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गोकशी रोकने के नाम पर फासीवादी रास्ते पर विपक्ष

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कांग्रेस, सीपीएम, डीएमके और तृणमूल कांग्रेस अचानक क्यों गाय का मुद्दा लेकर उठ खड़ी हुई हैं? गाय को लेकर सियासत कौन कर रहा है? ये सियासत किसलिए है, किसके खिलाफ है?- ये सारे सवाल अचानक जिन्दा हो गये हैं।

राजनीतिक प्रदर्शन है सार्वजनिक तौर पर बछड़े को हलाल करना?
गोकशी पर प्रतिबंध को लेकर केंद्र सरकार के कानून को नहीं मानने का एलान केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने किया था। उसके बाद से वहां प्रदर्शन का सिलसिला शुरू हो गया। और, ये सिलसिला ऐसा शुरू हुआ कि सार्वजनिक तौर पर बछड़े को हलाल करने के घिनौने कृत्य के रूप में दिखा। खुद कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी को ट्वीट कर इसका विरोध करना पड़ा और पार्टी को अपने कार्यकर्ताओं पर कार्रवाई करनी पड़ी। ऐसा इसलिए कि देश पर 60 साल से अधिक समय तक शासन कर चुकी कांग्रेस को केवल अल्पसंख्यक का वोट नहीं, सबका वोट चाहिए। फायदे से ज्यादा नुकसान के डर ने कांग्रेस को बैकफुट पर ला दिया।

‘मोदी विरोध’ के नाम पर एकता भी फूहड़!
कांग्रेस बैकफुट पर जरूर गयी, लेकिन जो राजनीति शुरू हुई है, उससे वो पीछे हटती नहीं दिख रही है। ये राजनीति है मोदी विरोध के नाम पर कथित विपक्षी एकता की। तृणमूल और वाम दल जैसे परस्पर विरोधी दल इकट्ठा होने की कोशिश में हैं जो दिखावा ज्यादा है। तमिलनाडु में डीएमके प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहा है, तो प. बंगाल में ममता बनर्जी ने इसका ठेका ले लिया है। वामपंथी हर जगह इन सबके साथ हैं। अब, जबकि ममता बनर्जी ने खुले तौर पर गोवध रोकने के कानून के विरोध की घोषणा कर दी है, केरल का दृश्य बंगाल में भी देखने को मिल सकता है।

आस्था का कत्ल है सार्वजनिक गोकशी
खुलेआम गाय को हलाल करने वाले लोग अपने राजनीतिक आकाओं को खुश करने की होड़ में ऐसी गलती कर रहे हैं जिसके लिए जनता शायद ही इन लोगों को माफ कर सके। जिस गोकशी को रोका जा रहा है वह तो बूचड़खाने में होता आया है लेकिन विरोध के नाम पर सार्वजनिक तौर पर जो गोकशी हो रही है, वह इंसानियत का बूचड़खाना है। गाय के साथ जुड़ी आस्था का कत्ल है सार्वजनिक तौर पर गोकशी। ये बात जितनी जल्दी समझ ली जाएगी, देश के सांप्रदायिक सौहार्द को उतना ही बेहतर तरीके से कायम रखा जा सकेगा।

गाय नहीं हलाल हुई है इंसानियत
ये कैसी राजनीति है कि मोदी विरोध के लिए गाय काटी जा रही है? गोवध देश के कई हिस्सों में पहले से लागू है। जिन इलाकों में यह पहली बार हो रहा है, उस पर अगर विरोध है तो उसके निश्चित तरीके हैं। विरोध का कोई ऐसा तरीका मत निकालिए जो नफरत का माहौल पैदा करे। एक बार नफरत का माहौल बना, तो एक गाय के बदले न जाने कितने इंसानों की जान चली जाएगी। हलाल की एक घटना न जाने कितनी घटनाओं को जन्म दे दे। ऐसा हुआ, तो क्या सियासत बची रह पाएगी?

क्रूर फासीवादी रास्ते पर चल पड़ा है विपक्ष
राजनीति समर्थन और विरोध का नाम नहीं है। राजनीति समाज और देश को एक रखते हुए मतभेदों को कम करने और सौहार्द के साथ जीने का स्वभाव बनाती है। राजनीति देश का निर्माण करती है। गोकशी पर रोक के बहाने जिस राजनीतिक पथ पर विपक्ष चल पड़ा है वह फासीवाद से भी क्रूर रास्ता है।

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