Home चुनावी हलचल TOI Exclusive Interview: उग्र राष्ट्रवाद देशभक्ति को गाली देने के लिए गढ़ा...

TOI Exclusive Interview: उग्र राष्ट्रवाद देशभक्ति को गाली देने के लिए गढ़ा गया- प्रधानमंत्री मोदी

263
SHARE

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने टाइम्स ऑफ इंडिया के साथ एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में कहा कि उग्र राष्ट्रवाद देशभक्ति को गाली देने के लिए गढ़ा गया। प्रधानमंत्री मोदी ने बीजेपी के चुनाव प्रचार में राष्ट्रवाद पर जोर देने पर कहा कि देशभक्ति कोई बीमारी नहीं है। सेना के राजनीतिकरण के आरोपों पर उन्होंने कहा कि सेना के विद्रोह की फर्जी कहानी और 71 के युद्ध में जीत का श्रेय जब इंदिरा को दिया गया था तभी सेना का राजनीतिकरण हो गया था। प्रधानमंत्री मोदी ने मौजूदा लोकसभा चुनाव के मुद्दे, अपनी सरकार के कामकाज, अर्थव्यवस्था की स्थिति, भविष्य के भारत को लेकर उनके विजन और विपक्ष के आरोपों पर जवाब देने समेत विभिन्न मुद्दों पर टाइम्स ग्रुप के राजेश कालरा, दिवाकर और राजीव देशपांडे से बात की।

पढ़िए पूरा इंटरव्यू-

चुनाव में बीजेपी की संभावनाओं को लेकर आपका आकलन क्या है? इस बार आप सत्ता में हैं न कि विपक्ष में, तो इस चुनौती को कैसे देखते हैं?

मुझे विश्वास है कि जनता एक बार फिर भारी जनादेश और पहले से ज्यादा सीटें देकर आशीर्वाद देगी। चुनाव के बाद पहले से भी मजबूत सरकार बनेगी। जिन-जिन राज्यों का दौरा मैंने किया है वहां अभूतपूर्व समर्थन मिलता दिख रहा है। पहले फेज के चुनाव और लोगों की प्रतिक्रिया ने मेरे विश्वास को और मजबूत किया है। 2014 का चुनाव भारतीय जनता पार्टी एनडीए के अपने सहयोगियों के साथ मिलकर लड़ी थी, जबकि 2019 का चुनाव भारतीय जनता लड़ रही है।

आपने कहा कि इस बार मैं विपक्ष में नहीं हूं। यह सत्य नहीं है। मैं विपक्ष में हूं और उन चीजों के खिलाफ लड़ रहा हूं, जिनसे मेरे भारत को नुकसान पहुंच सकता है। भ्रष्टाचार हमारे देश को अंदर से खोखला कर रहा है और मैं इसे चुनौती दे रहा हूं। परिवारवाद की राजनीति हमारे लोकतंत्र को कमजोर करती है और मैं इसके विरोध में लड़ रहा हूं। आंतकवाद देश के अस्तित्व के लिए खतरा है और मैं इसके खिलाफ लड़ रहा हूं। चलता है की प्रवृत्ति ने काफी समय तक हमारे देश की प्रगति को रोककर रखा और मैं इसके विपक्ष में लड़ रहा हूं। नकारात्मक शक्तियां भारत की आकांक्षाओं के रास्ते में बाधक हैं और मैं उन्हें चुनौती दे रहा हूं।

भारत की जनता भी इन चीजों के खिलाफ है। वे भी हमारे साथ कांग्रेस जैसी पार्टियों से लड़ रही हैं, जो भारत को भ्रष्टाचार और लूट के दौर में ले जाना चाहती हैं। कांग्रेस के खिलाफ ऐसा माहौल है कि वह खुद बता रही है कि वह अब तक के सबसे कम सीटों पर लोकसभा में चुनाव लड़ रही है। जनता भलीभांति देख रही है कि कांग्रेस के पास न तो नेता है, न नीयत है और न ही नंबर। जिन्होंने भी कांग्रेस के चुनाव अभियान और घोषणापत्र पर गौर किया है वे आसानी से समझ सकते हैं कि वह जीतने के लिए चुनाव नहीं लड़ रही है। उनके पास देश के लिए कोई विजन नहीं है। वे जो कर रहे हैं ,वह ऐसा ही है जैसे दूध में नींबू की बूंदें डालना और इसका परिणाम हमेशा विनाशकारी ही होगा।

कांग्रेस के अवसरवादी सहयोगियों के बारे में जितना कम बोला जाए उतना अच्छा है। प्रेस कॉन्फ्रेंस में वे साथ हैं, लेकिन चुनाव में नहीं। जनता इन पार्टियों को देख रही है। 2014 का जनादेश उम्मीद और आकांक्षाओं के लिए था। 2019 विश्वास और इसे तेजी से बढ़ाने के लिए है। 2014 का जनादेश उस समय देश की तत्कालिक जरूरतों के लिए था और 2019 का चुनाव इस बात के लिए कि भारत क्या चाहता है। हम लोगों के रास्ते से बाधाओं को खत्म करके उन्हें सक्षम बना रहे हैं और लोग अब खुद हमें प्रगति पथ तेजी से बढ़ने की ताकत प्रदान कर रहे हैं।

आपने उम्मीद से भरे समाज की बात की है। इस तरही की उम्मीदों को आप कैसे अड्रेस करते हैं?

मैं पिछले पांच सालों से लोगों की उम्मीदों को अड्रेस कर रहा हूं। अगर मैंने पांच सालों में कुछ नहीं किया होता, तो मुझसे किसे उम्मीद होती? किसी को नहीं होती। लोगों ने 10 साल की पिछली सरकार भी देखी थी।

कोई ऐसी चीज जो इस कार्यकाल में नहीं कर पाए और आप दूसरा कार्यकाल मिलने पर हर हाल में करेंगे?

यह जानने के लिए आपको 23 मई तक का इंतजार करना होगा।

पिछले आम चुनाव में उत्तर प्रदेश से आपकी पार्टी के लिए बहुमत का रास्ता निकला था। क्या आपको लगता है कि एसपी-बीएसपी के गठबंधन के बाद बीजेपी की सीटें घटेंगी?

आप पिछले कुछ चुनावों के विश्लेषणों पर गौर कीजिए। एयर कंडीशंड कमरों और स्टूडियो में बैठे पॉलिटकल पंडित यही सवाल उठाते हैं और जब जमीनी हकीकत सामने आती है तो सारे विश्लेषण धरे रह जाते हैं। 2007 में जब मैं गुजरात में चुनाव लड़ रहा था लोगों ने 40-50 नगरपालिका चुनावों के परिणामों का विश्लेषण कर लिया और जो भी दिल्ली से आता कहता कि आपने नगरपालिका चुनावों में अच्छा प्रदर्शन नहीं किया और आप हार रहे हैं। मैं उन्हें समझाता कि गुजरात में निकाय चुनावों में पारंपरिक रूप से निर्दलीयों का काफी अहम रोल रहता है। कांग्रेस अपने सिंबल पर नहीं लड़ती है और केवल हम अपने सिंबल पर लड़ते हैं। इसका यह मतलब कतई नहीं होता कि जहां सिंबल पर हमारे उम्मीदवार नहीं हैं, वहां हमारे निर्दलीय नहीं हैं।

ऐसे ही सवाल 2017 में यूपी विधानसभा चुनाव के समय भी पूछे गए थे। जब काले जैकेट पहने दो लड़के (अखिलेश यादव और राहुल गांधी) साथ आए थे और इसी तरह की हेडलाइन्स लिखी जा रही थीं कि कांग्रेस और एसपी का गठबंधन हो गया है और बीजेपी कहीं की नहीं रहेगी, लेकिन परिणाम क्या रहा? मैं नहीं मानता कि उत्तर प्रदेश के लोग 20 साल पुरानी सारी बातों को भूल जाएंगे और दो महीने के आधार पर अपनी राय बदल लेंगे।

मुझे लगता है कि इस तरह के किसी भी विश्लेषण में जनता की समझ को भी महत्व देना चाहिए। सियासी गणित और महामिलावटी पार्टियों के साथ आने के पीछे के तर्क को लेकर जनता की समझ को कम नहीं आंकना चाहिए। ये महामिलावटी पार्टियां भ्रमित करने की कितनी भी कोशिश कर लें लोग जानते हैं कि वे क्यों साथ आ रहे हैं। एक समय था जब कई पार्टियां साथ आईं और मिलकर चुनाव लड़ीं। वह आपातकाल का दौर था और हमारे लोकतंत्र को बचाना पहली प्राथमिकता थी। इसलिए जब पार्टियां एकजुट हुईं तो वहां एक स्पष्ट मुद्दा था, राष्ट्रहित में उन्हें साथ आना पड़ा और जनता ने आशीर्वाद भी दिया।

उत्तर प्रदेश में डबल इंजन ग्रोथ की कहानी दिख रही है। केंद्र और राज्य की सरकारें मिलकर यूपी के लोगों की जिंदगी बदलने के लिए काम कर रही हैं। इंफ्रास्ट्रक्चर से लेकर निवेश तक, काननू-व्यवस्था से लेकर गंगा पर हुए काम तक, लोग इस बात के साक्षी बन रहे हैं कि कैसे उत्तर प्रदेश में चीजें बदल रही हैं। केंद्र सरकार की योजनाएं मसलन उज्ज्वला, जनधन, विद्युतीकरण, आयुष्मान भारत और प्रधानमंत्री आवास योजना से लोग सशक्त हो रहे हैं। इसकी तुलना में एसपी-बीएसपी महामिलावट के पास अपना ट्रैक रिकॉर्ड दिखाने के लिए क्या है? क्या उन्होंने आगे की कोई रूपरेखा खींची है? नहीं ना, विजन के बजाय वे डिविजन करने में बिजी हैं।

उनके ट्रैक रिकॉर्ड के बारे में हमें बात करने की भी जरूरत नहीं है। वे खुद ही एक-दूसरे के बारे में खुद ही काफी कुछ बोल चुके हैं। एसपी लगातार बीएसपी पर भ्रष्टाचार और लूट मचाने के आरोप लगाती रही है। दूसरी तरफ बीएसपी भी एसपी पर गुंडागर्दी और कुशासन के आरोप लगाती रही है। मैं सिर्फ इतना कहता हूं कि दोनों एक-दूसरे के बारे में सच बोल रही हैं। जब उनके बीच इतनी हिस्ट्री है तो कोई केमिस्ट्री कैसे हो सकती है। उत्तर प्रदेश विजन के लिए वोट करेगा न कि डिविजन के लिए। उत्तर प्रदेश अवसर के लिए वोट करेगा न कि अवसरवाद के लिए। यूपी विकास के लिए वोट करेगा न कि वंशवाद के लिए। उत्तर प्रदेश उन लोगों के लिए वोट करेगा जो देश को आगे रखते हैं न कि उनके लिए जो परिवार को आगे रखते हैं।

आपके चुनाव अभियान का मुख्य नैरेटिव क्या है? आप हमेशा कहते रहे हैं कि विकास और राष्ट्रीय सुरक्षा मुख्य मुद्दा बनकर उभरे हैं, लेकिन आपके आलोचक और विपक्ष का आरोप है कि बीजेपी असली मुद्दों पर फोकस करने के बजाय उग्र राष्ट्रवाद का सहारा ले रही है।

हमारा विजन, मिशन और अजेंडा साफ है- सबके लिए विकास। आप मेरा कोई भी भाषण चेक कर सकते हैं, उसका बड़ा हिस्सा विकास को समर्पित रहता है। यह और बात है कि वह हेडलाइन नहीं बन पाती है। असली मुद्दों की बात करें तो क्या दशकों का आतंकवाद और हमारे सैनिकों की शहादत असली मुद्दे नहीं हैं? जिन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दे परकुछ नहीं किया उन्हें अब जब भारत की सिक्यॉरिटी डॉक्टरिन में रणनीतिक बदलाव हो रहा है तो दिक्कत हो रही है।

सेना का राजनीतिकरण तब हुआ था जब उन्होंने सहानुभूति पाने के लिए सेना के विद्रोह की फर्जी कहानी गढ़ी। सेना का राजनीतिकरण तब हुआ जब 1971 के युद्ध में जीत का श्रेय इंदिरा जी को दिया गया। मुझे आश्चर्य होता है कि उस समय का हमारा निष्पक्ष मीडिया क्यों मौन रह गया। यह देशभक्ति ही थी, जिसने गांधीजी के स्वतंत्रता संग्राम को प्रेरणा दी थी। स्वच्छ भारत अभियान, महिलाओं को धुआं रहित जीवन मुहैया कराने का अभियान, सभी गरीबों के लिए घर और हर घर के लिए बिजली का अभियान देशभक्ति ही है। देशभक्ति कोई बीमारी नहीं है। जैसे अति-धर्मनिरपेक्षता को भारत की संस्कृति और मूल चरित्र पर हमले के लिए गढ़ा गया था वैसे ही उग्र-राष्ट्रवाद देशभक्ति को बदनाम के लिए गढ़ा गया है।

क्या चुनाव में विचारधारा की लड़ाई भी है? देश की परिकल्पना कैसे हो उसके विकल्प का भी चुनाव है?

कांग्रेस कहती है कि यह विचारधारा की लड़ाई है, पर वह अपनी विचारधारा लेकर मैदान में कभी आई नहीं। उन्होंने मैदान हमारे लिए खाली छोड़ रखा है। लोग एक मजबूत राष्ट्र चाहते हैं। वे चाहते हैं कि देश तेजी से प्रगति करे और बीजेपी के पांच साल का ट्रैक रिकॉर्ड सिर्फ और सिर्फ विकास के बारे में है।

पॉलिटकल पंडितों का कहना है कि यह चुनाव मोदी पर जनमत संग्रह है और हमें भी याद नहीं है कि किसी चुनाव में एक आदमी इस तरह से विमर्श में रहा हो जिस तरह से आप हैं। आपकी पार्टी और विपक्ष, दोनों ने आपको चुनाव का केंद्रबिंदु बना दिया है। आप क्या सोचते हैं?

अगर इस चुनाव के केंद्र में कोई है तो वे हैं 130 करोड़ भारतीय। यह चुनाव किसी एक शख्स के बारे में नहीं है बल्कि 130 करोड़ लोगों की उम्मीदों, अपेक्षाओं और आकांक्षाओं के के बारे में है। भारत के लोगों ने 55 सालों का अवरोध देखा है और 55 महीने का आशावाद भी। उन्होंने 55 साल का फैमिली फर्स्ट भी देखा है और 55 महीने का इंडिया फर्स्ट भी देखा है।

अपनी सरकारों की विफलता के बोझ तले दबे होने की वजह से पिछले चुनावों में पार्टियां अपने नेता के नाम पर वोट मांगने में भय खाती थीं। इसलिए वे ट्रैक बदलकर चुनाव को किसी मुद्दे में उलझाने की कोशिश करती रही हैं। मीडिया के लोग जानते हैं कि 2014 के चुनाव में यूपीए ने तत्कालीन पीएम मनमोहन सिंह को प्रचार से दूर रहने की सलाह दी थी। बीजेपी को इस बात का श्रेय मिलना चाहिए कि वह लोगों के बीच मोदी सरकार के 5 साल के ट्रैक रिकॉर्ड के आधार पर गई है और अपने नेता के नाम पर समर्थन मांग रही है। आपको तो खुश होना चाहिए कि एक पार्टी है, जो अपने काम के आधार पर चुनाव लड़ रही है।

विपक्ष के पास मुद्दों पर चुनाव लड़ने की हिम्मत नहीं है। लोगों ने देश को आगे रखकर नीति बनाने के हमारे कामकाज और उसके फायदे को देखा है। यही वजह है कि अपने विदेशी रणनीतिकारों की सलाह पर कांग्रेस झूठ और अपयश का सहारा ले रही है। लेकिन, उनका सारा फोकस मुझ पर हमले करने का है और मोदी बड़ा मुद्दा बन गया है। इस तरह मोदी को मुद्दा बनाने का श्रेय विपक्ष को भी जाता है।

ईज ऑफ डूइंग बिजनस में भारत की रैंकिंग सुधरी है। इन्सॉल्वेंसी ऐंड बैंकरप्सी कोड और जीएसटी जैसे ऐतिहासिक रिफॉर्म्स हुए हैं, लेकिन लालफीताशाही और नियमन से जुड़ीं बाधाएं अभी भी हैं, इसकी वजह से भ्रष्टाचार की गुंजाइश बची हुई है। सिस्टम को पूरी तरह से भ्रष्टाचार मुक्त करने और सिटिज़न फ्रेंडली बनाने के लिए आपकी क्या योजना है?

जैसा कि मैं पहले भी चक चुका हूं कि हमारा लक्ष्य रेड टेप को रेड कारपेट से बदलना है। ईज ऑफ डूइंग बिजनस में भारत की रैंकिंग में जबर्दस्त उछाल इस बात का सबूत है कि हमारा विजन हकीकत बन रहा है। ऑनलाइन ऐप्लिकेशन और सिंगल विंडो क्लियरेंस से बार-बार सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने की जरूरत खत्म हुई है। मंजूरी देने की प्रक्रिया तेज हुई है और इसके लिए दस्तावेजों की संख्या में भी उल्लेखनीय कटौती की गई है।

जब सरकार लोगों के रास्ते में अवरोध पैदा करने के बजाय सक्षम बनाने का काम करती है, तब उन्नति संभव हो पाती है। हमारे अंदर भ्रष्टाचार मुक्त और जनता केंद्रित सरकार देने की ललक है। तेजी से काम हो इसके लिए इसके लिए कई कदम उठाए गए हैं। उदाहरण के लिए रेलवे में फैसला लेने की प्रक्रिया विकेंद्रीकृत हुई है। अब मैनेजर के पास फैसले लेने की अधिक शक्ति है, जबकि पहले उन्हें जीएम या रेलवे बोर्ड से मंजूरी का इंतजार करना पड़ता था।

हमने ईमानादारी और पारदर्शिता को सिस्टम में संस्थागत दर्जा दिया है। खाते में सीधे रकम जाने से बिचौलिये और लीकेज खत्म हो गए हैं और अब फायदा सीधे लाभार्थियों को मिल रहा है। इस तरह करीब देश का एक लाख करोड़ रुपया गलत हाथों में जाने से बचाया गया है। पिछली सरकार के कार्यकाल में कोयला खदानों और स्पेक्ट्रम के आवंटन में व्यापक घोटाले हुए थे, जबकि हमने इनकी नीलामी पारदर्शी तरीके से की और देश का फायदा सुनिश्चित किया। पहले पासपोर्ट पाने में महीनों लग जाते थे, अब यह कुछ दिनों में मिल जाता है। इनकम टैक्स रिफंड भी कुछ दिनों में हो जाता है और सेल्फ ऐटेस्टेशन सामान्य बात हो चुकी है। हमारे कई रिफॉर्म्स के असर अब जमीन पर दिखने लगे हैं। आप ईज ऑफ डूइंग बिजनस की बात कर रहे थे जबकि हम लोगों की ईज ऑफ लीविंग सुनिश्चित करने की दिशा में बढ़ चुके हैं।

सरकार में कार्य संस्कृति को बदलना लंबे समय से बड़ा चैलेंज रहा है। क्या आपको लगता है कि आप अपेक्षित बदलाव लाने में सफल रहे? आगे और क्या किए जाने की जरूरत है?

केवल कार्य संस्कृति में बदलाव ही नहीं, बल्कि कांग्रेसी संस्कृति से पीछा छुड़ाना भी मुख्य चुनौती थी। नई चीजें सीखना आसान है, लेकिन सीखी हुई चीजों को छोड़ना मुश्किल काम है। यहां लोगों को उन चीजों को छोड़ना था, जो कांग्रेस छोड़कर गई थी और 70 सालों से चली आ रही चीजों को छोड़ना मुश्किल काम था। लेकिन मैं विश्वास के साथ कह सकता हूं कि हम अपने सिस्टम से कांग्रेस कल्चर को खत्म करने में सफल रहे हैं। जब मैं कांग्रेस कल्चर कहता हूं तो मेरा आशय पॉलिसी पैरालिसिस, करप्शन, भाई-भतीजावाद, बिचौलिये, प्रॉजेक्ट में देरी आदि से होता है। पिछले पांच सालों के दौरान देश ने देखा है कि कैसे एक सक्षम और भ्रष्टाचारमुक्त सरकार ने काम किया है।

उदाहरण के तौर पर प्रगति सेशन की बात करें। टेक्नॉलजी के जरिए हमने कई लटके हुए प्रॉजेक्ट्स पर काम किया। ये प्रॉजेक्ट्स बस लालफीताशाही के कारण अटके हुए थे। हमने इसे बदला। ए-सैट टेस्ट… हमारे वैज्ञानिकों के पास परीक्षण की काबिलियत थी, लेकिन यूपीए सरकार ने जाहिर कारणों से इसकी इजाजत नहीं दी। MSME सेक्टर के लिए आम आदमी को एक करोड़ तक का लोन बस 59 मिनट में दे दिया जाता है। कांग्रेस कल्चर में टेलीफोन बैंकिंग चलती थी, जिसमें केवल उनके दोस्तों को ही लोन मिलता था। हमने यह कल्चर बदला है। कांग्रेस ने पर्यावरणीय मंजूरी को कैश जुटाने का जरिया बना दिया था। वे 600 दिन तक लगा देते थे, इसके बावजूद चीजें ठीक से नहीं होती थीं। अब किसी प्रॉजेक्ट के लिए पर्यावरणीय मंजूरी 150 से 180 दिन में मिल जाती है। ये महज कुछ उदाहरण हैं। कई चीजें बदली हैं और जब 23 मई के बाद फिर एनडीए सरकार फिर काम संभालेगी तो और सिटीजन फ्रेंडली कदम उठाए जाएंगे।

‘मेक इन इंडिया’ जैसे कुछ कदम उम्मीद के मुताबिक नतीजे नहीं दे रहे हैं। क्या आपको लगता है कि अप्रोच बदलने की जरूरत है? या उन्हें सिर्फ ज्यादा समय और अटेंशन की जरूरत है?

मैं आपके इस अनुमान से सहमत नहीं हूं कि मेक इन इंडिया ने उम्मीद के मुताबिक नतीजे नहीं दिए हैं, जबकि भारत ने दुनियाभर में मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में कई मील के पत्थर स्थापित किए हैं। क्या आपको याद है कि 2014 में देश में कितनी मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स थीं? आपको यह जानकर हैरानी होगी कि भारत, जो मोबाइल फोन्स का सबसे बड़ा मार्केट था, में 2014 में केवल 2 मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स थीं। क्या आपको पता है कि देश में आज कितनी मोबाइल और पार्ट्स मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स हैं? यह संख्या 268 है। यही नहीं, भारत में अब दुनिया की सबसे बड़ी मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग यूनिट है। यह मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग क्रांति सिर्फ 5 साल में हुई है। क्या यह मेक इन इंडिया की सफलता की कहानी नहीं है?

इस साल की शुरुआत में वाराणसी में पहला डीजल से इलेक्ट्रिक कन्वर्टेड लोकोमोटिव बनाया गया। इसे पूरी दुनिया ने हैरानी के साथ देखा। दुनिया के कई मेट्रो प्रॉजेक्ट्स के लिए कोच भारत में बनाए जा रहे हैं। भारत की पहली सेमी-हाई स्पीड ट्रेन ‘वंदे भारत एक्सप्रेस’ मेक इन इंडिया का नतीजा है। क्या हमें इस बात पर गर्व नहीं है कि भारतीय इंजिनियरिंग खुद रेल कन्स्ट्रक्शन सेक्टर में खड़ी हो रही है।

भारत के रक्षा मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को मेक इन इंडिया के तहत गति मिलने से नया जीवन मिला है। हमारे सशस्त्र बल, जिन्हें कई साल तक बुलेटप्रूफ जैकेट के लिए इंतजार कराया जाता था, आखिरकार उन्हें नए जैकेट मिले। वे किसी विदेशी मैन्युफैक्चरर से नहीं आए थे बल्कि हमारी खुद के थे। सशस्त्र बलों के लिए डिफेंस इक्विपमेंट्स के लिए किए गए कुल कॉन्ट्रैक्ट्स में से आधे से ज्यादा भारतीय मैन्युफैक्चरर्स से सेना के लिए साजो-सामान बनाने के लिए किए गए। इनमें हेलिकॉप्टर, रडार, बलिस्टिक हेल्मेट, आर्टिलरी गन और हथियार शामिल हैं। वे असॉल्ट राइफलें जिन्हें दुनिया इस्तेमाल करती है, उन्हें अमेठी में लगाई गई फैक्ट्री में बनाया जाएगा। अब नामदार एके-47 पर मेड इन अमेठी पढ़ सकेंगे। क्या आपको लगता है कि यह संभव होता अगर मेक इन इंडिया काम नहीं कर रहा होता?

दुनिया में अपनी इंजिनियरिंग काबिलियत के लिए विख्यात जापानी कंपनियां अब भारत में कारें बना रही हैं और अपने देश में एक्सपोर्ट कर रही हैं। क्या यह हमारे इंजिनियरिंग कौशल को पहचान मिलने का प्रमाण नहीं है? जब हम 2014 में सत्ता में आए तो भारत में 35 बिलियन डॉलर FDI आ रहा था। पिछले पांच सालों के दौरान यह नंबर डबल हुआ है। क्या यह बिना मेक इन इंडिया की सफलता और ग्लोबल इन्वेस्टर्स द्वारा भारत को अपना पंसदीदा निवेश स्थल चुने बिना संभव था? दुनिया हमारे साथ इन्वेस्ट के लिए लाइन में है। यह इसलिए क्योंकि आज भारत का मतलब अवसर है। यह हमारे मेक इन इंडिया विजन को लेकर वह विश्वास है, जो महज 5 सालों में हासिल किया गया है।

ऐसा कहा जाता है नोटबंदी और जीएसटी ने रोजगार और निवेशक के विश्वास को ठेस पहुंचाई है। (1) क्या आपको लगता है कि जीएसटी को और बेहतर ढंग से लागू कर भ्रम की स्थिति को दूर किया जा सकता था? (2) रोजगार और निवेश को बढ़ाने के लिए सरकार क्या कदम उठा सकती है?

वाजपेयी जी के समय में भी जब अर्थव्यवस्था अच्छी चल रही थी, उस समय भी इस नरैटिव का इस्तेमाल किया गया। नोटबंदी और जीएसटी अर्थव्यवस्था में बड़े स्ट्रक्चरल बदलाव थे। जब इतने बड़े स्तर के बदलाव होते हैं तो ग्रोथ में थोड़ा ऊपर-नीचे होना स्वाभाविक है। क्या आपको जानकारी है कि 1991 के सुधारों के बाद जब मनमोहन सिंह वित्त मंत्री थे, उस समय जीडीपी ग्रोथ रेट 2 प्रतिशत तक आ गया था? जीएसटी में क्रमिक सुधार को देखिए। हमने लोगों और समाज के विभिन्न क्षेत्र के विचारों को ध्यान में रखा और कर ढांचे में उसके मुताबिक सुधार की कोशिश की।

रोजगार और निवेश की बात करें तो, हमारा उद्देश्य भारत को 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाना है। भारत पहले ही एफडीआई को सबसे ज्यादा आकर्षित करने वाले देशों में है। हम इसे और आगे ले जाना चाहते हैं। हमारा टारगेट है कि भारत को वर्ल्ड बैंक की ईज ऑफ डूइंग बिजनस की सूची में टॉप-50 में लाना है। हमारी योजना अगले पांच सालों में इन्फ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में 100 लाख करोड़ रुपये निवेश की है। हम भारतीय अर्थव्यवस्था के मुख्य चालकों के रूप में 22 सेक्टर्स की पहचान कर उन्हें मदद मुहैया कराएंगे, जिससे रोजगार के अवसर पैदा होंगे। इसके साथ ही जॉब क्रिएशन के लिए आंत्रप्रनोरशिप को बढ़ावा दिया जाएगा। एमएसएमई और छोटे दुकानदारों के लिए विशेष उपाय कर प्रोत्साहन दिया जाएगा।

बीजेपी के ऊपर यह आरोप लगाया जाता है कि कुछ कारण जैसे गोरक्षा से असहिष्णुता के माहौल को बढ़ावा मिला और गो-रक्षकों को कानून हाथ में लेने दिया गया। यह भी आरोप लगा है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को और सांस्कृतिक अधिकारों को सीमित करने की कोशिश की गई। इन्हीं मुद्दों पर अवॉर्ड वापसी जैसे अभियान हुए और अब हाल ही में थिअटर और सिनेमा से जुड़े कलाकारों के एक दल ने बीजेपी का विरोध करने की अपील की है। आपके इस पर क्या विचार हैं?

इस मुद्दे पर मेरा बार-बार कहना है कि किसी को भी कानून को अपने हाथ में लेने का अधिकार नहीं है। कोई भी शख्स जो हिंसक वारदात में शामिल है, उसे सजा जरूर मिलेगी। जहां तक लोकतांत्रित मूल्यों की बात है तो हम ऐसी विचारधारा के हैं जिसने आपातकाल का विरोध किया और लोकतंत्र की रक्षा की। हमारा यह दृढ़ विश्वास है कि असहमति, संवाद और विमर्श लोकतंत्र के अभिन्न अंग हैं।

जहां तक अवॉर्ड वापसी और पत्र जारी कर अपील करनेवालों की बात है, ऐसे कई संगठन हैं जो इस तरह के कैंपेन चलाते हैं। बहुत सी ऐसी संस्थाएं हैं जो यहां काम कर रही हैं, लेकिन इनकी फंडिंग दूसरे देशों से होती है। ये भारत में रहते हैं, लेकिन विदेशी चंदे से इनका काम चलता है। ये संस्थाएं आपस में एक-दूसरे से बेहतर तरीके से जुड़ी हैं और पुरानी सरकारों के साथ इनका नेटवर्क मजबूत है, इन्हें राष्ट्रविरोधी गतिविधियों को जारी रखने की छूट मिली हुई थी। यह सब कुछ कानून के होने के बावजूद भी चलता रहा। एफआरसीए कानून ऐसी संस्थाओं के नियमन के लिए है, लेकिन इनकी स्क्रूटनी पर बहुत कम काम हुआ और यह कानून इन संस्थाओं पर सही तरीके से लागू नहीं हुआ।

जब हम सत्ता में आए तो हमने इस कानून को प्रभावी तरीके से लागू किया और इन संस्थाओं से इनकी फंडिंग के स्रोत की जानकारी मुहैया कराने और विदेशी खातों की जानकारी देने का निर्देश दिया। इन संस्थाओं को इस किस्म की सख्त स्क्रूटनी की कोई उम्मीद नहीं थी। जब बैंक खातों की जानकारी मांगी गई तो 20,000 ऐसी संस्थाओं ने अपनी गतिविधि बंद कर दी। अब यही संस्थाएं कांग्रेस के पक्ष में माहौल बनाने के लिए काम कर रही हैं और देश के नागरिकों को भ्रमित करने के लिए सरकार के खिलाफ दुष्प्रचार की मुहिम चला रहे हैं।

आपने एनआरसी और नागरिकता संशोधन विधेयक जैसे मुद्दों को देश के हित में जरूरी बताते हुए जोर-शोर से उठाया। विपक्ष का आरोप है कि ये मुस्लिमों के खिलाफ हैं। बीजेपी और कांग्रेस के घोषणापत्र में भी मूलभूत वैचारिक विरोध दिखता है। क्या आपको लगता है कि बीजेपी और उसके आलोचकों/विरोधियों के बीच कभी खत्म न होने वाले मतभेद हैं। क्या इस गैप को भरने का कोई रास्ता है?

ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ लोग हर चीज को अपने चश्मे से ही देखते हैं। उन्हें हर चीज अपने चश्मे के ही रंग की नजर आती है। एनआरसी सुप्रीम कोर्ट से निर्देशित प्रक्रिया है। यह अवैध प्रवासियों के खिलाफ भारतीय नागरिकों के अधिकारों के संरक्षण के लिए है। सुप्रीम कोर्ट ने पूर्ववर्ती सरकार से भी एनआरसी को लागू करने के लिए कहा था, लेकिन उन्होंने नहीं किया। उस सरकार की वही घिसी-पिटी वोट बैंक की राजनीति आड़े आ गई और उन्होंने इसे लागू नहीं किया। अब हम एनआरसी को लागू करवा रहे हैं, यह सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में हो रहा है। अगर कुछ लोग एनआरसी को लागू करने की प्रक्रिया पर बेबुनियाद सवाल उठा रहे हैं तो ऐसा ही लग रहा है कि विरोध करनेवाले खुद को सुप्रीम कोर्ट से सर्वोच्च समझ रहे हैं।

नागरिकता संशोधन विधेयक पड़ोसी देशों में सताए जाने के बाद भारत आए अल्पसंख्यकों के अधिकारों के संरक्षण के लिए भी है। इन लोगों के लिए स्वाभाविक तौर पर भारत ही इनका घर है। मानवता के आधार पर, यह भारत का दायित्व है कि ऐसे लोगों को शरण दी जाए, जिनके पास जाने के लिए कोई और जगह नहीं है। मैं उन लोगों से पूछना चाहता हूं जो अल्पसंख्यकों के मानवाधिकार की बात करते हैं, क्या यह हमारी नैतिक जिम्मेदारी नहीं है कि पड़ोसी मुल्क के अल्पसंख्यकों को हम सहारा दें?

मैं एक बार फिर सबको यकीन दिलाना चाहता हूं कि हम यह सब पूरी संवेदनशीलता के साथ कर रहे हैं। नॉर्थ ईस्ट से हमारे भाई-बहनों ने जो भी चिंताए जाहिर की हैं, हम उनका ध्यान रख रहे हैं। हम हमेशा ही उनकी संस्कृति, परंपरा और मूल्यों की रक्षा करते रहेंगे। सौभाग्यवश, न तो मुझे और न ही इस देश के नागरिकों को हर चीज अपने रंग के चश्मे से देखने की आदत नहीं है। लोगों के दिमाग में यह बात पूरी तरह से स्पष्ट है कि देश सबसे पहले है। अब तो लोगों के लिए यह और भी अधिक स्पष्ट हो गया है जब कांग्रेस का ‘मुखौटा’ पूरी तरह से उतर चुका है। कांग्रेस और बीजेपी के बीच का अंतर इससे अधिक स्पष्ट तौर पर सामने नहीं आ सकता है।

हम अपने सुरक्षा बलों के साथ खड़े होते हैं और वे टुकड़े-टुकड़ गैंग के साथ। हम कश्मीरी पंडितों के साथ खड़े हैं। वे उन लोगों के साथ खड़े हैं जो देश में दो संविधान और दो प्रधानमंत्री चाहते हैं। हम देश की अखंडता और गौरव को बचाने के लिए खड़े हैं। वो लोग जो देशद्रोह के दोषी हैं, उनके साथ खड़े हैं। हम महिलाओं और बच्चों के अच्छे स्वास्थ्य के लिए खड़े हैं। यह अब साबित हो चुका है कि महिलाओं और बच्चों के लिए जो पैसा था उन्होंने उसे भी लूटने का काम किया। हम लोकतंत्र के लिए खड़े हैं और वो वंशवाद के लिए। हमारे लिए भारत सबसे पहले है और उनके लिए परिवार प्रथम है।

आपने लंबित और अटके प्रॉजेक्ट्स के लिए प्रगति की शुरुआत की। इस तरह के प्रयोग कितने सफल रहे? क्या ऐसा कोई तरीका है कि इनके लिए प्रधानमंत्री को मीटिंग करने की जरूरत न हो और व्यवस्थागत प्रक्रिया के तहत ही इन्हें पूरा किया जा सके?

अभी तक 26 प्रगति सेशन हुए हैं और इनसे 230 प्रॉजेक्ट्स, जिनकी लागत करीब 10 लाख करोड़ रुपये की है, को आगे ले जाने का काम शुरू हो गया है। 30-40 साल से अटके हुए प्रॉजेक्ट्स क्लियर हुए हैं। प्रगति यह दिखाने के लिए काफी है कि जब इरादे नेक हों और दृष्टि भविष्य की तरफ हो तो असंभव लगनेवाली चीजें भी संभव हो सकती हैं। मिलकर महान सफलता अर्जित की जा सकती है। प्रगति अब एक सुव्यवस्थित प्रक्रिया बन चुकी है।

जहां तक इसमें मेरे जाने का सवाल है तो मैं वहां कर्तव्य भाव के साथ जाता हूं, इस जिम्मेदारी के विचार के साथ जाता हूं कि मैं अपने लोगों के लिए और क्या कर सकता हूं। इन सबके साथ यह हमेशा ही अच्छा होता है कि आप मुख्य योजनाओं पर अलग-अलग नीति निर्धारकों के विचारों को सुन सकें और उनके साथ मिल-बैठ सकें।

गुजरात में आपने अपनी छवि एक ऐसे नेता की बनाई है, जो लोकलुभावन वादों (जैसे कि मुफ्त बिजली) के दबाव में नहीं रहता। लेकिन क्या आपको लगता है कि आप पीएम किसान सम्मान निधि और कई तबकों को पेंशन देने जैसी योजनाओं की चुनावी घोषणा कर इस प्रेशर में झुके हैं?

क्या आप लंबे समय बाद आई आर्थिक रूप से बेहद जिम्मेदार सरकार पर लोकलुभावन होने का आरोप नहीं लगा रहे हैं? हमारे पांच साल में हम राजकोषीय घाटे से बेहद मजबूती से निपटने में कामयाब रहे हैं। हम देश के वित्त को लेकर बेहद जिम्मेदार हैं। जैसा कि आप जानते हैं, यह पिछली सरकार की परफॉर्मेंस से बिल्कुल अलग है। हालांकि सामाजिक क्षेत्र, स्वास्थ्य और समावेशी विकास में हमारे व्यापक प्रयास और निवेश के कारण आप ‘लोकलुभावन’ शब्द का इस्तेमाल कर रहे हैं। इसका श्रेय हमें दिया जा सकता है कि राजकोषीय तंगी के बावजूद हम समाज के वंचित वर्गों को सशक्त बनाने के लिए काफी निवेश कर रहे हैं।

क्या कर्जमाफी गरीबी दूर करने का एक जरिया है?

एक अर्थशास्त्री और प्रधानमंत्री के रूप में मनमोहन सिंह इसके खिलाफ पहले ही राय दे चुके हैं। हमारे रोडमैप में यह सुनिश्चत करना शामिल है कि 2022 तक किसानों की आय दोगुनी हो जाए। छोटे और कमजोर किसानों की खुशहाली बहुत जरूरी है। ऐसे 12 करोड़ किसानों की स्थिति में सुधार के बिना हमारा कृषि सेक्टर विकसित नहीं हो सकता। उन्हें इनकम सपोर्ट की जरूरत है। ऐसे में एक मॉडल कांग्रेस का है कि 10 साल में एक बार कर्जमाफी का वादा कर दिया जाए और उसे पूरी तरह से लागू भी न किया जाए। जब कांग्रेस नें 2008-09 में कर्जमाफी का वादा किया तब बकाया कृषि ऋण छह लाख करोड़ रुपये था। उन्होंने इस बकाया राशि का 10% भी माफ नहीं किया और किसानों को ठग लिया। इससे न तो किसानों के कर्ज खत्म हुए और न ही उनकी चिंताएं। कांग्रेस लंबे समय से कर्जमाफी के नाम पर किसानों को ठगती रही है और इसका स्थायी समाधान खोजने की उसकी कोई मंशा भी नहीं है।

दूसरी तरफ हमारी सरकार है, जो किसानों की जिंदगी बदलने का प्रयास कर रही है। हम हर स्तर पर रिफॉर्म्स के जरिए चीजों को बदलने की कोशिश कर रहे हैं। पीएम किसान सम्मान निधि उन्हीं उपायों में से एक है। पेंशन योजनाओं के जरिए हम ऐसे लोगों को टारगेट कर रहे हैं, जो प्राय: हमारी फाइनैंशल प्लैनिंग में कवर नहीं हो पाए थे। पेशंन योजनाओं में लाभार्थियों को भी मामूली हिस्सा देना पड़ता है। हम लोगों को अपने भविष्य के लिए निवेश करने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं और उसका इनाम दे रहे हैं।

बालाकोट पर एयर स्ट्राक और उससे पहले उरी के आर्मी कैंप में हमले के बाद सर्जिकल स्ट्राइक जैसे कदम उठाने की अनुमति देने का फैसला करना आपके लिए कितना मुश्किल था?

यह सवाल सही नहीं है। मेरे लिए यह ज्यादा मुश्किल होता अगर मैं यह फैसला न लेता। लेकिन मैं आपको बता दूं कि ये फैसले आवेश आकर नहीं लिए गए हैं। ये फैसले विशेषज्ञों से बातचीत और इनके नफे-नुकसान पर चर्चा करने के बाद लिए गए हैं। जब आपका कोई राजनीतिक या व्यक्तिगत हित न हो, जब राष्ट्र की भलाई ही आपके लिए सर्वोपरि हो, जब सिर्फ देशभक्ति आपको राह दिखाती हो, तो कोई भी फैसला मुश्किल नहीं होता।

बालाकोट में मारे गए आतंकियों की संख्या पर सवाल किए जाने पर आपकी प्रतिक्रिया क्या होती है? इसके साथ ही सेना के राजनीतिकरण के आरोपों और बीजेपी पर पुलवामा व बालाकोट का राजनीतिक लाभ लेने के आरोप पर आपकी प्रतिक्रिया क्या है?

हमें अपने देश की सेना के पराक्रम पर पूरा विश्वास है। जो लोग इस पर सवाल खड़े कर रहे हैं, देश के लोग उन्हें अच्छा उत्तर देंगे। जो लोग देश की सेना के राजनीतिकरण का आरोप लगा रहे हैं, ये वही लोग हैं जो 1971 के युद्ध में मिली जीत का श्रेय लेते हैं। ये वही लोग हैं, जो आर्यभट्ट सैटलाइट लॉन्च करने का श्रेय भी लेते हैं। ये वही लोग हैं, जिन्होंने अटलजी की सरकार में ‘आर्मी के ताबूत’ का झूठा स्कैम गढ़ा। क्या यह सब राजनीतिकरण नहीं है?

एक पल के लिए सोचिए, यदि विंग कमांडर अभिनंदन लौटकर वापस न आए होते तो? कांग्रेस और उनके सहयोगी मोदी का क्या हाल करते? उन्होंने इसके लिए कैंडल लाइट मार्च की तैयारी कर ली थी। यदि उरी और पुलवामा के बाद कोई कार्रवाई न होती तो देश के कुछ तथाकथित तटस्थ लोग, जो 26/11 के बाद चुप रहे, ने मोदी को बख्श दिया होता? सेना देश की है, पराक्रम भी देश का है और चुनाव भी देश का है।

इमरान खान ने कथित तौर पर कहा है कि बीजेपी सरकार के साथ बातचीत करना आसान होगा, क्योंकि आपके पास कठोर फैसले लेने का माद्दा है जो दूसरों में नहीं। आप क्या कहेंगे?

हमें नहीं भूलना चाहिए कि इमरान खान क्रिकेटर थे और उनका हालिया बयान भारतीय चुनावों को प्रभावित करने के लिए उनकी रिवर्स स्विंग है। हालांकि, देशवासियों को पता है कि रिवर्स स्विंग पर हेलिकॉप्टर शॉट कैसे लगाए जाते हैं। हमें यह भी याद रखना चाहिए कि उन्होंने पाकिस्तान के चुनावों में मोदी के नाम का कैसा इस्तेमाल किया था। उनका नारा था- ‘मोदी का जो यार है, वो गद्दार है, वो गद्दार है।’

जीएसटी से आगे का रास्ता क्या है? व्यापारियों और खासकर छोटे कारोबारियों की चिंताओं का उचित समाधान हो गया है?

इतने राज्यों और 130 करोड़ जनसंख्या वाले इस देश की अर्थव्यवस्था को इतनी सहजता से पूरी तरह बदल देना बड़ी उपलब्धि है। केंद्र एवं राज्यों के अलग-अलग टैक्सों के जखीरे को सिर्फ एक टैक्स में तब्दील कर पाना आसान नहीं है, लेकिन हमने इसे सफलतापूर्वक किया है।

जीएसटी में लगातार टैक्स घटाए जा रहे हैं। आम लोगों के काम की 99 प्रतिशत वस्तुओं पर जीएसटी से पहले के मुकाबले आधी दर से टैक्स लग रहा है। 80 से ज्यादा घरेलू इस्तेमाल के सामानों पर टैक्स घटे हैं और रोजमर्रा के इस्तेमाल की कई वस्तुओं पर कोई टैक्स नहीं देना पड़ रहा है। जीएसटी में करों का बोझ लगातार कम होता रहेगा।

ऐसा इसलिए क्योंकि जीएसटी के तहत नियमों का पालन करना सबके लिए आसान हो गया है क्योंकि यह एक ऑनलाइन प्लैटफॉर्म आधारित सिस्टम है, जो ज्यादा पारदर्शी है। इससे कारोबार करना आसान हुआ है।

जीएसटी लागू करने की पूरी प्रक्रिया में हम कारोबारी समुदाय, खासकर छोटे व्यापारियों की चिंताओं के प्रति बेहद चौकन्ना रहे। हमने उनकी परेशानियां सुनीं, उनके सुझावों को लागू किया और सुनिश्चित किया कि उनकी चिंताओं का समाधान हो। छोटे-छोटे बिजनस को जीएसटी से छूट की सीमा 20 लाख से बढ़ाकर 40 लाख रुपये कर दी गई। 1.5 करोड़ रुपये तक के टर्नओवर वाले छोटे कारोबार के पास कंपोजिशन स्कीम है, जिसमें उन्हें एक रेट से टैक्स देना होता है और सिर्फ सालाना रिटर्न ही भरना होता है।

देश के कई भागों में किसान नाखुश जान पड़ते हैं क्योंकि उन्हें खेती पर किए खर्च के मुताबिक रिटर्न नहीं मिल रहा है। आप किसानों और उपभोक्ताओं के हितों के बीच सामंजस्य कैसे बिठा पाएंगे क्योंकि कन्ज्यूमर्स सस्ते खाद्य पदार्थों का लाभ उठा रहे हैं जबकि किसानों की आमदनी पर नकारात्मक असर पड़ रहा है?

किसान कल्याण हमारी प्रमुख प्राथमिकता है और हम पहले दिन से इस पर काम कर रहे हैं। 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का हमारा घोषित लक्ष्य है। हमने सिर्फ बयानबाजी नहीं की है, बल्कि जिम्मेदारी तय करने पर विशेष ध्यान दिया है।

फसल बोने की बात हो या उसे बेचने की, इसके बीमा की बात हो या सिंचाई की, कृषि क्षेत्र में चौतरफा सुधार देखा जा रहे हैं। हम अपने किसानों की आमदनी के साधन को मजबूत बना रहे हैं और उनकी कठिनाओं को कम करने की कोशिश हो रही है।

कृषि चक्र के दोनों छोरों पर ध्यान रखते हुए हमने लागत घटाने पर काम किया और यह भी तय किया है कि किसानों को फसल के सही दाम मिल जाएं।

किसानों की आय पर नकारात्मक असर नहीं पड़े, यह सुनिश्चित करने के लिए हमने न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि का ऐलान किया और अब लागत का कम-से-कम 1.5 गुना एमएसपी तय हो गया है। हालांकि, सिर्फ एमएसपी बढ़ाते रहना पर्याप्त नहीं है। हमें एमएसपी पर किसानों से ज्यादा मात्रा में उनकी उपज खरीदनी होगी और ताकि उन्हें बढ़ी हुई एमएसपी का वास्तिवक लाभ मिल पाए।

पहले की सरकार और हमारी सरकार में यही बड़ा अंतर है। एक उदारहण देता हूं। 2009-10 से 2013-14 के पांच वर्षों की यूपीए सरकार में सिर्फ 3,117.8 करोड़ रुपये मूल्य के 7 लाख मीट्रिक टन के करीब दलहन और तिलहन एमएसपी पर खरीदे गए थे। 2014-15 से 2018-19 के दौरान एनडीए सरकार में 44,142.50 करोड़ रुपये मूल्य के 94 लाख मीट्रिक टन दलहन और तिलहन समर्थन मूल्य पर खरीदे गए। यह दस गुना से ज्यादा वृद्धि है। इसलिए, हम सिर्फ एमएसपी बढ़ाते ही नहीं हैं बल्कि सुनिश्चित करते हैं कि एमएसपी पर ज्यादा-से-ज्यादा खरीद की जाए ताकि किसानों को उनकी उपज के ऊंचे दाम मिलें। इसके बावजूद हमने महंगाई को काबू में रखा है।

10 वर्षों के शासन के बावजूद जिनके वादे उनके पुराने घोषणापत्रों में ही दम घोंट देते हैं, उनके विपरीत हमने डायरेक्ट इनकम सपोर्ट की घोषणा की और एक महीने में ही इसे लागू कर दिया। इससे 12 करोड़ छोटे और सीमांत किसानों को लाभ मिलेगा। उनके हाथ में पैसे जाएंगे और ग्रामीण क्षेत्रों में खपत भी बढ़ेगी।

याद कीजिए, हम सिर्फ योजनाओं का ऐलान नहीं करते हैं, हम इन्हें लागू भी करते हैं। करोड़ों किसानों को सीधे उनके बैंक खातों में पहली किस्त के पैसे पहुंच चुके हैं। जिन कांग्रेस शासित राज्यों में कृषि ऋण माफी का ऐलान किया गया था, वहां हालात उलट हैं। कर्ज माफी की जगह किसानों को अरेस्ट वॉरंट्स मिल रहे हैं।

हमने अपने मेनिफेस्टो में ऐलान किया है कि हम पीएम किसान सम्मान निधि का दायरा बढ़ाएंगे और सभी किसानों को योजना का लाभ दिया जाएगा। ये सभी किसानों की आय बढ़ाने के तरीके हैं। हमने अगले पांच वर्षों में कृषि और ग्रामीण विकास पर 25 लाख करोड़ रुपये खर्च करने का वादा किया है।

आप 10 के स्केल पर अपनी सरकार के परफॉर्मेंस को कैसे आंकते हैं?

मैं खुद को रेटिंग नहीं देना चाहता। कुछ सप्ताह पहले ही टाइम्स ऑफ इंडिया ने एक बड़ा पोल किया था। इसमें करीब 83 फीसदी लोगों ने हमारे काम को अच्छा या बहुत अच्छा करार दिया था।

बीजेपी ने कई कारणों से अपने एक-तिहाई सांसदों के टिकट काट दिए हैं। इनमें से एक कारण परफॉर्मेंस भी है। क्या आप अपने सभी मंत्रियों की परफॉर्मेंस से खुश हैं या उसमें कुछ बदलाव करेंगे। बीजेपी अध्यक्ष चुनाव लड़ रहे हैं। क्या यह उन्हें आगे चलकर सरकार में लाए जाने का संकेत है?

टिकटों का फैसला केंद्रीय चुनाव समिति और संसदीय बोर्ड सामूहिक तौर पर लेते हैं। कौन क्या होगा और क्या करेगा, यह फैसला पार्टी का होता है और उसके मुताबिक ही हम काम करते हैं। यदि किसी व्यक्ति को टिकट नहीं मिलता है तो उसका यह मतलब नहीं है कि उनका योगदान कम है या फिर उनका महत्व नहीं है।

आपने कहा कि गांधी परिवार अब सत्ता में नहीं लौटेगा। लेकिन, राजनीति में यह भी कहा जाता है कि आप किसी को खारिज नहीं कर सकते। आप 2004 में और अब में क्या फर्क देखते हैं, जब माना जा रहा था कि एनडीए सत्ता में लौटेगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ?

मैं वह व्यक्ति नहीं हूं, जो बीते हुए कल में जीता है। आज यह सर्वमान्य राय है कि 2004 के चुनावों में किसी गठबंधन या किसी उम्मीदवार की पराजय नहीं हुई थी बल्कि भारत की हार हुई थी। अटल जी के कार्यकाल के दौरान भारत में नई उम्मीदें जगी थीं। यह माना जाने लगा था कि भारत के विकास की आकांक्षाएं पूरी होंगी और हम 21वीं सदी के लिए तैयार हैं। मई 2004 में यह सब कुछ बदल गया। यूपीए और कांग्रेस हमें पीछे ले गए। वह दौर घोटालों और विकास के रुकने का था। इस बार बहुत उत्साह है और एनडीए के लिए पॉजिटिव वोट पड़ने वाला है।

आपका कार्यकाल घोटालों से मुक्त रहा है, लेकिन विपक्ष विजय माल्या और नीरव मोदी के भागने को लेकर आप पर हमले करता रहा है। राफेल विवाद बना हुआ है। सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में इस पर पुनर्विचार की बात कही है, जिसके फैसले को आपकी सरकार क्लीन चिट बता रही थी। आप क्या कहेंगे?

राफेल पर कोई विवाद नहीं है। वे सुप्रीम कोर्ट गए और देखिए वहां क्या हुआ। वे कैग के पास गए और देखिए क्या हुआ। लेकिन, मीडिया का एक वर्ग मोदी के खिलाफ कुछ मिलने पर मोदी को ‘झटका’ बताता है। लेकिन, जब सुप्रीम कोर्ट अपने फैसले के दुरुपयोग पर सवाल उठाता है तो चुप्पी साध लेते हैं। मीडिया का यही वर्ग तुगलक रोड चुनाव घोटाला पर ‘XYZ को झटके’ की हेडलाइन नहीं लगाता।

यही नहीं, अगुस्टा वेस्टलैंड घोटाले में खुलासों को लेकर भी मीडिया का यह सेक्शन ‘XYZ को झटके’ की बात नहीं करता। मीडिया का यही वर्ग नैशनल हेरल्ड फैसले पर भी चुप्पी साध लेता है। अब जहां तक भगोड़ों की बात है तो इसी सरकार ने क्रिस्चन मिशेल, राजीव सक्सेना और दीपक तलवार को वापस लाने में सफलता पाई। मैं एक बार फिर कहना चाहता हूं कि देश को लूटने वाला कोई भी शख्स बच नहीं पाएगा।

क्या आप प्रेशर महसूस करते हैं?

मैं जिम्मेदारी महसूस करता हूं।

पांच साल के कार्यकाल किस चीज की वजह से आपको सबसे ज्यादा संतोष और आनंद मिला?

यह जिम्मेदारी है, आनंद-प्रमोद का विषय नहीं है। यह देश का दुर्भाग्य है कि अतीत में कई लोग इस बड़े पद का इस्तेमाल आम आदमी के लिए नहीं कर पाए। कुछ काम जो मैंने 60-70 साल बाद किए हैं, वे बहुत पहले हो जाने चाहिए थे। 2014 में देश में मायूसी का माहौल था और आज देश में चारों ओर उम्मीद का माहौल। इतने कम समय में सवा सौ करोड़ लोगों में इस तरह की भावना मेरे लिए आनंद का विषय है।

सौजन्य- टाइम्स ऑफ इंडिया

Leave a Reply