Home विचार देश को पीछे क्यों ले जाना चाहते हैं कांग्रेस के ‘युवराज’?

देश को पीछे क्यों ले जाना चाहते हैं कांग्रेस के ‘युवराज’?

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केंद्र सरकार कितनी भी अच्छी नीतियां देशहित में क्यों न बना लें, विपक्ष उसके विरोध में हो-हल्ला करता ही है। गलत नीतियों, विचारों का विरोध तो जरूरी है, लेकिन हितकारी नीतियों पर जबरदस्ती विरोध कर देशहित को नुकसान पहुंचाना समझ से परे है। कांग्रेस है कि मानती ही नहीं है… हर स्तर पर नकारात्मक राजनीति पर उतर आई है।

नोटबंदी पर कांग्रेस का विरोध के लिए चित्र परिणाम

जनहित के कदमों का विरोध-नोटबंदी
8 नवंबर की रात नोटबंदी का ऐतिहासिक और साहसिक फैसला लेकर मोदी सरकार ने कालेधन और आतंकवाद पर करारा प्रहार किया था। नोटबंदी से 500 और हजार के पुराने नोटों को चलन से बाहर कर पीएम मोदी ने देश की अर्थव्यवस्था पर झाड़ू चलाई थी। हालांकि, शुरुआत में इस निर्णय से लोगों को परेशानियों का सामना करना पड़ा, मगर बाद में इस फैसले का उन्होंने भी स्वागत किया। वहीं, कांग्रेस ने अपनी नकारात्मक राजनीति लगातार जारी रखी है। कांग्रेस इसे ‘स्कैम ऑफ द सेंचुरी’ कह रही है, लेकिन कांग्रेस को यह समझना आवश्यक है कि इसी नोटबंदी के कारण देश में 57 लाख नये करदाता जुड़े हैं। इसी नोटबंदी के कारण तीन लाख फर्जी कंपनियां पकड़ाई हैं। इसी नोटबंदी के कारण 72 हजार करोड़ से अधिक की बेनामी संपत्ति का पता लगा है। इसी नोटबंदी के कारण बैंकों में तीन लाख करोड़ रुपये जमा हो सके हैं। आखिर विपक्ष इतने बड़े देशहित के कदम का विरोध कर क्या संदेश देना चाहती है?

नोटबंदी पर कांग्रेस का विरोध के लिए चित्र परिणाम

आर्थिक सुधार का विरोध – जीएसटी
जीएसटी के लागू होने की प्रक्रिया में कांग्रेस समेत विपक्ष के कई दल रोड़े अटकाते रहे हैं। बावजूद इसके देश की आर्थिक आजादी की नयी कहानी लिखने वाला यह निर्णय एक जुलाई से लागू हो चुका है। ‘वन नेशन, वन टैक्स’ की नीति देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए है, देश में पूंजी निवेश बढ़ाने के लिए है, व्यापारियों के झंझट को खत्म करने वाला है, उद्योगपतियों को इंस्पेक्टर राज से मुक्ति दिलाने के लिए है यानी जनता की सहूलियत के लिए है, लेकिन विपक्ष को तो केंद्र सरकार के हर निर्णय का विरोध करना होता है इसलिए विरोध करते रहे। अपनी राजनीति के सामने देशहित से भी खिलवाड़ करता रहा। कांग्रेस ने विरोध भी कुतर्क के जरिये किया और कहा कि सेंट्रल हॉल में इसके लागू होने का कार्यक्रम करना अनुचित है। विरोध करते हुए कांग्रेस यह शायद भूल गई कि 29 राज्यों और 7 केंद्र शासित प्रदेश वाले देश में इसे लागू करना पाना कितना कठिन था। अलबत्ता कांग्रेस की राज्य सरकारों ने भी जीएसटी का समर्थन किया था। अब सवाल उठता है कि कांग्रेस का विरोध फिर क्यों?

जीएसटी पर कांग्रेस का विरोध के लिए चित्र परिणाम

विकास कार्यों का विरोध- बुलेट ट्रेन
”विकास पागल हो गया है।” आजकल कांग्रेस ये नारा खूब बोल रही है, लेकिन क्यों? दरअसल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश के विकास को अपना मेन मिशन बना चुके हैं। वहीं, कांग्रेस देश को जाति-जमात की नकारात्मक राजनीति में उलझाना चाहती है। इसी के तहत अब वह विकास कार्यों को भी निशाना बना रही है। 14 सितंबर को परियोजना की शुरुआत होते ही कांग्रेस ने इसे सियासत का जरिया बना लिया। क्या कांग्रेस ने ठान लिया है कि देश को गति नहीं देनी है। कांग्रेस को यह समझना जरूरी है कि अभी मुंबई-अहमदबाद का 500 किलोमीटर की दूरी तय करने में 8 घंटे लगते हैं। ये दोनों बड़े बिजनेस हब हैं ऐसे में यह इस इलाके की तस्वीर बदलने वाली है। एक बात यह भी सच है कि विकास हमेशा कड़े फैसले लेने के बाद ही आता है। चीन, जापान, जर्मनी जैसे देशों ने ऐसे कड़े फैसले लिए और इसका फायदा उठा रहे हैं। जाहिर है कांग्रेस को विकास कार्यों का समर्थन यह समझकर भी करना चाहिए कि यह देशहित के लिए है।

चीनी राजदूत से मिले राहुल के लिए चित्र परिणाम

भारत की सुरक्षा से समझौता-चीनी राजदूत से मिले
भारत-चीन के बीच 73 दिनों तक सिक्किम से सटे डोकलाम क्षेत्र जबर्दस्त तनातनी का माहौल रहा। इस कूटनीतिक और सैन्य तनाव पर दुनिया भर की नजरें गड़ी थीं। ऐसे में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी जिन हालातों में चोरी-छिपे भारत में मौजूद चीन के राजदूत लिओ झाओहुई से मिलने पहुंच गए उसने सारे देश को हैरान कर दिया। इन हालातों में राहुल के चीनी राजदूत से मुलाकात करना कई तरह के सवाल खड़े कर गए। कांग्रेस पार्टी पर वो भले ही माई-बाप बनकर शासन करते हैं, लेकिन उनकी सियासी और कूटनीतिक समझ पर अभी देश का भरोसा नहीं जम पाया है। अगर राहुल और अन्य कांग्रेसी नेताओं के मन में कुछ भी गलत नहीं था तो उनकी पार्टी को पहले इस मुलाकात पर झूठ क्यों बोलना पड़ा ? राजनीतिक मतभेद अपनी जगह हैं, लेकिन देश को धोखा देकर दुश्मन देश से गोपनीय बातें करना कई आशंकाओं को जन्म देती हैं।

आंतरिक सुरक्षा पर दोहरा रवैया-रोहिंग्या का समर्थन
देश में कुछ लोगों और संस्थाओं की ओर से एक ऐसी छवि बनाने की कोशिश दिख रही है कि रोहिंग्या ‘शरणार्थियों’ के लिए भारत सरकार के हृदय में वेदना नहीं है, लेकिन इस कोशिश के अंदर से एक साजिश की बू आती है क्योंकि इसमें उस पहलू की जानबूझकर अनदेखी की जाती है जो पहलू देश की सुरक्षा से जुड़ा है। मोदी सरकार का संकल्प रहा है कि वो ‘राष्ट्र सर्वोपरि’ की भावना से खिलवाड़ नहीं होने देगी। एक ओर रोहिंग्या को लेकर तमाम शंकाएं हैं दूसरी ओर कांग्रेस रोहिंग्या पर राजनीति कर रही है। इसके पैरोकार इस विसंगति से आंखें मूंदे रह जाते हैं कि रोहिंग्या जिन देशों के नागरिक हैं वही इन्हें आतंकी मानते हुए अपने यहां रखना नहीं चाहते। म्यांमार के दूसरे पड़ोसी देश बांग्लादेश, इंडोनेशिया, थाइलैंड भी रोहिंग्या को शरण देने को तैयार नहीं। ये सुरक्षा संबंधी चिंता ही है जो बांग्लादेश में रोहिंग्या समुदाय के लोगों को फोन कनेक्शन देने पर रोक लगा दी गई है। करीब 50 मुस्लिम देशों ने आतंक से रोहिंग्या का नाता देखकर इन्हें शरण देने से मना कर रखा है। ऐसे में फिर भारत में इनके प्रति हमदर्दी को आने वाले समय के लिए वोट बैंक के इंतजाम की कोशिश के रूप में क्यों ना देखा जाए?

रोहिंग्या पर कांग्रेस के लिए चित्र परिणाम

जाति-जमात की राजनीति- हार्दिक, जिग्नेश, अल्पेश को खड़ा किया
गुजरात में दलित, ओबीसी और पाटीदारों की तिकड़ी तैयार की गई है। गुजरात के स्वाभिमान को वर्ग-समुदाय-जाति में बांटने की कोशिश हुई है। गुजरात के विकास को झूठ बताकर राज्य की अस्मिता पर आघात किया गया है। छह करोड़ गुजरातियों के स्वाभिमान को ठेस पहुंचाई गई है। कैसे विकसित होते राज्य को जाति और जमात की लड़ाई में फंसाकर इसे पिछड़ा गुजरात बनाने की कोशिश की गई है। दरअसल भ्रष्टाचार और कुशासन की प्रतीक रही कांग्रेस हर हाल में केंद्र की सत्ता पाना चाहती है और इसके लिए ये सारा तिकड़म प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को गुजरात में कमजोर करने की कुत्सित कोशिश के तहत की गई है। प्रधानमंत्री मोदी को कमजोर करने के लिए कांग्रेस ने अपनी कार्ययोजना 2014 में ही तैयार कर ली थी। कांग्रेस ने प्रधानमंत्री मोदी को सबसे पहले उनके गृहराज्य में ही घेरने की नीति पर काम करना शुरू कर दिया। हार्दिक पटेल, अल्पेश ठाकोर और जिग्नेश वानी जैसे युवाओं को बरगलाया और पैसे के दम पर उनके संगठन खड़े किए। उना में दलित पिटाई कांड के पीछे कांग्रेसी माइंड की पोल तो पहले ही खुल चुकी है।

संविधान का भी उड़ाया मजाक-दागी जन प्रतिनिधि विधेयक को फाड़ा
27 सितंबर को दिल्ली के प्रेस क्लब में अचानक अवतरित हुये राहुल गांधी के दागियों को बचाने के सरकारी अध्यादेश को फाड़ डाला था। क्या वो भूल गए जब खुद मनमोहन सरकार की राहुल गांधी ने सरेआम टोपी उछाली थी। उस दिन राहुल गांधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में मीडिया के लाइव कवरेज के सामने मनमोहन सरकार के फैसले को ही नहीं फाड़ा था, बल्कि संविधान की आत्मा को भी जार-जार किया था। ये सीख भी इन्हें इनके पिता राजीव गांधी से ही मिली। गौरतलब है कि प्रेस कॉन्फ्रेंस में ही राजीव गांधी ने अपने विदेश सचिव को बर्खास्त कर दिया था। यही नहीं संवैधानिक संस्थाओं को उस समय भी ध्वस्त किया जाता रहा, जब इनकी दादी इंदिरा गांधी ने दर्जन भर से ज्यादा राज्यों के निर्वाचित सरकारों को बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लगा दिया था।

राहुल ने प्रेस क्लब में अध्यादेश के लिए चित्र परिणाम

 

 

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