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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का 2.0 विपक्ष

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देश की 17वीं लोकसभा में 353 सदस्यों की प्रचंड शक्ति के साथ जब नरेन्द्र दामोदरदास मोदी 30 मई को प्रधानमंत्री पद की दोबारा शपथ ले रहे थे, तो एक प्रश्न भी खड़ा हो रहा था कि आजादी के बाद पहली बार प्रचंड बहुमत से दोबारा बनने वाली गैर कांग्रेसी सरकार का संसद में विपक्ष कैसा होगा? उस विपक्ष का लोकसभा में स्वरूप कैसा होगा जिसका महागठबंधन भी लोकसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी के व्यक्तित्व के सामने धराशायी हो गया।

विपक्ष की दिखावटी एकता का अंत-  समय की धारा बड़ी ही तेज है। अभी चुनाव जीते हुए उम्मीदवार शपथ लेकर सांसद बने भी नहीं थे कि महागठबंधन के सभी दलों ने अपने रंग दिखाने शुरू कर दिए। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के बीच हुआ ऐतिहासिक प्रयोग पूरी तरह से ध्वस्त हो गया, मायावती ने बाकायदा प्रेस वार्ता करके ऐलान किया कि चुनावों में बसपा की हार का सबसे बड़ा कारण समाजवादी पार्टी से गठबंधन करना रहा है। उनका यह भी कहना था कि अखिलेश यादव अपने दल का मत बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवारों को नहीं दिलवा सके। मायावती के आरोपों को नकारते हुए अखिलेश यादव ने कहा कि मायावती गलत बयानबाजी कर रही हैं, समाजवादी पार्टी का पूरा का पूरा मत बसपा को मिला है यदि ऐसा नहीं होता तो बहनजी के दस उम्मीदवार कैसे जीत गए? अखिलेश ने मायावती पर आरोप लगाया कि समाजवादी पार्टी के उम्मीदवारों को बसपा का मत नहीं मिला। इस तरह प्रधानमंत्री मोदी को दोबारा प्रधानमंत्री न बनने देने के संकल्प के साथ एकजुट हुए सपा, बसपा और आरएलडी का महागठबंधन अलग-अलग हो कर,छिन्न भिन्न हो गया।

दूसरी तरफ महागठबंधन के सुर में सुर मिलाने वाली अन्य पार्टियों में प्रमुख पार्टी कांग्रेस ने भी ऐलान कर दिया कि अब वह अकेले अपने दम पर बिहार में अपना वजूद खड़ा करेगी। अब कांग्रेस मान रही है कि जब से बिहार में वह लालू प्रसाद यादव की राष्ट्रीय जनता दल के साथ आई है, तब से राज्य में पार्टी की स्थिति खराब ही होती चली आ रही है।

लोकसभा में विपक्ष बंटा- प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के हाथों मिली करारी हार के बाद मुख्य विपक्षी और सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस अब किसी भी राजनीतिक दल के साथ खड़े होने के मूड में नहीं है। कांग्रेस अब वह काम करने के लिए अपने को तैयार कर रही है, जिसे उसे 2004 से शुरु कर देना चाहिए था, पार्टी हर प्रदेश में अपने संगठन को मजबूत करने का काम करना चाहती है। कांग्रेस की “एकला चलो” की नीति से लोकसभा में भी विपक्ष की एकजुटता बिलकुल ही नहीं होगी। ममता बनर्जी की तृणमूल और मायावती की बसपा के साथ कांग्रेस ने चुनावों के दौरान ही दूरी बना ली थी। उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में आगामी विधानसभा के चुनावों को देखते हुए इन दलों के बीच लोकसभा में खींचतान बनी रहेगी। विपक्ष के नेता का पद इस बार भी कांग्रेस को नहीं मिलने वाला है, क्योंकि आवश्यक 55 सांसदों की संख्या से कम कांग्रेस के पास सांसदों का संख्या बल है। कांग्रेस के सांसदों की संख्या 52 है, लेकिन कांग्रेस को पिछली बार की तरह ही प्रमुख विपक्षी पार्टी का दर्जा मिलेगा।

कांग्रेस और राहुल गांधी का वही नरेटिव होगा-हार के बाद भी कांग्रेस के मूल डीएनए में परिवर्तन आने का कोई संकेत नहीं मिल रहा है। कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष ने 23 मई को चुनावों के परिणाम आने के बाद इस्तीफा देने का नाटक खेला, लेकिन अभी तक पूरी तरह से पर्दा नहीं उठा है। कुछ ऐसा ही 2004 के लोकसभा के चुनाव के परिणाम आने के बाद हुआ था। चुनाव में सोनिया गांधी का विदेशी मूल का होना बड़ा मुद्दा बना था, लेकिन चुनाव में जीत मिलने के बाद सोनिया गांधी ने इस मुद्दे को सदा-सदा के लिए दफन कर देने के लिए अपनी अंतरात्मा की आवाज पर मनमोहन सिंह को देश का प्रधानमंत्री बना दिया। लेकिन नेशनल एडवाजरी काउंसिल के जरिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और देश के ऊपर दस साल तक हुकूमत की। ठीक ऐसा ही नाटक राहुल इस बार कर रहे हैं। चुनाव में उनको लेकर वंशवाद का मुद्दा हावी रहा, इसलिए राहुल गांधी अपनी अंतरात्मा की आवाज पर किसी अन्य को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाना चाहते हैं। किसी अन्य के अध्यक्ष बनने के बावजूद भी गांधी परिवार का ही कब्जा कांग्रेस पार्टी रहेगा।

विपक्ष की नकारात्मक भूमिका-  जीत के बाद पहली बार वायनाड पहुंचने पर राहुल गांधी ने वैसा ही आरोप प्रधानमंत्री मोदी पर लगाया जैसा वह चुनावों के दौरान लगाते रहे हैं। उनका कहना है कि प्रधानमंत्री मोदी नकारात्मक और नफरत के प्रतीक हैं, जबकि मैं प्यार की राजनीति करता हूं। राहुल गांधी की ही तरह ममता बनर्जी, मायावती और अखिलेश यादव ने भी प्रधानमंत्री मोदी पर हमले करने शुरू कर दिए हैं। विपक्ष के नेताओं के बयानों से बिलकुल भी ऐसा नहीं लगता है कि विपक्ष किसी भी तरह की देश में कोई नई राजनीति करना चाहता है।

2019 के चुनावों में नकारात्मक राजनीति की दुर्गति देखने के बावजूद भी कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल उसी नाकारत्मक राजनीति की ओर एक बार फिर बढ़ रहे हैं क्योंकि इन दलों के पास न कोई नया नेता है न कोई नई सोच है, जो देश के लिए सही मायनों में विकल्प के रूप में सामने आ सके। सभी दल सिर्फ और सिर्फ एक बार फिर सत्ता के लिए संघर्ष करते हुए नजर आने वाले हैं।

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