Home विचार संविधान के ‘चीरहरण’ का दोषी कांग्रेस है, देखिए सबूत

संविधान के ‘चीरहरण’ का दोषी कांग्रेस है, देखिए सबूत

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स्वतंत्र भारत के इतिहास में किसी मामले की सुनवाई के लिए दूसरी बार सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा आधी रात को खोला गया। एक बार 2015 में आतंकी याकूब मेमन को बचाने के लिए, दूसरी बार कांग्रेस की संविधान बचाने की दुहाई पर 16 मई की आधी रात को।

दरअसल कर्नाटक के राज्यपाल के संविधान सम्मत कार्य को कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। हालांकि राज्यपाल वजुभाई बाला ने एसआर बोम्मई केस में सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी गाइड लाइन के आधार पर सबसे अधिक सीट वाली पार्टी के सरकार बनाने के दावे को स्वीकार किया था। इसी आधार पर 17 मई को येदियुरप्पा ने शपथ ग्रहण भी कर लिया। जाहिर है राज्यपाल के फैसले ने बैकडोर से सत्ता पर काबिज होने की कांग्रेस की मंशा पर पानी फेर दिया है।

अब सवाल उठ रहे हैं कि ऐसी कौन सी परेशानी आ गई थी जो आधी रात को सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खुलवाना पड़ा? क्या इससे पहले राज्यपाल पद का दुरुपयोग कभी नहीं हुआ है?

दरअसल कांग्रेस पार्टी का इतिहास ही लोकतंत्र की हत्या करने का रहा है। आपातकाल, संवैधानिक संस्थाओं का अपमान, अदालतों पर आक्षेप, मीडिया और नागरिक अधिकारों का हनन करने के साथ ही राज्यपाल पद का दुरुपयोग करने जैसे कृत्य कांग्रेस की परम्परा में शामिल रहे हैं।

समर्थन की चिट्ठी नहीं होने पर घिर गयी कांग्रेस
सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस से यह पूछा कि आप जिस समर्थन का दावा कर रहे हैं उस समर्थन की चिट्ठी कहां है तो कांग्रेस का पक्ष रख रहे अभिषेक मनु सिंघवी के पास कोई जवाब नहीं था। कोर्ट ने चिट्ठी नहीं होने से केस की मेरिट पर ही सवाल उठा दिये। अदालत ने कहा कि विधायकों के समर्थन की जो चिट्ठी आप राज्यपाल को सौंपने की बात कर रहे हैं वह जब आपके पास है ही नहीं है तो दलीलें कैसे सुनें?

जगदंबिका पाल को कांग्रेस ने अनैतिक रास्ते से सौंपी सत्ता
वर्ष 1998 में कांग्रेस ने षडयंत्र करके पहले तो उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह सरकार गिरा दी। इसके बाद कांग्रेस के आदेश पर तत्कालीन राज्यपाल रोमेश भंडारी ने लोकतांत्रिक कांग्रेस के नेता जगदंबिका पाल को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी। हालांकि कोर्ट ने इस पूरी प्रक्रिया को रद्द कर दिया। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के आदेश से सदन के भीतर गुप्त मतदान में भाजपा के कल्याण सिंह जीत भी गए।

1989 में बोम्मई को बहुमत साबित करने नहीं दिया गया
कर्नाटक में 1989 में एस आर बोम्मई को बहुमत साबित करने नहीं दिया गया था और कांग्रेस ने राष्ट्रपति शासन लगा दिया। जिसके बाद 1994 में सुप्रीम कोर्ट के 9 न्यायाधीशों की पीठ ने बोम्मई के पक्ष में निर्णय देते हुए कहा था- कांग्रेस जब-तब लोकतंत्र की हत्या करती है। जाहिर है यह एक ऐतिहासिक निर्णय था जिसने कांग्रेस को पूरी तरह से नंगा कर दिया था।

हरियाणा में देवीलाल के खिलाफ काग्रेस का षडयंत्र
जीडी तापसे 1980 के दशक में हरियाणा के राज्यपाल थे। उन्होंने कांग्रेस के निर्देश पर हरियाणा में देवीलाल सरकार का एक तरह से अपहरण कर लिया था। उस समय कांग्रेस  को 35 सीटें थीं और लोकदल-भाजपा गठबंधन को 37 सीट। चौधरी देवीलाल ने 6 निर्दलीय, 3 कांग्रेस (जे)  और जनता पार्टी के 1 विधायक का समर्थन जुटा लिया था। लेकिन राजभवन में ही राज्यपाल ने षडयंत्र रचा और भजनलाल को राज्य में सरकार बनाने का निमंत्रण भेज दिया।

राजनीतिज्ञों की तरह व्यवहार कर रहे थे राज्यपाल बूटा सिंह
वर्ष 2005 में बिहार के राज्यपाल बूटा सिंह ने 22 मई, 2005 की आधी रात को राज्य में विधायकों की खरीद-फरोख्त रोकने का हवाला देते हुए विधानसभा भंग कर दी थी। आरजेडी के पास 91 विधायक थे, जबकि एनडीए के पास 92 अपने विधायक और 10 निर्दलीय विधायकों का समर्थन था। हालांकि बाद में सुप्रीम कोर्ट ने बूटा सिंह के फैसले को असंवैधिक करार दिया था।

कांग्रेस की शह पर राज्यपाल सैयद सिब्ते रजी ने रची थी साजिश!
झारखंड के राज्यपाल सैयद सिब्ते रजी ने वर्ष 2005 के झारखंड चुनावों के बाद त्रिशंकु विधानसभा में शिबू सोरेन की सरकार बनवाई। लेकिन इसके बाद सदन में वे बहुमत साबित करने में असफल रहे। उन्हें नौ दिनों की मुख्यमंत्री पद भी गंवाना पड़ा। बाद में अर्जुन मुंडा की सरकार बनी।

कांग्रेस के षडयंत्र से एक सीट वाले मधु कोड़ा बने मुख्यमंत्री
वर्ष 2006 में झारखंड की भाजपा सरकार के खिलाफ कांग्रेस ने षडयंत्र किया। पहले निर्दलीय मधु कोड़ा को सरकार से समर्थन वापसी के लिए उकसाया और इसके बाद कांग्रेस और झारखंड मुक्ति मोर्चा ने समर्थन देकर उन्हें मुख्यमंत्री बना दिया।

कर्नाटक में राज्यपाल ने बर्खास्त की थी भाजपा सरकार
कर्नाटक के राज्यपाल हंसराज भारद्वाज ने वर्ष 2009 में बीजेपी सरकार को बर्खास्त कर दिया था। तब केंद्र में कांग्रेस नीत यूपीए की सरकार थी। कभी यूपीए सरकार में केंद्रीय मंत्री रहे हंस भारद्वाज की नियुक्त‌ि यूपीए सरकार ने ही की थी। राज्यपाल ने तब बीएस येदियुरप्पा पर गलत तरीके से बहुमत हासिल करने के आरोप लगाते हुए उन्हें दोबारा बहुमत साबित करने को कहा था।

गिरधर गोमांग के ‘अवैध’ वोट से गिरवा दी वाजपेयी सरकार
कांग्रेस संवैधानिक मर्यादाओं के साथ किस तरह खिलवाड़ करती है इसका उदाहरण है 17 अप्रैल 1999 में लोकसभा की कार्यवाही। इस दौरान कांग्रेस के अनैतिक आचरण का गवाह बने थे ओडिशा के तत्कालीन मुख्यमंत्री गिरधर गोमांग। ओडिशा का मुख्यमंत्री रहते हुए भी उन्होंने लोकसभा में मतदान किया और अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार गिराने में कांग्रेस की साजिश को अंजाम तक पहुंचा दिया।

 

 

 

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