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पश्चिम बंगाल में बीजेपी के नौजवान दलित कार्यकर्ता की निर्मम हत्या, ममता और मीडिया दोनों खामोश

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पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के नेतृत्व में निर्मम राज का एक और बड़ा उदाहरण सामने आया है। पुरुलिया में बीजेपी के एक दलित नौजवान कार्यकर्ता त्रिलोचन महतो की ना सिर्फ हत्या की गई, बल्कि उसकी लाश को पेड़ से लटकाकर उसके पीछे यह लिखा गया कि बीजेपी के लिए काम करने का यही हश्र होगा।

ममता राज में चरम पर नफरत की राजनीति 

पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के शासन में नफरत की राजनीति का यह एक ऐसा नमूना है जिससे इंसानियत की रूह भी कांप जाए। लेकिन दिल दहलाने वाली इस घटना पर ना सिर्फ मुख्यमंत्री ममता बनर्जी बल्कि विपक्ष और ‘सेक्युलर’ पत्रकारों और बुद्धिजीवियों का पूरा खेमा चुप है। जरा सोचिए अगर बीजेपी की जगह विपक्ष की किसी पार्टी के कार्यकर्ता के साथ अगर ऐसा हुआ होता तो इन सबने अब तक कितना हंगामा न खड़ा कर दिया होता।  

इस जघन्य हत्याकांड के लिए मीडिया में जगह नहीं

हैरानी की बात है कि पुरुलिया के इस जघन्य कांड के लिए मीडिया में कोई जगह नहीं। न्यूज चैनल ABP के एक पत्रकार ने इस घटनाक्रम पर ट्वीट तो किया है, लेकिन चैनल इस पर खामोश है। अगर ऐसी ही घटना का शिकार बीजेपी शासित राज्य में विपक्षी पार्टी से जुड़ा कार्यकर्ता हुआ होता तो चैनल पर अब तक कई तरह की बहस हो चुकी होती। लोगों ने ट्वीट पर जिस तरह की राय जाहिर की है उससे यह साबित हो जाता है कि विपक्षी पार्टियां हों या मीडिया का एक खेमा सब पार्टी देखकर ही बात करते हैं या खबर दिखाते हैं।   

ममता और वाम दलों के शासन का खूनी इतिहास
बंगाल में राजनीतिक झड़पों का एक लंबा और रक्तरंजित इतिहास रहा है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2016 में बंगाल में राजनीतिक कारणों से झड़प की 91 घटनाएं हुईं और 205 लोग हिंसा के शिकार हुए। 2015 में राजनीतिक झड़प की कुल 131 घटनाएं दर्ज की गई थीं और 184 लोग इसके शिकार हुए थे। वर्ष 2013 में बंगाल में राजनीतिक कारणों से 26 लोगों की हत्या हुई थी, जो किसी भी राज्य से अधिक थी। 1997 में बुद्धदेब भट्टाचार्य ने विधानसभा मे जानकारी दी थी कि वर्ष 1977 से 1996 तक पश्चिम बंगाल में 28,000 लोग राजनीतिक हिंसा में मारे गये थे। 

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