। आप कई लोगों को फैशनेबल अंदाज में अपने शरीर को मोड़ते और घुमाते हुए देखते हैं। लेकिन वे सभी योगी नहीं होते।

उन्होंने कहा कि योग के माध्यम से, हम एक नए युग का सृजन कर सकते हैं – एकजुटता और सौहार्द का युग। योग के अभ्यास से एकता की भावना पैदा होती है – मन, शरीर और बुद्धि की एकता। हमारे परिवारों की एकता, उस समाज की एकता, जिसमें हम रहते हैं, साथी मानवों के साथ, सभी पक्षियों, जानवरों और पेड़ों के साथ, उन सभी के साथ जिनके साथ हम इस खूबसूरत ग्रह में रहते हैं। यही योग है। योग में एक नए युग का सूत्रपात करने की संभावना है- शांति, करुणा, भाईचारे और मानव जाति के सर्वांगीण विकास का युग। आज समूचा विश्व शांति चाहता है, यह शांति न सिर्फ युद्ध और संघर्ष की है, बल्कि मन की भी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा भी है कि, ‘मैं’ से ‘हम’ की यात्रा ही योग है।

-हरीश चन्द्र बर्णवाल

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