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प्रधानमंत्री मोदी की प्रेरणा से आज खेलों में गरीब परिवारों के बच्चे भी देश के लिए जीत रहे हैं पदक

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आज, भारत का हर नागरिक तिरंगे को हर क्षेत्र में फहराने का जज्बा रखता है, और इस भावना के लिए सब कुछ कर गुजरने की प्रेरणा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व से मिलती है। 2014 में सत्ता संभालने के बाद से प्रधानमंत्री मोदी ने देश में सकारात्मक उर्जा और आत्मविश्वास का संचार किया है। इसका परिणाम है कि देश में हर क्षेत्र, हर तबके के लोग देश के लिए अपना योगदान देना चाहते हैं।

प्रेरणा भरे इस माहौल में गरीब परिवार के बच्चे भी अंतरराष्ट्रीय खेल स्पर्धाओं में देश का गौरव बढ़ा रहे हैं। आइए, कुछ ऐसे खिलाडियों के बारे में जानते हैं, जो गरीब परिवार से आते हैं लेकिन देश के बदले माहौल के कारण उन्होंने ऐसा करिश्मा कर दिखाया है, जो भारत के बढ़ते आत्मविश्वास और हौसले की कहानी बयां करता है-

स्वप्ना बर्मन
गरीबी से जूझते हुए भी हार न मानने वाली स्वप्ना बर्मन ने 2018 के एशियाई खेलों में हेप्टाथलन स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीत कर देश का नाम किया। पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी के बेहद गरीब रिक्शाचालक परिवार से आने वाली स्वप्ना ने जता दिया कि प्रतिभा और हौसले के आगे मुसीबतें घुटने टेक देतीं हैं।

विसमाया वेलुवाकोरोथ
4×100 की रिले टीम की सदस्य के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हुए देश को स्वर्ण पदक दिलाया। विसमाया वेलुवाकोरोथ दिहाड़ी पर काम करने वाले मजदूर की बेटी हैं।

हिमा दास
हिमा दास ने फिनलैंड के टेम्पेयर शहर में भारत के लिए इतिहास रच दिया।  हिमा ने आईएएएफ विश्व अंडर-20 एथलेटिक्स चैंपियनशिप की 400 मीटर स्प्रिंट स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीता। हिमा असम में धान की खेती करने वाले एक साधारण किसान की बेटी हैं। हिमा के कोच निपोन दो साल पहले उन्हें रेसिंग ट्रैक पर लेकर आये। इससे पहले वह लड़कों के साथ फुटबॉल खेला करती थीं और मैदान पर अपनी फुर्ती, दमखम और स्किल से उनको छका देती थीं। हिमा के कोच निपोन ने उन्हें पहली बार फुटबॉल के मैदान पर लड़कों को छकाते हुए देखा था। इसके बाद वह हिमा के परिवार वालों से मिले और उनसे अपनी बेटी को एथलेटिक्स में भेजने के लिए कहा। हिमा का परिवार उनकी कोचिंग का खर्चा उठाने में असमर्थ था, तो करियर के शुरुआत में उनके कोच निपोन उनकी काफी मदद की।

दुती चंद
ओड़िशा की रहने वाली दुती चंद ने 2018 के एशियाई खेलों में 100 मीटर की दौड़ में रजत पदक जीता। दुती चंद ने बताया कि उनके परिवार में छह बहनों को मिलाकर नौ सदस्‍य हैं। पिता कपड़े बेचने का काम करते हैं। उनके ऊपर पूरे परिवार का पेट पालने की जिम्‍मेदारी है। ऐसी स्थितियों के बावजूद परिवार के प्रोत्‍साहन से वे एथलीट बनीं।

नवजोत कौर
नवजोत कौर ने सीनियर एशियन कुश्ती चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीतकर इतिहास रच दिया है। ऐसा करने वाली वह पहली महिला पहलवान हैं। उन्होंने 65 किलोग्राम वर्ग में जापान की मिया इमाई को फाइनल में 9-1 से हराकर यह खिताब अपने नाम किया। उनके पिता पंजाब के तरन तारन में किसान हैं।

प्रवीण चित्रावल
2018 में आयोजित यूथ ओलंपिक की एथलेटिक्स स्पर्धा में प्रवीण चित्रावल को ट्रिपल जंप में कांस्य पदक मिला। 17 वर्षीय प्रवीण चित्रावल,तमिलनाडु के तंजावुर जिले के दिहाड़ी खेतीहर मजदूर के बेटे हैं।

सौरभ चौधरी
18 वें एशियाई खेलों में 10 मीटर एयर पिस्टल शूटिंग में स्वर्ण पदक जीता। सौरभ की उम्र मात्र 16 साल की है और वह मेरठ के एक किसान का बेटा है।

धरुन अय्यासामी
तमिलनाडु के 400 मीटर की बाधा दौड़ में सिल्‍वर मेडल जीतने वाले धरुन अय्यासामी की कहानी से हर कोई भावुक हो उठता है। जब धरुन आठ साल के थे तब उनके पिता की मृत्यु हो गई और उनकी मां ने अकेले उन्हें पाला। उनकी मां एक स्कूल में मात्र 14,000 रुपये की नौकरी करती हैं। 

प्रधानमंत्री मोदी ने हर खिलाड़ी का हौसला बढ़ाया
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सकारात्मक उर्जा और देश के लिए जीने की इच्छा को शक्ति देने के लिए हर संभव प्रयास किया है। प्रधानमंत्री पद की तमाम व्यस्तताओं के बीच भी वह हर खिलाड़ी से मिलना अपना कर्त्वय मानते हैं। ओलंपिक में जाने वाला भारतीय दल हो, एशियाड खेलों में या अन्य किसी अंतर्राष्ट्रीय स्पर्धा में भाग लेने वाले खिलाड़ियों के दल से वह जाने के पहले और वापस लौटने के बाद अवश्य मिलते हैं। वह व्यक्तिगत स्पर्धाओं में जीत हासिल करने वाले खिलाडियों का हर दम हौसला बढ़ाते हैं। देश में इससे पहले किसी भी प्रधानमंत्री ने युवाओं में खेलों के प्रति रुचि पैदा करने के लिए सतत तरीके से इतना काम नहीं किया है, जितना प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी करते हैं।

देश के लिए जीने की सामूहिक चेतना विकसित करने के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने हर स्तर पर कई प्रयास किये हैं। इन प्रयासों के बल पर ही देश में हर क्षेत्र का युवा अपनी उर्जा को देश के लिए खपा देने की चाह रखता है। चार साल पहले, 2014 में देश में जिस नकारात्मकता और अविश्वास का माहौल था, आज वह सकारात्मकता और आत्मविश्वास में परिवर्तित हो चुका है।

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